बजट 2018: अंतिम बजट से पहले मोदी सरकार के सामने हैं ये चुनौतियां

वित्त मंत्री अरुण जेटली

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इमेज कैप्शन, वित्त मंत्री अरुण जेटली ने पिछले साल आम और रेल बजट साथ पेश किया था

मोदी सरकार एक फ़रवरी को वित्त वर्ष 2018-19 का बजट पेश करेगी. माना जा रहा है कि यह बजट लोकलुभावन हो सकता है, क्योंकि लोकसभा चुनाव से पहले मौजूदा सरकार का यह अंतिम पूर्ण बजट होगा.

वित्त मंत्री अरुण जेटली का ध्यान जहां एक तरफ़ अगले साल होने वाले चुनावों की तरफ़ होगा तो वहीं वे बढ़ते राजकोषीय घाटे पर भी नज़र टिकाए होंगे.

आइए जानते हैं मौजूदा सरकार के सामने बजट पेश करने से पहले क्या-क्या चुनौतियां हैं:

किसान

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इमेज कैप्शन, किसानों की आय बढ़ाना चुनौती

कृषि

नोटबंदी के बाद से ही कृषिक्षेत्र का हाल देश में ख़राब बताया जा रहा है. अर्थशास्त्री अरुण कुमार बताते हैं, ''सरकार के सामने इस बजट के संबंध में जो सबसे बड़ी चुनौती है, वह ये कि कृषि क्षेत्र को एक बार फ़िर कैसे ठीक किया जाए.''

साथ ही सरकार किसानों को भी राहत दिलाने की कोशिश करेगी, सरकार के सामने यह चुनौती रहेगी कि वे किसानों के भीतर यह भरोसा पैदा करे कि किसान एक बार फ़िर सुनियोजित तरीके से कृषि पर अपना ध्यान केंद्रित कर पाए.

कृषि मामलों के विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा बताते हैं, ''पिछले कई दशकों से देश में कृषि की हालत गंभीर रूप लेती जा रही है, आर्थिक सर्वे 2016 के अनुसार लगभग आधे देश में किसानों की औसतन सालाना आय 20 हज़ार रुपये है. किसानों की आत्महत्याएं कृषि की बुरी हालत को दिखाने वाले लक्षण हैं, अब तो किसान अपना गुस्सा भी दिखाने लगे हैं. गुजरात चुनाव में किसानों ने जब सत्ताधारी पार्टी को वोट नहीं दिया तो इसने किसानों के गुस्सा को ही दिखाया."

वह आगे कहते हैं कि हर बजट में किसानों की बात होती है लेकिन उनकी मदद कभी हो नहीं पाती. आमतौर पर पूंजीपतियों को ही ध्यान में रखकर बजट बनाया जाता है.

युवा

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इमेज कैप्शन, प्रधानमंत्री मोदी ने हर साल नई नौकरियां पैदा करने का वादा किया था

बेरोज़गारी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान बेरोज़गारी को एक बड़ा मुद्दा बनाया था. उन्होंने हर साल नई नौकरियों पैदा करने का वादा भी किया था.

लेकिन तमाम वादों के बीच बेरोज़गारी दर भारत में लगातार बढ़ती जा रही है. प्रो. अरुण कुमार इस विषय में बताते हैं, ''असंगठित क्षेत्र में जो रोज़गार की कमी है उसे दूर करना सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती होगी. विशेषकर देशभर का युवा रोज़गार के लिए लगातार प्रदर्शन कर रहा है."

शेयर बाज़ार

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इमेज कैप्शन, शेयर बाज़ार में काफ़ी उछाल देखने को मिला है

स्टॉक मार्केट में असीमित उछाल

अंतिम बजट पेश करने से मौजूदा सरकार के सामने खड़ी चुनौतियों के विषय में प्रो. अरुण कुमार बताते हैं कि सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती स्टॉक मार्केट में असीमित उछाल को काबू करने की होगी.

वह कहते हैं, ''हमारा स्टॉक मार्केट बहुत ज़्यादा उछाल पर आ गया है. इसकी वजह है कि एक पोर्टफोलिया रीएडजस्टमेंट हुआ है, क्योंकि रियल एस्टेट तो पिछले तीन-चार साल से नीचे गिर रहा था इससे जहां पर आर्थिक बचत होती थी वहां पर ब्याज दर बहुत कम हो गई है. इससे लोग ज़्यादा से ज़्यादा स्टॉक मार्केट में पैसा डाल रहे हैं और यही वजह है कि स्टॉक मार्केट में यह असीमित उछाल आया है जबकि मुनाफ़ा इतना हुआ नहीं है."

उनका आगे अनुमान है कि ऐसा भी हो सकता है कि किसी दिन यह स्टॉक मार्केट धराशाई होकर गिर जाए, इससे देश के तमाम व्यापारियों को भारी नुकसान भी उठाना पड़ सकता है.

स्टॉक मार्केट

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निवेश की कमी

देश में होने वाले निवेश में कमी आई है और सरकार के सामने मौजूद यह एक और बड़ी चुनौती है.

इस बारे में प्रो. अरुण कुमार बताते हैं, ''हमारी अर्थव्यवस्था में निवेश बहुत कम हो गया है, जो निवेश साल 2007-08 में जीडीपी का 38 प्रतिशत हो गया था, वह अब घटकर 27 प्रतिशत के करीब पहुंच गया है.''

''इसी वजह से लंबी अवधि में होने वाली वृद्धि कम हो गई है. सरकार को यह सोचना होगा कि अर्थव्यवस्था में निवेश को कैसे बढ़ाया जाए.''

मोदी और जेटली

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अमरीका ने काटा कॉर्पोरेट टैक्स रेट

अरुण कुमार के अनुसार, सरकार के सामने बजट पेश करने के दौरान जो एक चुनौती होगी, वह यह है कि अमरीका ने कॉर्पोरेट टैक्स रेट काटकर 35 प्रतिशत से 21 प्रतिशत कर दिया है.

वह बताते हैं, ''कॉर्पोरेट टैक्स रेट के कम होने से देश की पूंजी बाहर जाने का ख़तरा बढ़ सकता है, जो पूंजी पिछले दो साल में एफडीआई के बाद आई थी, वह प्रभावित हो सकती है. इसका नकारात्मक असर स्टॉक मार्केट पर भी पड़ सकता है."

बजट

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कैसे इन चुनौतियों से निपटे

प्रो. अरुण कुमार कहते हैं कि आमतौर पर बजट में बहुत-सी घोषणाएं की जाती हैं लेकिन वे सभी पूरी हो जाएं, ऐसा ज़रूरी भी नहीं.

वह कहते हैं, ''जब कोई बजट पेश किया जाता है तो उसमें जीडीपी का 10 से 11 प्रतिशत खर्च किया जाता है, जो लगभग 18 से 20 लाख करोड़ रुपये तक होता है. ऐसे में सरकार हर एक क्षेत्र को कुछ न कुछ देने की कोशिश तो कर ही सकती है और क्योंकि अब अगले साल चुनाव आने वाले हैं तो सरकार इस बजट में कुछ राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश भी करना चाहेगी. लेकिन इस समय टैक्स की समस्या बनी हुई है इसलिए सरकार ज़्यादा खर्च भी नहीं कर पाएगी."

"साथ ही सरकार राजकोषीय घाटे को भी बढ़ने नहीं देना चाहेगी, क्योंकि इससे मूडीज़ की रेटिंग भी प्रभावित हो सकती है. इसलिए योजनाओं की घोषणा तो की जाएगी लेकिन उन्हें पूरा करने के लिए बजट में उतना पैसा नहीं होगा इसलिए उनका फायदा कितना होगा, यह कहा नहीं जा सकता."

किसान

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किसानों के लिए सरकार उठाएं तीन कदम

वहीं, देवेंद्र शर्मा किसानों के हालात सुधारने के लिए सरकार से तीन कदम उठाने की बात करते हैं.

वह कहते हैं, ''किसानों की आय बढ़ाने के लिए कमिशन फॉर एग्रीकल्चर कोस्ट एंड प्राइज़ जो किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करता है, उसका नाम और ज़िम्मेदारियां बदलनी चाहिए. उसका नाम बदलकर कमिशन फॉर फार्मर इनकम एंड वेलफेयर करना चाहिए और उसकी ज़िम्मेदारी यह होनी चाहिए कि वह हर किसान परिवार को 18 हज़ार रुपये प्रतिमाह आय सुनिश्चित कर सके.

  • जिस तरह तेलंगाना सरकार ने किसानों को 8 हज़ार रुपये साल का सीधा आय में मदद करने की योजना शुरू की है, इसे देशभर में लागू करना चाहिए.
  • हमारे पास मार्केटिंग की बड़ी समस्या है. देश में 42 हजार मंडियों की ज़रूरत है जबकि एपीएमसी (एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केट कमिटी) की सात हज़ार 200 मंडिया ही हैं. बजट में इन मंडियों की संख्या बढ़ाकर 20 हज़ार कर सकें तभी किसान अपने अनाज को बेहतर तरीके से बेच सकेगा.''

(बीबीसी संवाददाता संदीप सोनी से बातचीत पर आधारित.)

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