महाभारत से क्या सीख सकते हैं 'पांडव' बनने वाले राहुल गांधी?

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- Author, भरत शर्मा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
"हज़ारों साल पहले कुरुक्षेत्र की लड़ाई लड़ी गई थी. कौरव ताक़तवर और अंहकारी थे. पांडव नम्र थे, सच्चाई के लिए लड़े थे. ''कौरवों की तरह बीजेपी और आरएसएस का काम सत्ता के लिए लड़ना है, पांडवों की तरह कांग्रेस सच्चाई के लिए लड़ रही है."
कांग्रेस के 84वें महाधिवेशन में राहुल गांधी ने राजनीतिक जंग को महाभारत काल से कुछ इस तरह जोड़ा था.
ज़ाहिर है, भाजपा की तरफ़ से इस पर पलटवार होना ही था. निर्मला सीतारमण ने जवाबी हमले में कहा कि जो लोग राम का अस्तित्व स्वीकार नहीं करते थे, वो ख़ुद को पांडव के रूप में पेश कर रहे हैं.
राहुल को क्यों याद आई महाभारत?

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लेकिन राहुल गांधी ने महाभारत का ज़िक्र ही क्यों किया? क्या इसकी कोई ख़ास वजह है या फिर वो सिर्फ़ अपने लिए सकारात्मक और भाजपा के लिए नकारात्मक दिखने वाला जुमला तलाश रहे थे.
वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी ने बीबीसी से कहा कि राहुल गांधी ने जो उदाहरण दिया वो भी हिंदू पौराणिक कथा का है. उन्होंने मंदिर का ज़िक्र भी किया. ये भी कहा कि उन्हें बताया गया था कि भगवान हर जगह हैं.
उन्होंने कहा, ''सोनिया गांधी ने भी कहा था कि हमें मुस्लिम पार्टी के रूप में पेश किया जाता है. मुझे लगता है कि कौरव-पांडव वाला क़िस्सा भी इस रणनीति का एक हिस्सा है.''
दोनों राजनीतिक दलों की अपनी-अपनी दलीलें हैं. लेकिन महाभारत का ज़िक्र होते ही सभी के ज़हन में सवाल आया कि राहुल गांधी अगर मौजूदा राजनीतिक महाभारत में पांडव दिखना चाहते हैं तो ये कैसे मुमकिन होगा?
ऐसी कौन सी चीज़ें हैं जो राहुल गांधी को पांडव, कौरव या महाभारत काल के दूसरे किरदार सिखा सकते हैं.
सकारात्मक राजनीति

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महाभारत ने सिखाया कि किसी का नामोनिशान मिटाने की चाहत अपने लिए ही ख़तरा बन सकती है. कौरवों ने यही चाहा और उनका हश्र क्या हुआ. राहुल और कांग्रेस को जल्द ही ये सबक सीख लेना चाहिए. अतीत में भी वो इसका नुकसान उठा चुके हैं.
पहले गुजरात और फिर लोकसभा चुनावों में सोनिया गांधी और कांग्रेस के दूसरे नेताओं ने नरेंद्र मोदी पर व्यक्तिगत हमले किए थे और इसका फ़ायदा होने के बजाय उन्हें नुकसान हुआ.
ऐसे में व्यक्ति आधारित नकारात्मक राजनीति से बेहतर होगा कि राहुला गांधी भाजपानीत सरकार की 'नाकामियों' को रेखांकित करे, लेकिन साथ ही ये भी बताएं कि उनके पास हालात बदलने के क्या विकल्प हैं.
ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे

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महाभारत में कृष्ण-अर्जुन हों या फिर दुर्योधन-कर्ण, दोस्ती की मिसालें मिलती हैं. ऐसे ही कांग्रेस और राहुल गांधी को भी दोस्ती की अहमियत समझनी होगी. वक़्त पड़ने पर उसे अपने दोस्तों की बात भी माननी पड़ सकती है.
गोरखपुर और फूलपुर में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने हाल में दिखाया कि मिलकर क्या किया जा सकता है. 2019 दूर नहीं है और कांग्रेस को ऐसी रिश्तेदारियां जोड़ने की कोशिश करनी होगी.
साथ ही साथ ये भी देखना होगा कि जिन राज्यों में वो बड़ी ताक़त नहीं रह गई है, वहां अहं को परे रखकर क्षेत्रीय दलों के साथ खड़ा होना होगा. कहीं सीनियर बनने का मौक़ा आएगा तो कहीं जूनियर पार्टनर भी बनना होगा.
आधी जानकारी ख़तरनाक

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महाभारत में अभिमन्यु का प्रसंग साहस का परिचय भी देता है और सीख भी. आधी-अधूरी जानकारी के भरोसे चक्रव्यूह में दाख़िल तो हुआ जा सकता है, लेकिन सुरक्षित बाहर नहीं निकला जा सकता.
यूट्यूब पर राहुल गांधी के कितने ही वीडियो हैं, जिनमें वो भाषण देते वक़्त कोई न कोई ग़लती कर रहे हैं. ऐसा नहीं कि वो अपनी ग़लती स्वीकार नहीं करते. वो ये भी कहते रहे हैं कि वो ग़लती करते हैं क्योंकि आम इंसान हैं.
लेकिन इसके बावजूद उन्हें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि जब वो बात करें या भाषण दें तो उनकी छवि किसी गैर-संजीदा नेता की न बने. केंद्र सरकार को घेरें तो तथ्यों में गड़बड़ न हो.
नीरजा चौधरी का मानना है कि पहले के राहुल और आज के राहुल में आज का राहुल बेहतर है, इसमें कोई दो राय नहीं है. लेकिन जब आप उनकी तुलना नरेंद्र मोदी से करते हैं, तो दोनों के बीच अभी काफ़ी फ़ासला है.
गिरना और फिर उठना

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महाभारत में कर्ण का किरदार काफ़ी दिलचस्प है. जन्म से लेकर जीवन के काफ़ी वर्षों तक 'सूत-पुत्र' ने भेदभाव और अपमान को लेकर कई घटनाओं का सामना किया. पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान कई बार मुश्किलों का सामना किया. प्राण तक दांव पर लगे. लेकिन इसके बावजूद कोई भी अवरोध उनका रास्ता नहीं रोक सका.
इसी तरह ये सीख मिलती है कि राजनीतिक राह में तरह-तरह के अवरोध होने के बावजूद अगर मेहनत जारी रखी जाए तो मंज़िल मिल सकती है. नरेंद्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो रास्ते में कई अवरोध थे लेकिन वो प्रधानमंत्री पद तक पहुंच ही गए.
इसी तरह राहुल गांधी के सामने अब संभावनाएं हैं. वो ऐसे वक़्त में कांग्रेस की कमान संभाल रहे हैं, जब मुश्किलें ज़्यादा हैं. लेकिन इन्हीं मुश्किलों में संभावनाएं भी छिपी हैं.
वक़्त के साथ बदलना

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महाभारत में एक दौर वो आता है जब पांडवों को राज-काज छोड़कर कई साल छिपकर रहना पड़ता है. इस दौरान वो ख़ुद को वक़्त के हिसाब से ढालते हैं और अलग-अलग भूमिकाएं निभाते हैं.
राजनीतिक हालात भी इसी तरह बदलते हैं और इनके बदलने के साथ नेताओं को भी बदलाव के लिए तैयार रहना होता है. राहुल गांधी के कंधों पर उस कांग्रेस को आगे ले जाने की ज़िम्मेदारी है जो पहले जैसी ताक़तवर नहीं है.
उसके एक तरफ़ सामने भाजपा जैसी चुनावी मशीन खड़ी है तो दूसरी तरफ़ क्षेत्रीय दल. उसे कहीं पर दोस्त बनाने हैं, तो कहीं पर मुक़ाबला करना है. ये समय भूमिकाएं बदलने का है.
लेकिन कांग्रेस पांडव बनेगी कैसे?

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लेकिन ये सब कुछ इतना आसान नहीं है. वरिष्ठ पत्रकार मधुकर उपाध्याय का कहना है, ''मैंने राहुल गांधी का ये बयान सुना नहीं था बल्कि पढ़ा था और पढ़ते ही दिमाग़ में आया कि कांग्रेस में पांडव कौन हैं.''
''कांग्रेस में सत्य के लिए खड़े रहने वाले युधिष्ठर कौन हैं, हर लक्ष्य भेदने वाले अर्जुन कौन हैं. प्रहार करने वाले भीम कौन हैं और नकुल-सहदेव कहां हैं? ये जो पांच किरदार हैं, उनकी जो ख़ूबियां हैं, वो कहां हैं.''
तो पांडवों का ज़िक्र राहुल गांधी ने क्यों किया, मधुकर उपाध्याय ने कहा, ''दरअसल, मेरा मानना है कि वो कोर टीम बनाना चाहते हैं और वो नई कोर टीम होगी. मेरा मानना है कि पांडव के रूप में राहुल इसी का ज़िक्र कर रहे थे.''
''कांग्रेस अध्यक्ष अगर महाभारत को याद कर रहे हैं तो उन्हें ये भी जान लेना चाहिए कि पांडव बनाने की ज़रूरत होगी. ये तो पार्टटाइर्मस की पार्टी हो गई. और पार्टटाइर्मस कभी भी फ़ुलटाइमर्स की जगह नहीं ले सकते.''
मुकाबला आसान नहीं

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उन्होंने कहा, ''कांग्रेस के सामने जो ताक़त खड़ी है कि वो दिन-रात सोते-जागते राजनीति ही करते हैं. उनके दिमाग़ में और कुछ नहीं चलता.''
दूसरी तरफ़ नीरजा चौधरी फ़िलहाल इस बारे में कुछ नहीं कह पा रही हैं कि राहुल ख़ुद को अर्जुन की भूमिका में देख रहे हैं या किसी और की.
उन्होंने कहा, ''मौजूदा राजनीति को अगर महाभारत से जोड़ें तो कांग्रेस को कृष्ण चाहिए, वो कौन होने वाला है? मुझे लगता है कि सोनिया कृष्ण बन सकती हैं. रणनीतिकार बन सकती है. यूपीए की हेड वही बनेंगी.''
लेकिन क्या वो रिटायर नहीं होना चाहती थीं, उन्होंने कहा, ''था तो ऐसा ही, लेकिन अब ऐसा नहीं लगता. कई लोग चाह रहे हैं कि मायावती यूपीए की कमान संभालें. ममता भी चाह रही थी कि इस बारे में बात हो. क्योंकि अभी पीएम की बात तो होगी नहीं, यूपीए चेयरपर्सन की बात होगी.''
मोदी पर निर्भर करेगा सबकुछ

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उन्होंने कहा, ''सोनिया ने हाल में डिनर भी दिया. लेकिन अगर विपक्ष एकजुट हुआ तो भी सफलता की गारंटी नहीं है. ये इस बात पर निर्भर करेगा कि मोदी व्यक्तिगत रूप से कितना मैदान गंवा चुके हैं.''
नीरजा ने कहा, ''जहां भी भाजपा उपचुनाव हारी है, वहां मोदी ने कोई काम नहीं किया था. क्षेत्रीय दिग्गज हारे हैं.''
इसके अलावा उनका ध्यान कांग्रेस अधिवेशन में 'प्रैग्मेटिक अप्रोच' के ज़िक्र ने भी खींचा. उन्होंने सवाल किया, ''इसका क्या मतलब है? क्या कांग्रेस पीएम की कुर्सी को लेकर अड़ेगी नहीं?
लेकिन क्या विपक्ष के एकजुट हो जाने पर नरेंद्र मोदी को फ़ायदा भी हो सकता है, नीरजा ने जवाब दिया, ''हां, ऐसा हो सकता है. वो इमोशनल कार्ड खेल सकते हैं कि सभी उन्हें घेरने की कोशिश कर रहे हैं.''
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