उडुपी में महिलाओं का रुतबा ऊँचा, लेकिन राजनीति में पूछ नहीं

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, बेंगलुरु से
दक्षिण भारत के कर्नाटक का तटवर्ती ज़िला उडुपी जहाँ घरों में बेटों से कहा जाता है कि उन्हें समाज में महिलाओं का सम्मान किस तरह करना चाहिए.
यही वजह है कि उडुपी ज़िले में महिलाओं का अनुपात मर्दों की तुलना में ज़्यादा है.
2011 के जनसंख्या के आंकड़ों के अनुसार उडुपी ज़िले में 1,000 पुरुषों पर 1094 महिलाएं हैं.
यह अनुपात इसलिए भी ज़्यादा है क्योंकि बेटी के पैदा होने पर यहाँ जश्न मनाया जाता है.
उडुपी को अपने व्यंजनों के लिए देश और विदेश में ख्याति मिली हुई है. ब्रैंड उडुपी के होटलों का चेन दूर-दूर तक फैला हुआ है. चाहे वो इडली, वड़ा या डोसा हो या फिर आचार, उडुपी के व्यंजनों की अपनी अलग पहचान है.

यहाँ पर सिर्फ़ महिलाओं द्वारा संचालित कई उद्यम हैं. चाहे छोटे हों या बड़े. यहाँ तक कि एक रेस्तरां है 'क्लास्सिक विलेज रेस्टोरेंट' जिसे सिर्फ़ और सिर्फ़ 12 महिलाएं ही मिलकर चलाती हैं.
इसकी मालकिन हैं जीए कोटेयार जबकि मुख्य शेफ़ हैं गीता सुवर्णा.
उडुपी के लोगों को लगता है कि इस तरह का रेस्तरां ही काफ़ी है ये बताने के लिए कि यहाँ के समाज में महिलाएं कितनी सशक्त हैं.
लेकिन इन सबके बावजूद जब बात राजनीति की आती है तो यहाँ महिलाओं का उतना प्रतिनिधित्व नहीं है जितना होना चाहिए.

इमेज स्रोत, Getty Images
महिलाओं को टिकट नहीं
यहाँ की रहने वाली जयश्री राज कहती हैं कि राजनीति का जब सवाल उठता है तो यहाँ सभी दल एक पायदान पर हैं क्योंकि महिलाओं को कोई टिकट नहीं देना चाहता.
हालांकि उडुपी की अच्छी बात यह है कि यहाँ की सांसद शोभा कर्ण लाजे और ज़िला अधिकारी मेरी फ्रांसिस महिला हैं.
विनुथा किरण सामजिक कार्यकर्ता हैं जिनका जन्म ही उडुपी में हुआ है.
बीबीसी से बातचीत के दौरान वो कहती हैं कि स्थानीय निकायों में महिलाओं की संख्या काफ़ी है. जैसे ज़िला परिषद् और पंचायत.
वो कहती हैं, "मगर जब बात विधानसभा के चुनावों की आती है तो कोई भी दल महिलाओं को टिकट नहीं देना चाहता है. राजनीतिक दल मानकर चलते हैं कि महिलाएं कमज़ोर हैं और चुनाव जीत नहीं सकतीं, जबकि ये बात ग़लत है. आप स्थानीय निकायों को देखिए. यहाँ पंचायतों और ज़िला परिषद् में महिलाओं का दबदबा है."
पुरुषों की संख्या
विधानसभा के चुनावों की घोषणा होने के साथ टिकटों के लिए नेताओं में ख़ूब संघर्ष चल रहा है. लेकिन इस दौड़ में महिलाएं काफ़ी पीछे हैं.

चुनाव आयोग के आंकड़े बताते हैं कि उडुपी जिले की सभी पांच विधानसभा क्षेत्रों में महिला वोटरों की संख्या ज़्यादा है.
पूरे ज़िले की आबादी 10 लाख की है जिसमे पाँच लाख से ज़्यादा महिलाएं हैं जबकि पुरुषों की संख्या चार लाख पचास हज़ार के आसपास की बताई जाती है.
इस ज़िले में ब्यन्दूर, कुंदापुर, उडुपी, कऊप और करकला विधान सभा क्षेत्र हैं.
इसका यह मतलब हुआ कि उडुपी की सभी सीटों पर महिलाएं ही तय करेंगीं कि जीत किसकी होगी. उन्ही के वोट निर्णायक होंगे.
ज्योति रमन्ना शेट्टी के अनुसार, उडुपी की महिलाओं ने हर क्षेत्र में अपना दबदबा बनाने में कामयाबी हासिल की है. चाहे वो शिक्षा का क्षेत्र हो या व्यवसाय.
महिलाओं का रुतबा
उडुपी में ही मनिपाल विश्वविद्यालय है और इसे शिक्षा का गढ़ माना जाता है.
दूर-दूर से छात्र यहाँ पढने आते हैं. ज्योति कहती हैं कि इस सुविधा का ज़्यादा फ़ायदा यहाँ की महिलाओं ने उठाया है और ख़ूब शिक्षा हासिल की है.

इमेज स्रोत, Getty Images
विनुथा किरण के अनुसार इसके अलावा भी कई छोटे छोटे उद्यम हैं जिसे सिर्फ़ महिलाएं ही चलाती हैं. कई महिला समूह भी हैं जो इन छोटे उद्यमों को वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए काम कर रहे हैं.
बीबीसी से बातचीत के दौरान उडुपी की महिलाओं का कहना था कि वो अपने बेटों को घरों में ही सिखाती हैं कि महिलाओं का सम्मान किस तरह किया जाना चाहिए.
यही कारण है कि उडुपी में ना सिर्फ़ महिलाओं का रुतबा काफ़ी ऊंचा है, उन्हें सम्मान के साथ भी देखा जाता है.
जयश्री कृष्णा राज कहती हैं, "हम बेटियों को नहीं कहते कि क्या पहन कर घर से निकलें. बल्कि हम बेटों को सिखाते हैं कि महिलों के साथ कैसे पेश आना चाहिए और कैसे उनको सम्मान की नज़र से देखना चाहिए. यही फ़र्क है हमारे समाज में और उत्तर भारत के समाज में."












