रांची विश्वविद्यालय में बगैर शिक्षक मिल रही पीएचडी

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- Author, रवि प्रकाश
- पदनाम, रांची से, बीबीसी हिंदी के लिए
रांची विश्वविद्यालय का जनजातीय और क्षेत्रीय भाषा विभाग 'भाषाओं के घोटाले में लिप्त' है. यहां पीजी डिपार्टमेंट में पढ़ाई के लिए स्वीकृत नौ भाषाओं मे सिर्फ दो भाषाओं के तीन शिक्षक हैं. इसके बावजूद 150 से करीब छात्र रिसर्च कर रहे हैं.
सरकार ने इस विभाग में पिछले 25 सालों से कोई नई नियुक्ति नहीं की है. इस कारण इन भाषाओं के रिसर्च स्कालर मांग-चांग के शोध कर रहे हैं.
जिन भाषाओं के बारे में पढ़ाने के लिए शिक्षकों की नियुक्ति नहीं हुई है वो झारखंड के आदिवासियों द्वारा बोली जाने वाली भाषाएं हैं.
जाने-माने बुद्धिजीवी और इस विभाग के सेवानिवृत शिक्षक डॉ. गिरिधारी राम गौंझू कहते हैं कि रांची विश्वविद्यालय भाषाओं को लेकर भेदभाव का सबसे बड़ा केंद्र बन गया है.
सभ्यता खत्म करने की साजिश

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डॉ. गिरिधारी राम गौंझू ने बीबीसी से कहा, "किसी भी सभ्यता का विनाश करना हो, तो उसकी भाषा और बोलियों को खत्म कर दीजिए. सभ्यता खुद-ब-खुद नष्ट हो जाएगी. झारखंड में ऐसा ही हो रहा है."
वो कहते हैं, "आदिवासी भाषाओं को खत्म करने की साजिश की जा रही है. रांची विश्वविद्यालय इसका जीवंत उदाहरण है. मुख्यमंत्री तक से मांग करने के बावजूद रांची यूनिवर्सिटी के जनजातीय भाषा विभाग में शिक्षकों की नियुक्ति नहीं होना चिंताजनक है. "
वो खुद जनजातीय भाषा विभाग के अध्यक्ष रह चुके हैं.
भाषा घोटाला
बकौल गिरिधारी राम गौंझू, सभ्य समाज के लोग चाहते ही नहीं कि जनजातीय भाषाएं भी हिन्दी या अंग्रेजी की तरह समृद्ध हो सकें.
वो सवाल करते हैं, "जब मुख्यमंत्री का पद खाली नहीं रह सकता, तो फिर शिक्षकों के पद क्यों खाली रखे जा रहे हैं. क्या यह घोटाला नहीं है. दरअसल, यह एक किस्म का भाषा घोटाला है, जिसका सीधा संबंध हमारी संस्कृति और इतिहास से है."
सात भाषाओं के शिक्षक नहीं

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रांची विश्वविद्यालय के जनजातीय व क्षेत्रीय भाषा विभाग में नौ भाषाओं की पढ़ाई होती है. इसके लिए सिर्फ तीन शिक्षक नियुक्त हैं, जो सिर्फ दो भाषाओं के विशेषज्ञ हैं.
सात भाषाओं में शिक्षक ही नहीं हैं. इनमें संथाली, हो, मुंडारी, खड़िया, कुरमाली, खोरठा और पंचपरगनिया शामिल हैं. इन भाषाओं के शिक्षकों के रिटायर हो जाने के बाद उनकी जगह पर नई नियुक्ति नहीं की गई.
कुड़ुख के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर डॉ. हरि उरांव ने बताया कि जनजातीय भाषा विभाग में सिर्फ कुड़ुख और नागपुरी के ही शिक्षक हैं.
कुड़ुख के लिए वे अकेले शिक्षक हैं जबकि विभागाध्यक्ष डा त्रिवेणी नाथ साहू और उमेश नंद तिवारी नागपुरी पढ़ाते हैं. बाकी की भाषाओं के छात्र खुद ही पढ़ाई कर रहे हैं.
2008 में इंटरव्यू, रिजल्ट अभी तक नहीं

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विभागाध्यक्ष डा त्रिवेणी नाथ साहू ने बीबीसी से कहा, "कुछ रिटायर्ड शिक्षकों को क्लास के लिए बुलाया जाता है, तो कुछ वरिष्ठ रिसर्च स्कालर भी कक्षाएं लेते हैं."
"विश्वविद्यालय ने साल 2008 में कुछ शिक्षकों की नियुक्ति के लिए इंटरव्यू लिया था, लेकिन नौ साल के बाद भी आजतक उसका रिजल्ट नहीं निकला. ऐसे में हम किसी तरह अपना विभाग चला रहे हैं. यह दुख की बात है कि हमारी भाषा और संस्कृति पर शोध के लिए विदेशों से लोग रांची आते हैं लेकिन हम खुद अपनी भाषाओं को लेकर संजीदा नहीं हैं."
सैकड़ों रिसर्च स्कालर

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शिक्षकों की कमी के बावजूद रांची विश्वविद्यालय में इन भाषाओं के 150 से अधिक शोधार्थी हैं.
नागपुरी में शोध कर रहे वीरेंद्र कुमार महतो ने बताया कि जनजातीय भाषा विभाग में भले ही शिक्षक नहीं हों लेकिन संदर्भ सामग्री की दिक्कत नहीं है.
वो कहते हैं, "लेखन का काम गांव में रहने वाले लोग भी कर रहे हैं. कई उपन्यास और कहानियां लिखी गई हैं. कुछ खास दुकानों पर इन किताबों की उपलब्धता भी है."
बगैर शिक्षक रिसर्च
कुरमाली में रिसर्च कर रहे नंदकिशोर महतो ने बीबीसी को बताया कि विश्वविद्यालय में शिक्षक नहीं होने के कारण वे रांची कालेज के एक शिक्षक के निर्देशन में पीएचडी कर रहे हैं.
उन्हें किताबों की भी दिक्कत है, क्योंकि विश्वविद्यालय की लाईब्रेरी में उतनी किताबें नहीं हैं. इसी तरह खड़िया में रिसर्च करने वाले किशोर केरकेट्टा कहते हैं कि वे गांवों में फील्ड वर्क कर रिसर्च कर रहे हैं.
उन्हें अपने शोध के लिए दूसरी भाषाओं के शिक्षकों की मदद लेनी पड़ती है. ऐसे में रिसर्च कठिन है लेकिन हम सिर्फ रिसर्च नहीं कर रहे बल्कि यह हमारी भाषा बचाने और उसे समृद्ध करने की लड़ाई भी है.
ऐसे शुरू हुई थी पढ़ाई

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साल 1971 में डा निर्मल मिंज ने प्रिंसिपल रहते हुए रांची के गोस्सनर कालेज में और बी पी केसरी ने 1973 में डाल्टनगंज के एक कालेज में पहली बार क्षेत्रीय भाषाओं की पढ़ाई शुरू करवाई.
1977 में रांची कालेज ने भी यह व्यवस्था करा दी. इससे पहले झारखंड इलाके के किसी भी कालेज में आदिवासी भाषाओं की पढ़ाई नहीं होती थी. तब यह क्षेत्र बिहार राज्य का हिस्सा था.
बी पी केसरी की पहल
साल 1980 में रांची विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति कुमार सुरेश सिंह ने आदिवासी विद्वान बी पी केसरी की पहल पर यहां जनजातीय भाषा विभाग खुलवाया.
तब यहां मुंडारी, नागपुरी, खड़िया, संथाली, हो, कुड़ुख और कुरमाली भाषाओं की पढ़ाई की व्यवस्था की गई. यह तय हुआ कि डा रामदयाल मुंडा को इस विभाग का डायरेक्टर बनाया जाए.
आदिवासी भाषाओं के विद्वान डा मुंडा तब अमेरिका के एक विश्वविद्यालय में पढ़ा रहे थे. 19 जुलाई 1981 को वे अमेरिका से रांची आए और यह पद संभाला.
30 सीटों के लिए 400 छात्र आए

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इस बीच 6 अगस्त 1980 से 18 जुलाई 1981 तक बी पी केसरी इस विभाग के प्रभारी निदेशक रहे. इस दौरान 1981 में शिक्षकों का पहली बार इंटरव्यू हुआ और गिरिधारी राम गौंझू, बी बी नाथ, रोज केरकेट्टा, इंद्रजीत उरांव, के के टुड्डू जैसे विद्वानों की नियुक्ति हुई.
तब सातों भाषाओं के लिए एक-एक शिक्षक नियुक्त हुए. इसके बावजूद छात्रों की भीड़ लग गई.
गिरिधारी राम गौंझू बताते हैं कि तब एक बैच में 30 सीटों के बदले 400 छात्रों तक ने एंट्रेस टेस्ट दिया था.
आंकड़ों की गवाही

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यूनेस्को द्वारा साल 2009 में जारी रिपोर्ट 'एटलस आफ वर्ल्ड लार्जेस्ट लैंग्वेज इन डेंजर' के मुताबिक दुनिया में वर्तमान समय मे मौजूद 90 फीसदी भाषाएं अगले 100 वर्षों में अपना वजूद खो सकती हैं.
दुनिया में 199 ऐसी भाषाएं हैं, जिन्हें बोलने वाले 10 से भी कम लोग हैं.
1961 के दौरान भारत में 1652 भाषाएं थीं लेकिन 2001 की जनगणना में खुलासा हुआ कि अब इनकी संख्या सिर्फ 234 रह गई है.
राष्ट्रीय भाषा संस्थान मैसूर की रिपोर्ट के मुताबिक भारत की 12 आदिवासी भाषाएं विलुप्त होने की स्थिति में हैं. इनमें से कुछ झारखंडी भाषाएं भी हैं.
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