कहीं ये भारतीय जनता पार्टी में 'भगदड़' की आहट तो नहीं!

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- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, लखनऊ से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
दो अप्रैल को भारत बंद के दौरान उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में हिंसा भड़क गई थी.
हिंसा के बाद खासकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कई लोगों को गिरफ़्तार किया गया और मुक़दमे दर्ज किए गए.
ये बंद यूं तो सुप्रीम कोर्ट के उस फ़ैसले के ख़िलाफ़ बुलाया गया था जिसमें एससी/एसटी एक्ट के तहत तुरंत गिरफ़्तारी पर रोक की बात कही गई थी.
लेकिन बंद के दौरान और फिर उसके बाद भी ऐसा लगा कि दलितों में जो ग़ुस्सा है, वो इस आशंका को लेकर कि शायद सरकार आरक्षण ख़त्म करने जा रही है.
इस आंदोलन के दौरान भड़की हिंसा के बाद विशेषकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कई लोगों के ख़िलाफ़ मुक़दमे दर्ज हुए हैं और कई लोग गिरफ़्तार भी हुए हैं.

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दलितों की समस्याएं
केंद्र में और उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार होने के नाते विपक्षी दल बीजेपी पर हमलावर हैं.
बीजेपी की मुश्किलें इसलिए भी इस मामले में बढ़ती दिख रही हैं कि तब से लेकर अब तक उसके क़रीब आधा दर्जन सांसदों ने बग़ावती तेवर दिखाए हैं.
शुरुआत उत्तर प्रदेश में बहराइच से सांसद सावित्री बाई फुले ने की और फिर इसमें अशोक दोहरे, छोटेलाल खरवार और डॉक्टर यशवंत सिंह से होते हुए उत्तर-पश्चिम दिल्ली से सांसद और उत्तर प्रदेश से ही ताल्लुक रखने वाले डॉक्टर उदितराज का नाम जुड़ता चला गया.
इन सभी सांसदों की शिकायत अपनी सरकारों से है, वो भी दलितों की समस्याओं को लेकर.
सावित्री बाई फुले तो सीधे तौर पर बीजेपी से अब दो-दो हाथ करने का मन बना चुकी हैं और लखनऊ में उन्होंने शक्ति परीक्षण भी कर लिया.
वहीं, नगीना से सांसद डॉक्टर यशवंत सिंह ने प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर कहा कि पिछले चार साल में केंद्र सरकार ने दलितों के लिए कुछ भी नहीं किया है.

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पार्टी पर दबाव
जानकारों का कहना है कि 2019 में संभावित लोकसभा के आम चुनाव को देखते हुए ये तो तय है कि बीजेपी के कई मौजूदा सांसदों का टिकट कटना तय है.
जहां तक दलित सांसदों की बात है तो उन्हें ये अच्छा मौक़ा भी मिल गया है कि वो दलितों के मुद्दे पर उनकी सहानुभूति लेते हुए अपनी पार्टी पर दबाव बना सकें.
लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार शरद प्रधान कहते हैं, "बीजेपी के सांसदों ने अपने क्षेत्रों में कुछ काम तो किया नहीं है या यों कहिए कि कर नहीं पाए."
"ऐसे में पार्टी से भी टिकट कटने का डर है और उन्हें ख़ुद भी दोबारा इसी पार्टी से चुनाव जीतना मुश्किल लग रहा है. रही-सही कसर सपा-बसपा गठबंधन ने पूरी कर दी है."
"सुरक्षित सीटों के सांसदों के लिए पाला बदलने का भी अच्छा मौक़ा है और दबाव डालकर बीजेपी में ही टिकट बचाए रखने का भी. तो ये सब उसी अफ़रा-तफ़री का नतीजा दिख रहा है."

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बग़ावती तेवर
पार्टी से बग़ावती तेवर दिखाने वाले इन सांसदों ने आरोप लगाए हैं कि 2 अप्रैल को 'भारत बंद' के बाद एससी/एसटी वर्ग के लोगों को उत्तर प्रदेश सहित दूसरे राज्यों में सरकारें और स्थानीय पुलिस झूठे मुकदमे में फंसा रही है उन पर अत्याचार हो रहा है.
इटावा से बीजेपी सांसद अशोक दोहरे ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में कहा है कि पुलिस निर्दोष लोगों को जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल करते हुए घरों से निकाल कर मारपीट कर रही है. इससे इन वर्गों में गुस्सा और असुरक्षा की भावना बढ़ती जा रही है.
कुछ ऐसी ही बातें रॉबर्ट्सगंज से बीजेपी के दलित सांसद छोटेलाल खरवार ने पीएम को लिखे पत्र में कही हैं.
छोटेलाल खरवार ने तो राज्य के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी, प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र नाथ पांडे और संगठन मंत्री सुनील बंसल की भी शिकायत की थी और ये भी लिखा था कि उनके ज़िले के आला अधिकारी उनका उत्पीड़न कर रहे हैं.

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आरोपों की गंभीरता
इन सांसदों के ये आरोप इतने गंभीर हैं जितने कि बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती बीजेपी और उसकी केंद्र और राज्य की सरकार पर लगा रही हैं.
वरिष्ठ पत्रकार सुनीता ऐरन कहती हैं, "इनमें से कोई भी नेता सीधे तौर पर नरेंद्र मोदी और अमित शाह पर निशाना नहीं साध रहा है. ज़ाहिर है, वो एक सेफ़ साइड बचाकर रख रहे हैं. अधिकारियों की शिकायत तो यूपी में बीजेपी के ज़्यादातर सांसद और नेता दबे मन से करते मिल जाएंगे, खुलकर भले ही कोई न करे."
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का ये भी कहना है कि गोरखपुर और फूलपुर चुनाव के बाद सपा और बसपा जिस तरह से एक-दूसरे के नज़दीक आ रहे हैं और उपचुनाव में इसका जो सकारात्मक परिणाम दिख चुका है, उससे ख़ासतौर पर उन नेताओं का बीजेपी से मोहभंग हो रहा है जो दूसरी पार्टियों से बीजेपी में गए थे. सावित्री बाई फुले, छोटेलाल खरवार और अशोक दोहरे ऐसे नेताओं में शामिल हैं.

राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं
हालांकि यहां एक सवाल ये भी उठता है कि क्या बीएसपी में इनकी वापसी संभव है?
फ़िलहाल तो बीएसपी नेता इस सवाल का जवाब 'न' में दे चुकी हैं जब रविवार को उन्होंने लखनऊ में कहा, "इन सांसदों को दलितों से जब इतनी ही हमदर्दी थी तो ये चार साल से क्या कर रहे थे? ये सब बीजेपी की और इन नेताओं की सोची-समझी साज़िश है."
लेकिन जानकारों का कहना है कि राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं है.
सुनीता ऐरन कहती हैं, "देखिए, बीएसपी से बाहर गए ऐसे नेताओं का तो वापस आना मुश्किल है जिन्होंने मायावती पर गंभीर आरोप लगाए थे लेकिन जिन्हें ख़ुद मायावती ने निकाला था या जो अन्य पार्टियों में जाने के बाद भी मायावती पर ज़्यादा हमलावर नहीं हुए, उनके पार्टी में वापस आने की पूरी संभावना है, यदि वो चाहें. आख़िर पार्टी से इतने लोग बाहर गए हैं तो अब वापस आएंगे तभी तो उसका पहले की तरह विस्तार होगा."

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मौक़े की तलाश
सपा-बसपा और कांग्रेस के कुछ नेताओं की मानें तो गठबंधन की संभावना के बाद से ही बीजेपी के कई नेता इनके संपर्क में हैं और आने वाले दिनों में वे मौक़े की तलाश और मोल-भाव का अंदाज़ा लगा रहे हैं.
वहीं दूसरी ओर, कुछ पर्यवेक्षक इसे बीजेपी के लिए आने वाले दिनों में शुभ संकेत के रूप में नहीं देख रहे हैं.
ख़ुद बीजेपी के ही एक सांसद ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, "कार्यकर्ताओं और छोटे नेताओं की उपेक्षा का परिणाम बीजेपी गोरखपुर और फूलपुर में देख चुकी है, उसे सबक लेना चाहिए. यदि पार्टी ऐसा नहीं करती है तो उपचुनावों का परिणाम 2019 में पूरे प्रदेश में देखने को मिलेगा, इसमें आश्चर्य नहीं."
हालांकि वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्र कहते हैं कि सपा-बसपा, कांग्रेस इत्यादि का महागठबंधन इतना आसान भी नहीं है लेकिन यदि हो गया तो बीजेपी के सामने संकट तो खड़ा ही कर देगा.

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सांसदों की हिम्मत
उनके मुताबिक़, "आक्रोश सिर्फ़ दलित सांसदों में है, ऐसा नहीं है. हां, ये अलग बात है कि इन सांसदों ने हिम्मत पहले दिखाई है. लाइन में अभी और भी कई हैं जो आने वाले दिनों में सामने आते रहेंगे."
दरअसल, बीजेपी नेताओं की खुलकर नाराज़गी पिछले साल हुए निकाय चुनावों के दौरान भी देखने को मिली थी लेकिन नगर निगम की ज़्यादातर सीटों पर पार्टी की जीत ने ऐसे नेताओं को फ़िलहाल कुछ दिनों के लिए ख़ामोश कर दिया था.
जानकार कहते हैं कि अब ये सिलसिला चल पड़ा है और आने वाले दिनों में इसमें गंभीरता और परिणाम दिखेंगे, सिर्फ़ धमकी, पत्र-लेखन और मान-मनौवल तक ये सीमित नहीं रहने वाला.
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