मुंबई आग हादसा: 'दो मिनट में सब जलकर खाक हो गया'

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मुंबई के लोअर परेल इलाक़े की कमला मिल्स कॉम्पलेक्स में आग लगने से 14 लोगों की मौत हो गई है. आग लगने की वजह का फ़िलहाल पता नहीं चल पाया है.
आग लगने के वक़्त बीबीसी गुजराती के संपादक अंकुर जैन अपनी बहन के साथ उसी कॉम्पलेक्स में बने 'वन अबव' रेस्टोरेंट में मौजूद थे.
उन्होंने बताया कि उस समय लगभग 100 लोग रेस्टोरेंट में थे.
अंकुर की बहन हितांशी ने कहा कि वे इस हादसे को भुला नहीं पाएंगी.

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पलक झपकते फैल गई आग
हितांशी के मुताबिक़, "आग लगने की ख़बर फैलते ही वहां भगदड़ मच गई. हम उस वक़्त डीजे कंसोल के पास खड़े, टेबल मिलने का इंतज़ार कर रहे थे."
अंकुर ने बताया कि, "रात के करीब 12.25 बज रहे थे. हितांशी दौड़ती हुई आई और हमें अलर्ट किया कि रेस्टोरेंट में कोई कह रहा है कि कहीं आग लगी है. थोड़ी देर में ही हमें लपटें दिखाई देने लगीं. हमें उम्मीद थी कि वहां आग को लेकर सुरक्षा के इंतज़ाम पुख़्ता होंगे लेकिन पलक झपकते ही चारों तरफ आग की लपटें फैल चुकी थीं."
अंकुर के मुताबिक़, "रेस्टोरेंट के स्टाफ़ ने हमें फ़ायर एग्ज़िट की जानकारी दी लेकिन यह बहुत पतली सी जगह थी. वहां रबड़ की सीट, इलेक्ट्रॉनिक वायर पड़े थे. जब हम सीढ़ी पर पहुंचे तो हमें अपना चौथा साथी नहीं दिखा. हम उसका इंतज़ार करने लगे लेकिन महज़ दो से तीन मिनट में वहां आग ही आग दिखने लगी."
थोड़ा रुककर अंकुर आगे कहते हैं कि "लोगों ने हमसे कहा कि आप नीचे जाएं, अगर आपके साथ के लोग नहीं मिल रहे तो वे दूसरी तरफ से उतर गए होंगे. नीचे उतरते वक़्त हमें पीछे से धमाके की आवाज़ें सुनाई पड़ रही थीं. तीन मंज़िला इमारत से नीचे आकर ऊपर देखा तो 10 से 12 फ़ीट की लपटें दिख रही थीं."

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'महिला शौचालय में अलर्ट नहीं कर पाई'
अंकुर के मुताबिक़ "कमला मिल्स कॉम्पलेक्स में मौजूद गार्ड मदद के लिए आगे आए और लोगों को वहां से हटने के लिए कहा गया. मैंने अग्निशमन को फ़ोन कर आग की ख़बर दी. उन्हें इसकी जानकारी मिल चुकी थी और दो गाड़ियां हादसे की जगह के लिए निकल चुकी थीं."
हितांशी ने बताया कि 'उन्होंने पुरुष शौचालय से निकल रहे लोगों को आग की सूचना दी थी, साथ ही शौचालय के दरवाज़े को खटखटाकर भी लोगों को इसकी जानकारी दी, लेकिन उन्हें महिला शौचालय नहीं दिखा.'
ग़ौरतलब है कि मरने वाले 14 लोगों में से 12 महिलाएं हैं.
अंकुर ने कहा, "सुबह अख़बार में पढ़ा कि मृतकों में अपना जन्मदिन मनाने आई एक लड़की भी शामिल थी तो 2001 के गुजरात भूकंप की याद आ गई, जब हम सीढ़ियों से दौड़ कर घर से बाहर निकले थे."

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'एग्ज़िट ठीक होता तो बच सकते थे'
अंकुर कहते हैं, "सवाल यह उठता है कि अगर रेस्टोरेंट के पास लाइसेंस था तो वो उसे कैसे मिला क्योंकि आग के दौरान बचकर निकलने का रास्ता नियमों के मुताबिक़ नहीं था. यह बहुत छोटा था. इसके दोनों तरफ जो चीज़ें रखी थी, उन्हें वहां नहीं होना चाहिए था. इस जगह को खाली रखा जाना चाहिए था."
अंकुर के मुताबिक़ अगर आग लगने पर बचाव के इंतज़ाम पूरे होते तो इतनी जानें नहीं जाती.
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