BUDGET SPECIAL: क्या देश के किसान भी देंगे टैक्स?

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    • Author, अभिजीत श्रीवास्तव
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

मोदी सरकार एक फ़रवरी को वित्त वर्ष 2018-19 का बजट पेश करेगी और इस बार इसमें कृषि को ख़ास प्राथमिकता दिए जाने की बात की जा रही है.

सरकार अपनी आय बढ़ाना चाहती है और इसके लिए वो अधिक से अधिक लोगों को टैक्स के दायरे में लाना चाहती है.

इसी के मद्देनज़र नीति आयोग ने पिछले साल सरकार को कृषि को टैक्स के दायरे में लाने की सलाह दी थी.

दरअसल, सरकार की आय का क़रीब एक-तिहाई हिस्सा कॉर्पोरेट टैक्स और इनकम टैक्स से आता है.

अगर इसमें एक्साइज, कस्टम और सर्विस टैक्स को भी जोड़ दें तो यह 60 फ़ीसदी से अधिक हो जाता है.

सरकार की बाक़ी कमाई सार्वजनिक क्षेत्र की ईकाइयों जैसे रेलवे, सार्वजनिक उपक्रमों से लाभ, ग़ैर कर स्रोतों से होने वाली आय से होती है.

यानी टैक्स सरकार की कमाई का बड़ा ज़रिया है. इसीलिए कृषि को भी इस दायरे में लाए जाने की चर्चा उठी. बज़ट सामने होने की वजह से एक बार फिर यह चर्चा गरम है.

हालांकि कृषि पर टैक्स की बहस पुरानी है और जब भी इसकी चर्चा हुई है, सरकार ने इसका खंडन किया है.

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कृषि पर टैक्स, सरकार की दुविधा

नीति आयोग के सदस्य बिबेक देबरॉय ने पिछले साल कहा था कि एक सीमा के बाद कृषि से होने वाली आय पर भी कर लगाया जाना चाहिए.

मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन ने भी देबरॉय की बातों से सहमति जताई. लेकिन सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों से इस पर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली.

ब्रिटिश राज के दौरान 1925 में भारतीय कराधान जांच समिति ने कहा था कि कृषि से होने वाली आय पर टैक्स छूट का कोई ऐतिहासिक या सैद्धांतिक कारण नहीं है.

केवल प्रशासनिक और राजनीतिक कारणों से कृषि को टैक्स से दूर रखा गया है. आज की तारीख में भी ये दोनों बातें अमूमन सही हैं.

और इस समिति ने कृषि पर टैक्स की सिफ़ारिश नहीं की.

देश की आज़ादी के बाद पहली बार साल 1972 में बनाई गई केएन राज समिति ने भी कृषि पर टैक्स की सिफ़ारिश नहीं की.

यहां तक कि केलकर समिति ने भी 2002 में कहा था कि देश में 95 फ़ीसदी किसानों की इतनी कमाई नहीं होती कि वो टैक्स के दायरे में आएँ.

मतलब साफ़ है कि पांच फ़ीसदी किसानों को टैक्स के दायरे में लाया जा सकता है. और यही सबसे बड़ी वजह है देबरॉय और सुब्रमण्यन के सलाह की.

लेकिन आयकर अधिनियम 1961 की धारा 10 (1) के तहत भारत में कृषि से होने वाली आय कर मुक्त है.

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1,600 रुपये है 70 फ़ीसदी किसानों की आय

क्या कृषि को टैक्स के दायरे में लाया जाना चाहिए इस पर कृषि मामलों के विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा ने बीबीसी से कहा, "उन 70 फ़ीसदी किसानों को टैक्स के दायरे में लाने की बार-बार बात क्यों उठती है जिनकी 2016 के आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक औसतन सालाना आय 20 हज़ार रुपये है. और यह स्थिति देश के 17 राज्यों के किसान परिवारों की है यानी देश के आधे से अधिक हिस्से में किसानों की मासिक आय 16 सौ रुपये से कुछ ही अधिक है. ऐसे किसानों को टैक्स के दायरे में क्यों लाया जाना चाहिए?"

खेती से होने वाली आय पर टैक्स नहीं लगने से इसका फ़ायदा उन बड़े किसानों के पहुंचता है जो संपन्न हैं या फिर उन बड़ी कंपनियों को जो इस सेक्टर में लगी हैं.

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बड़ी कंपनियों को छूट क्यों?

सरकार की नीतियों में विरोधाभास है. टैक्स से छूट के दायरे में खेतिहर ज़मीन से मिलने वाला किराया, फ़सल बेचने से होने वाली कमाई, नर्सरी में उगाए जाने वाले पौधे से होने वाली आय, कुछ शर्तों के साथ फार्महाउस से होने वाली कमाई इत्यादि आती हैं.

लेकिन कृषि पर होने वाली आय को दिखा कर बड़ी कंपनियां बहुत बड़ी रक़म पर टैक्स से छूट पा लेती हैं.

2014-15 में कावेरी सीड्स ने कृषि से 186.63 करोड़ रुपए की आय दर्शाया था. वहीं मॉन्सांटो जैसी अमरीकी कंपनी ने 94.4 करोड़ कृषि से आय दिखाया था.

आयकर विभाग के मुताबिक़ 2006-07 से 2014-15 के बीच 2,746 ऐसे मामले सामने आए थे जिसमें एक करोड़ से अधिक की कमाई को कृषि से होने वाली आय दर्शाया गया था, लेकिन ज़ाहिर है सरकार को टैक्स के रूप में कुछ नहीं मिला.

देवेंद्र शर्मा कहते हैं, "राजनीतिक या आर्थिक रूप से जो किसान टैक्स बचाने के लिए कृषि की आड़ लेते हैं तो उन पर शिकंजा कसने के और भी रास्ते हैं. कंपनियों को कृषि आय से टैक्स में छूट क्यों दी जा रही है? मॉन्सेंटो जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनी को टैक्स फ्री किया जाता है क्योंकि वो बीज पैदा करते हैं तो यह सरकार की ग़लती है. अगर आपको खेती समेत दो स्रोत से आय हैं तो उस पर टैक्स लगाया जाना चाहिए, लेकिन अगर केवल खेती से आय हो रही है तो उस पर टैक्स क्यों?"

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जीडीपी में कृषि का योगदान

शर्मा का कहना है, "बज़ट में सभी छूट की उम्मीद कर रहे हैं. कॉर्पोरेट टैक्स पर छूट होती है. और जिस किसान की आय ही नहीं है उस पर टैक्स क्यों लगाया जाना चाहिए? पहले किसान को वो आय तो दीजिये जिस पर टैक्स लगाने की बात की जाती है. चपरासी को 18 हज़ार महीने के मिलते हैं. अगर हम यह तय कर दें कि किसी न किसी स्रोत से किसानों को मासिक 18 हज़ार रुपये मिलेंगे तो जीडीपी में कृषि का योगदान बढ़कर 30-40 फ़ीसदी पहुंच जाएगा."

वो कहते हैं, "ज़रूरत है किसान आय आयोग के गठन की जो यह तय करे कि किसानों को प्रति महीने कम से कम 18 हज़ार रुपये की कमाई हो. तभी सबका साथ सबका विकास होगा. सरकार को शहर की उस 27 फ़ीसदी आबादी से टैक्स लेने की ज़रूरत है जो नहीं देते हैं."

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कृषि पर टैक्स कहां-कहां?

अमरीका और कई यूरोपीय देशों में कृषि पर टैक्स लगाया जाता है, लेकिन वहां के किसानों की स्थिति भारत से कहीं अलग है.

देवेंद्र शर्मा कहते हैं, "अमरीका और यूरोप में सरकार से 65 हज़ार डॉलर की सब्सिडी दी जाती है फिर टैक्स लगाया जाता है. भारत में चीन में मॉडल की बात की जानी चाहिए. जहां पहले टैक्स लगाया गया, लेकिन बड़े संकट के बाद उसे हटा लिया गया."

पूर्व कृषि सचिव सिराज हुसैन कहते हैं, "जिन बड़े देशों में कृषि पर टैक्स है वहां अगर किसानों की पैदावार घटती है तो बीमा की व्यवस्था है. अगर बाज़ार में क़ीमतें गिरती हैं तो उसके लिए भी बीमा है. हमारे यहां किसानों को यह सुविधा नहीं है."

वो कहते हैं, "अमरीका में किसानों के पास औसतन 250 हेक्टेयर ज़मीन हैं तो हमारे यहां यह केवल एक हेक्टेयर. इतना बड़ा अंतर होने के कारण हम अमरीका या उन देशों जहां कृषि पर टैक्स है, उससे तुलना नहीं कर सकते हैं."

किसान और टैक्स

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अमीर किसान और टैक्स की चोरी

जब भी किसानी पर टैक्स की बात होती है तो लोगों के जेहन में ग़रीब किसान ही आते हैं. लेकिन टैक्स चोरी की बात उन किसानों की नहीं होती बल्कि उन अमीर किसानों की होती है जो अपनी अन्य आय को कृषि या इससे जुड़ी बताकर सरकार से आयकर में छूट ले लेते हैं.

विश्व बैंक में कर सुधार (टैक्स रिफॉर्म) पर काम कर रहे राजुल अवस्थी का मानना है कि अगर भारत के टॉप 4.1 फ़ीसदी किसान परिवारों पर 30 फ़ीसदी की दर से आयकर लगाया जाए तो कृषि टैक्स के रूप में सरकार के ख़जाने में 25 हज़ार करोड़ रुपए आएंगे.

मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन ने भी देबरॉय की बातों का समर्थन करते वक़्त यह कहा था कि किसानों पर टैक्स को इस नज़रिए से देखें कि कमाई करने वाला देश का हर अमीर टैक्स के दायरे में आना चाहिए, भले ही वह किसान हो.

कृषि

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कृषि आय का निर्धारण आसान नहीं

बीबीसी से पूर्व कृषि सचिव सिराज हुसैन ने कहा, "2019 में चुनाव के मद्देनज़र केंद्र सरकार कृषि पर टैक्स की जोखिम नहीं लेगी. मौजूदा हालात में टैक्स लगाया जाना मुमकिन भी नहीं है. कृषि में इसके लिए कोई मानदंड नहीं है इसलिए आयकर विभाग के लिए किसानों की आय का आकलन करना भी आसान नहीं होगा."

वो कहते हैं, "कृषि की आय का निर्धारण करना आसान नहीं है, लेकिन जो लोग अपनी दूसरे किसी तरह की आय को कृषि की आय को दिखाकर उस पर छूट ले रहे हैं उसे रोका जाना चाहिए. सबका साथ सबका विकास करने के लिए यह ज़रूरी है कि दो देश के देहाती इलाक़ों में रहते हैं या जो कृषि पर आधारित हैं, उनकी आमदनी बढ़ाने के लिए नीति बनाई जाए."

किसान बाज़ार

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किसानों के लिए बजट में क्या ज़रूरी?

हुसैन कहते हैं, "सरकार को कृषि विपणन यानी एग्रिकल्चर मार्केटिंग में सुधार करना चाहिए. देश के अधिकांश राज्यों में भाजपा की सरकार है इसलिए ऐसा कर पाना संभव भी है."

उन्होंने कहा, "जब पूरे देश में कृषि उत्पादों की क़ीमतें गिरी हुई थीं तो झारखंड के गुमला में दाम नहीं गिरे हुए थे, क्योंकि उस इलाक़े में उतनी पैदावार ही नहीं है. सीधे तौर पर इसका मतलब यह है कि पूरे देश के लिए एक तरह की पॉलिसी नहीं बनायी जा सकती."

कॉटन के किसान

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वो कहते हैं, "कपास के किसानों की अलग समस्या है तो कहीं पानी को लेकर समस्याएँ हैं. बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में मंडी की व्यवस्था ही नहीं है. एक बड़ा मसला फ़सल बीमा का भी है. ज़रूरत है किसानों की आय बढ़ाने की."

ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी का वो चुनावी वादा याद आता है, जिसमें उन्होंने स्वामीनाथन समिति के अनुसार किसानों की लागत पर 50 फ़ीसदी मुनाफा देने का वादा किया था.

सिराज हुसैन कहते हैं, "सरकार को कृषि के जुड़ी मशीनों की क़ीमतों को कम करने को सोचना चाहिए. कीटनाशकों पर जीएसटी को कम किया जा सकता है. ड्रिप इरिगेशन को बढ़ावा देने के लिए इसका आवंटन बढ़ा सकती है.''

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