ब्लॉग: 'ये बताना मुश्किल कि मीडिया और सरकार में ज़्यादा बदसूरत कौन है'

इमेज स्रोत, PTI
- Author, वुसतुल्लाह खान
- पदनाम, पाकिस्तान से बीबीसी हिंदी के लिए
25 दिसंबर को इस्लामाबाद में कुलभूषण की माता और पत्नी के साथ होने वाली खिलवाड़ और इसके बाद हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के उर्स में पाकिस्तानी यात्रियों को वीज़ा न देने के बारे में कुछ भी तो आश्चर्यजनक नहीं है.
ऐसी सरकारों और ऐसे लोगों के लिए मियां मुहम्मद बख़्श ने सवा सौ वर्ष पहले ही कह दिया थाः
नीचां दी अस्नाई को लो फैज़ किसे न पायाकि कर ते अंगूर चढ़ाया, हर गुच्छा जख्माया
कुछ समय पहले तक हम जैसे संता-बंता समझते थे कि सरकार भले ही कैसी भी दूध की धुली हो मगर मीडिया वो आईना है जिसमें सरकार की बदसूरती साफ़-साफ़ नज़र आ जाती है. पर अब दिन ब दिन ये बताना मुश्किल होता जा रहा है कि मीडिया और सरकार में ज़्यादा बदसूरत कौन है.
कोई सोच सकता था कि आईने को भी जंग लग सकता है, मगर लग गया.
कल का मीडिया सरकारों की हाजिरी लगाता था, आज वो पत्रकार ही नहीं माना जाता जो सरकार का दंभ न भरे या व्हाट्सऐप पर आने वाली लाइन को साष्टांग दंडवत प्रणाम न करे. ये साबित न कर सके कि ज्यादा ज़हर में बुझी हुई रिपोर्टिंग या टॉक शो कौन कर सकता है, बिलो दि बेल्ट प्रश्न कौन किस पर उछाल सकता है. दुम हिलाती भीड़ में सबसे ऊपर कौन चीख सकता है?
सर मैं... मुझे देखें... मैं ये सब कर सकता हूं... सर...
भारत हो या पाकिस्तान, ऐसे कितने पत्रकार, एंकर या लेखक बाकी हैं जो सरकारों की गुड बुक में रहने या रेटिंग का तमगा उचकने की पागल दौड़ में शामिल न हों.
जवाब चाहिये तो अपने हाथों पैरों की सब उंगलियां गिन लें, और फिर भीड़ से अलग खड़े पत्रकारों और एंकरों के नाम पन्ने पर लिखते जायें. रात से सुबह हो जायेगी 20 नाम पूरे करते करते.
और जो हैं भी उन्हें इतनी हैरत से देखा जाता है जैसे न्यूड बीच पर कोई कपड़े पहन कर आ निकला हो.
इस माहौल के नतीजे में किसी की भी मां, बहन, मेहमान, कातिल, मक़तूल, झूठ, सच, प्लांटेड सवाल, आज़ादी और बदतमीज़ी के बीच की तमीज़ उठ जाना बिल्कुल भी एबनॉर्मल नहीं बल्कि ये तो न्यू नॉर्मल है.
पहले मां ही तरबियत करती थी, आज टीवी और सोशल मीडिया मां की सौतन हैं. बात सुनना आउटडेटेड, शटअप कॉल नया फैशन. गाली परंपरा, अफवाह नया नियम. तलवे चाट लो या चटवा लो नया क़ानून.
घंटे भर की रेटिंग के लिए कुछ भी करेगा. करोड़ों लोगों के दिलों में ज़हर ना सही, शक ही सही.
अगर यह आज की सचाई नहीं तो फिर यूं करो कि इससे अलग कुछ कह या कर के दिखा दो. वो भी गालियां खाए, गायब हुये या कत्ल हुए बिना. तब जानें.
पर इसका ये मतलब तो नहीं कि मैं ये भी न कहूं कि ए वैरी वैरी हैप्पी न्यू ईयर. खुदा मेरे तमाम अंदाजे नए साल में ग़लत साबित करे. आमीन.















