नज़रिया: नीतीश कुमार को समाज सुधारक का तमगा क्यों चाहिए?

    • Author, मणिकांत ठाकुर
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, पटना से

जिस राज्य में छोटे-बड़े घोटालों का सिलसिला थम ही नहीं रहा हो. जहाँ बढ़ते अपराध और बढ़ती घूसख़ोरी पर नियंत्रण के तंत्र ही नाकाम दिख रहे हों. जिसकी अनेक लंबित विकास परियोजनाओं पर ग्रहण लगा हुआ हो. जहाँ सरकारी प्रतिबंधों में फँस कर लगभग ठप पड़े हुए बालू कारोबार की वजह से राज्य के निर्माण-क्षेत्र में हाहाकार मचा हो. उस बिहार में सरकार की, ख़ास कर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की प्राथमिकताएँ किसी को भी हैरत में डाल सकती हैं.

'इवेंट्स मैनेजमेंट' बहुत पहले से ही इस सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता रही है.

इसी क्रम में एक बार फिर मानव श्रृंखला बनाने में पूरे राज्य का प्रशासन पगलाया हुआ-सा लगता है. सरकारी दफ़्तरों के ज़्यादातर कामकाज फ़िलहाल दरकिनार कर दिए गए हैं.

तमाम ज़िलों के सरकारी कर्मियों पर एक ही धुन सवार है कि यह 'ह्यूमन चेन' पिछली बार से भी ज़्यादा लंबी हो.

इस बार दहेज प्रथा और बाल विवाह के ख़िलाफ़ जागरूकता के लिए 21 जनवरी को मानव श्रृंखला बनाने की तैयारी युद्ध स्तर पर जारी है.

एक साल पहले भी 21 जनवरी को ही शराबबंदी के समर्थन में मानव श्रृंखला बनी थी जिसमें चार करोड़ से भी अधिक लोगों के शामिल होने का दावा किया गया था. उसकी तैयारी पर सरकारी ख़ज़ाने से बड़ी धनराशि ख़र्च की गई.

उस आयोजन का लाभ चूँकि उसके सूत्रधार, यानी सूबे के सरकारी राजा की छवि चमकाने तक ही सीमित रह गया, इसलिए कुछ ही दिन में लोग उसे भूल गए.

अब सूत्रधार के साथी बदल गए हैं. लालू परिवार की जगह फिर से भाजपाई काबिज़ हो गए हैं.

उस समय ऐसी श्रृंखला को यहाँ के भाजपाई नेता फ़िजूलख़र्ची और नौटंकी बता रहे थे. अब हो रहे वैसे ही आयोजन को लालू ख़ेमा 'नीतीश की नौटंकी' मान कर विरोध या बहिष्कार पर उतर आया है.

ऐसे तमाम लोग इस आयोजन में असहयोग का रवैया अख़्तियार किए हुए हैं, जो नीतीश सरकार के कामकाज से इन दिनों बेहद ख़फ़ा हो उठे हैं.

इसके सबूत मुख्यमंत्री की मौजूदा 'समीक्षा यात्रा' के दौरान काले झंडे दिखाने, ढेला-पत्थर चलाने और 'हाय-हाय' के नारे लगाने जैसे विरोधों की शक्ल में झलक रहे हैं.

यह भी कहा जा रहा है कि राष्ट्रीय जनता दल समर्थक मुखिया-सरपंच वाली ग्राम पंचायतों ने इसबार मानव श्रृंखला में असहयोग का मन बना लिया है.

मानव श्रृंखला पर ज़ोर क्यों?

इसी विषय पर हाल ही चाय के ढाबे पर चल रही बहस में उछला यह जुमला एक दिन मैंने सुना- 'लालू भोगे जेल और नीतीश करे खेल? यह नहीं चलेगा!'

अगर इन सियासी विरोध और समर्थन को छोड़ भी दें, तो भी इन दिनों आम चर्चा में सामने आ रहे जनाक्रोश यहाँ राज्य सरकार की मनमर्ज़ी वाली प्राथमिकताओं पर सवाल बन कर उभरे हैं.

लोग खुलेआम पूछ रहे हैं कि दहेज और बाल विवाह के ख़िलाफ़ पहले से बने क़ानून लागू करवाने की अगर कूवत नहीं है, तो अरबों के ख़र्च पर यह सरकारी तमाशा क्यों ?

दूसरा सवाल कि बेक़ाबू भ्रष्टाचार, महंगाई, अपराध और घोटालों के ख़िलाफ़ यह सरकार मानव श्रृंखला का आयोजन क्यों नहीं करती?

क्या यह माना जाए कि बुनियादी समस्याओं के हल में विफल सरकार का मुखिया अब समाज सुधारक के चोले में अपनी छवि चमकाने की चालाकी में जुटा है?

इसी प्रसंग का एक और दुखद पहलू है. छोटे-छोटे स्कूली बच्चों को इस कड़ाके की ठंड में रविवार सुबह सड़कों पर कतारबद्ध कर दिया जाएगा.

राज्य सरकार के शिक्षा विभाग और अन्य प्रशासनिक महकमे की सख़्त हिदायत को नज़रअंदाज़ करने वाले स्कूल-शिक्षकों पर गाज गिरनी तय है.

पिछली बार भी इसी डर के मारे शिक्षकों ने बच्चों की भीड़ सड़कों पर उतार कर मानव श्रृंखला को कथित रूप से कामयाब बनाया था.

इस बार एक ख़ास बात यह हुई है कि पटना हाइ कोर्ट ने स्कूली बच्चों को जबरन इसमें शामिल करने से बाज़ आने को कहा है. इसलिए राज्य सरकार को अदालत में आश्वासन देना पड़ा कि किसी के साथ ज़बर्दस्ती नहीं की जाएगी.

लेकिन सच्चाई यही है कि इस श्रृंखला को हर हाल में अभूतपूर्व बनाने पर उतारू नीतीश सरकार हर तरह के हथकंडे अपनाने से नहीं चूकेगी.

ऐसा इसलिए क्योंकि सरकारी स्कूलों से हाँक-हाँक कर बड़ी तादाद में जुटाए गए बच्चे ही मानव श्रृंखला की लंबाई बढ़ाते हैं. इस बार 13 हज़ार 666 किलोमीटर लंबी चेन बनाने का लक्ष्य रखा गया है.

यानी अगर बड़ी संख्या में बच्चे इसमें शामिल न हों तो इसका फ़्लॉप होना निश्चित मानिए.

नीतीश की 'नाक' का सवाल

इस बार तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का यह सीना ठोक एलान है कि पाँच करोड़ से ज़्यादा लोगों की भागीदारी वाली रिकॉर्ड-तोड़ मानव श्रृंखला बना कर इसे वह गिनीज़ बुक में दर्ज़ करवा के रहेंगे.

इसीलिए तो अगले महीने रिटायर होने वाले राज्य के वर्तमान मुख्यसचिव अपने मुख्यमंत्री के ऐलान को सही साबित करने के लिए अपनी पूरी टीम के साथ जी-जान लगाए हुए हैं.

बीते साल 'प्रकाश पर्व' वाले 'इवेंट-मैनेजमेंट' से मिली वाहवाही की गूँज उन्हें अबतक सुनाई दे रही होगी.

यह बात और है कि पटना में उस आयोजन के समय दिखी स्वच्छता या सफ़ाई को फिर से गंदगी में तब्दील होते देर नहीं लगी.

'बिहार दिवस' से लेकर 'मानव श्रृंखला' तक के अति प्रचारित कई भव्य आयोजनों पर इस ग़रीब राज्य की अमीर सरकार ने पानी की तरह पैसे बहाए.

मुख्यमंत्री की व्यक्तिगत छवि उस समय जितनी भी चमकी हो, बिहार का बदहाल चेहरा तो मलिन का मलिन ही रहा.

इसमें दो मत नहीं कि शराबबंदी से बिहार के आम जनजीवन को बड़ी राहत मिली. लेकिन शराब के धंधेबाज़ों ने उसके बाद जो शराब के ही अवैध कारोबार की दुर्गन्ध फैला रखी है, उसे रोकने में सरकार नाकाम क्यों हो रही है?

'समाज सुधारक नीतीश'

पुलिस वाले, ठेका वाले और पार्टी वाले बिगड़ैलों की तो और मौज हो गई. कहते हैं, उनकी कमाई पहले से दोगुनी-तिगुनी हो गई है. उधर दहेज लेने-देने वालों को पकड़ना तो और भी कठिन है.

मज़ाक़ में कहा जाने लगा है कि दहेज लेने वालों का, दारू पीने वालों की तरह मुँह भी नहीं महकता ताकि पुलिस सूँघ कर पकड़ ले.

ख़ैर, अब यह देखना है कि रविवार को बिहार की सड़कों पर जो मीडिया का हुजूम उतरेगा या उतारा जाएगा, वह इस मानव श्रृंखला के सरकारी पहलू पर ही केंद्रित रहता है या वास्तविकता से जुड़े मानवीय पहलुओं पर भी नज़र डालेगा.

वैसे, ज़ाहिर यही हो रहा है कि सुशासन के दावेदार नीतीश कुमार अपने दावे पर उठ रहे सवालों से उकता कर अब समाज सुधारक की प्रसिद्धि पाने जैसी जुगत में लगे हैं.

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