#HerChoice आख़िर क्यों मैंने एक औरत के साथ रहने का फ़ैसला किया?

#HerChoice, औरतों की कहानियां, रिलेशनशिप, शादी, प्यार

मैं और मेरी सहेली लेस्बियन नहीं हैं. यानी हम एक-दूसरे से शारीरिक रूप से आकर्षित नहीं हैं. हमारा आकर्षण रूहानी है. इसीलिए हम क़रीब 40 साल से साथ रह रहे हैं.

अब 70 के हो चले हैं. जब साथ रहने का फ़ैसला किया तब क़रीब 30 के थे.

जवानी के उन दिनों में रोमांच से ज़्यादा सुकून की तलाश थी. मुझे भी और उसे भी.

मेरे और मेरी सहेली के एक साथ रहने के फ़ैसले की ये सबसे बड़ी वजह है.

साथ पसंद, लेकिन पसंद जुदा

हम दोनों एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं.

मुझे इस उम्र में भी चटख रंग पसंद आते हैं. लिपस्टिक लगाना सुहाता है, लेकिन उसको फीकी चीज़ें ज़्यादा पसंद आती हैं.

उम्र 70 की होने को है फिर भी मैं तो हील वाली सैंडिल पहनती हूं और वो हर व़क्त डॉक्टर्स स्लीपर पहनकर घूमती है.

मैं टीवी देखती हूं तो वो मोबाइल में घुसी रहती है. कहती है, 'बुढ़ापे में तुमने क्या रोग पाल लिया है.'

यही हमारी ज़िंदगी है. थोड़ी सी नोक-झोंक और अपने तरीके से जीने की पूरी आज़ादी.

हम दो लोग एक घर में तो रहते हैं, लेकिन हमने एक दूसरे की दुनिया को अनछुआ ही छोड़ रखा है.

आजकल की शादियों में शायद इतना खुलापन ना हो. उम्मीदें अक़्सर ज़्यादा होती हैं तो रिश्ते उनके बोझ तले कमज़ोर होकर टूट भी जाते हैं.

बीबीसी कीविशेष सिरीज़ #HerChoice12 भारतीय महिलाओं की वास्तविक जीवन की कहानियां हैं. ये कहानियां 'आधुनिक भारतीय महिला' के विचार और उसके सामने मौजूद विकल्प, उसकी आकांक्षाओं, उसकी प्राथमिकताओं और उसकी इच्छाओं को पेश करती हैं.

'आज भी एक-दूसरे को पूरी तरह नहीं जानते'

वैसे मेरी शादी भी टूटी, पर जीवन का वो अध्याय अब बीत गया, उसके पन्ने पलटना मुझे पसंद नहीं.

बच्चे बड़े हो गए हैं और अपनी ज़िंदगी में आगे बढ़ गए हैं.

मेरी सहेली तो हमेशा अकेले रहने में यक़ीन करती थी. बल्कि अब भी करती हैं. हम साथ हैं भी और नहीं भी.

इतने साल बाद भी कई बार ऐसा होता है कि हमें एक-दूसरे की कोई नई आदत पता चल जाती है.

यही हमारे रिश्ते की ख़ूबसूरती है. हम आज भी एक-दूसरे को पूरी तरह नहीं जानते हैं और यही वजह है कि 'चार्म' बना हुआ है.

लोग हमसे पूछते हैं कि आप दोनों बोर नहीं हो जातीं सिर्फ़ एक-दूसरे को देखकर? लेकिन सच तो ये है कि हम एक-दूसरे से बहुत कम बात करते हैं.

हम एक घर में तो रहते हैं, लेकिन कई बार ऐसा होता है कि हम सिर्फ़ खाने की मेज़ पर मिलते हैं और फिर अपने-अपने काम पर लग जाते हैं.

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'वो हमें हर रोज़ डराती थी...'

जब हम नौकरी करते थे तभी से ये आदत है, जो आज भी जस की तस बनी हुई है.

शुरू-शुरू में जब कामवाली आती थी तो बड़े पसोपेश में रहती थी.

रोज़ पूछती थी कि क्या हमारा कोई रिश्तेदार नहीं है? कोई अपना जो अभी जवान हो और हमारे साथ रह सके?

मैं उससे बहस नहीं करना चाहती थी. उसे क्या समझाती कि रिश्तेदारों और दोस्तों के मामले में हम बहुत धनी हैं, लेकिन एक-दूसरे के साथ रहने की ये ज़िंदगी सोच-समझकर चुनी है.

वो हमें हर रोज़ डराती थी कि कोई मारकर चला जाएगा, घर में चोरी हो जाएगी...

मैं उसकी बातें सुनकर हंसती थी. एक दिन उसको बैठाकर कह डाला कि हमारे पास कुछ भी ऐसा नहीं है जो चोर यहां आए और खुश होकर जाए.

चोर अगर आएगा भी तो सफ़ेद-भूरे रंग से पुती हमारे घर की दीवारों को देखकर समझ जाएगा कि यहां कैसे लोग रहते हैं.

मेरी बात उसे कितनी समझ आई ये तो नहीं पता, लेकिन समय-समय पर वो हमारे इस तरह रहने पर अफ़सोस ज़रूर जता देती है.

लोगों की सोच कोअहमियत नहीं

सच ये है कि हमारी ज़िंदगी वैसी ही है जैसी हमने सोची थी.

मैं आराम से उठती हूं. हमारी ज़िंदगी में हड़बड़ी नहीं है.

मैं कभी नहीं चाहती थी कि जब मैं सुबह सोकर उठूं तो अपने अलावा हर चीज़ की टेंशन मेरे दिमाग में रहे.

इसका ये मतलब बिल्कुल नहीं है कि रिश्तों की ज़िम्मेदारी से बचने के लिए हम दोनों ने ये फ़ैसला किया.

हमारे घर आने वालों को या जिनसे हम मिलते हैं उन्हें लगता है कि हम पर कोई ज़िम्मेदारी नहीं है तो हम मज़े में हैं, लेकिन क्या अपनी ज़िम्मेदारी कम होती हैं?

हम दोनों अपनी ज़रूरतों के लिए किसी का मुंह नहीं ताकते. हम ख़ुद की ज़िम्मेदारी तरीके से निभाते हैं.

पहले लोगों को लगता था कि हम साथ रहते हैं तो कुछ गड़बड़ ज़रूर है. हमारे बीच में कुछ और है. पर लोगों की सोच को ठीक करना या अहमियत देना मेरी फ़ितरत नहीं है.

मैं सिंदूर लगाती हूं, बिछिया पहनती हूं, नाक में सोना भी पहनती हूं.

जब तक दिल कर रहा है पहनूंगी, मन भर जाएगा तो नहीं पहनूंगी.

आखिर इसमें ग़लत क्या है...

इस रिश्ते में रहते हुए जो एक बात समझ आई वो ये कि आप ज़िंदगी तो किसी के भी साथ बिता सकते हैं, लेकिन जी उसी के साथ सकते हैं जो आपके साथ तो रहे, लेकिन आप में घुसे नहीं.

लोगों को हमारी संतुलित ज़िंदगी बड़ी अजीब लगती है.

समझ ही नहीं आता कि दो सहेलियां हैं, अपना खा रही हैं, रह रही हैं. न तो किसी से कुछ मांगती हैं, न कहती हैं, अपने में रहती हैं. इसमें ग़लत क्या है... ये अजीब क्यों है?

(यह कहानी उत्तर भारत में रहने वाली एक महिला की ज़िंदगी पर आधारित है जिनसे बात की बीबीसी संवाददाता भूमिका राय ने. महिला के आग्रह पर उनकी पहचान गुप्त रखी गई है. इस सिरीज़ की प्रोड्यूसर दिव्या आर्य हैं.)

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