क्या मूंगफली बिगाड़ देगी गुजरात में बीजेपी का सियासी खेल?

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- Author, अभिजीत श्रीवास्तव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
किसानों को मिलने वाली मूंगफली की क़ीमत गुजरात चुनाव में एक बहुत बड़ा मुद्दा है जिसकी चर्चा मंदिर, पाकिस्तान और मोदी के सी-प्लेन की कवरेज के आगे दब गई है.
मगफड़ी या सींगदाना, इन दोनों नामों से मूंगफली को गुजरात में जाना जाता है. कम पानी, पर्याप्त धूप और सामान्य से कुछ अधिक तापमान मूंगफली की अच्छी पैदावार के लिए बेहद आवश्यक हैं, जो मूंगफली की फ़सल को पिछले साल की तरह ही इस बार भी मिले हैं और राज्य में रिकॉर्ड पैदावार हुई है.
पिछले एक दशक से गुजरात मूंगफली उगाने के मामले में देश में अव्वल रहा है, लेकिन इस बढ़ती पैदावार की वजह से कीमतें गिरी हैं और किसानों की लागत वसूल नहीं हो पा रही है.
केंद्र ने 2017-18 के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 4,450 रुपये (प्रति क्विंटल) रखा है जो पिछले साल की तुलना में 200 रुपये अधिक है. राज्य सरकार मूंगफली किसानों को ख़रीद पर केंद्र से 50 रुपये अधिक यानी 4,500 रुपये दे रही है. आंकड़ों में यह दिखता है कि इसमें कुछ रुपये का इज़ाफ़ा हुआ है, लेकिन वास्तविकता ऐसी नहीं है.

'मूंगफली की कीमत नहीं मिल रही'
सरकार के पास पर्याप्त गोदाम नहीं हैं और कृषि उत्पाद बाज़ार समितियों में मूंगफली की उचित कीमत नहीं मिल रही.
सोमा के पूर्व अध्यक्ष खिमजी भाई गोजिया बताते हैं, "समूचे राज्य में 35 लाख टन यानी लगभग 19 करोड़ बोरियों का उत्पादन हुआ है.''
साथ ही वो प्रश्न भी उठाते हैं कि "सरकार एक या दो करोड़ बोरियां ख़रीद लेगी, लेकिन बाकी 17 करोड़ बोरियों का क्या होगा? सरकार को इसके लिए सोचना होगा."
वो कहते हैं, "सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ा कर 900 रुपये कर दिया, लेकिन बाज़ार में किसानों को इसकी कीमत 700 रुपये मिलती है."
खिमजी भाई के अनुसार, "सरकारी ख़रीद मार्च तक चलेगी. गोदामों में जगह नहीं हैं, इसलिए ख़रीदी केंद्र अभी और नहीं खरीद रहे. गाड़ियों से सामान नहीं उतर रहे. किसानों को वहां खड़ी गाड़ियों के पैसे कौन देगा?"
हालांकि खिमजी भाई इस बात से इनकार करते हैं कि किसानों से कोई कमीशन लिया जाता है.

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मूंगफली की ख़रीद में भष्टाचार?
सौराष्ट्र के मूंगफली किसान अश्विन रत्नपाड़ा कहते हैं कि पूरे तालुका में 6-7 सरकारी ख़रीद केंद्र ही हैं जिसकी वजह से लंबी लाइन लगती है और कई किसानों का नंबर ही नहीं आता है. वो अपनी लगभग 4 टन मूंगफली की बिक्री का इंतजार कर रहे हैं.
वो कहते हैं, "क़ीमत बहुत कम मिल रही है. सरकारी केंद्र में लाइन में लगे रहने पर भी नंबर नहीं आता है. यहां ख़रीदी में भ्रष्टाचार भी हो रहा है. अगर आपको मूंगफली बेचनी है तो अलग से पैसे मांगे जाते हैं. करप्शन का कोई निश्चित भाव नहीं है."

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अगली फ़सल लगी, पिछली अभी बिकी नहीं
जूनागढ़ के केशव तालुका के मूंगफली किसान मगनभाई अगहेड़ा की खेतों में अगली बुआई चने की हो गई है, लेकिन उनकी मूंगफली की फ़सल अभी आधी ही बिकी है.
वो कहते हैं, "18 हज़ार का भाव मिला है, लेकिन सरकारी केंद्रों में ख़रीदी व्यापारियों से हो रही है, किसानों से नहीं."
अगहेड़ा बताते हैं, "सरकार पूरी फ़सल नहीं ख़रीद सकती. सरकारी एजेंसियां कमीशन लेती हैं. सभी को कमीशन देना पड़ता है. हर 400 किलो पर एक हज़ार रुपए वसूले जा रहे हैं."
मगनभाई कहते हैं, "कमीशन बंद होना चाहिए. गुंडागर्दी हो रही है. इस बार पूरे गुजरात के मूंगफली किसान कांग्रेस को सपोर्ट कर रहे हैं."
गुस्से में मगनभाई ने कहा, "किसानों को सरकार ने बेहाल कर दिया है. पिछले साल कीट से फ़सल को बहुत नुकसान हुआ, लेकिन फ़सल बीमा से मुआवज़ा नहीं मिला. इस बार परिवर्तन तो होकर रहेगा."

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मूंगफली उत्पादन में गुजरात अव्वल
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मूंगफली उत्पादक देश है. वहीं देश में इसका सबसे ज़्यादा उत्पादन गुजरात में होता है. देश के कुल मूंगफली उत्पादन का लगभग 50 फ़ीसदी इसी राज्य से आता है.
इसके साथ ही यहां पिछले दो वर्षों से उपज में भी लगातार अच्छी ख़ासी वृद्धि हो रही है.
भारत में विभिन्न प्रकार के तिलहन फ़सलों में लगभग एक चौथाई मूंगफली का हिस्सा है.
मूंगफली, कपास बीज, सोयाबीन, सूरजमुखी समेत मक्के के तेल उत्पादन में लगे कनेरिया ऑयल इंडस्ट्रीज के प्रबंध निदेशक सुरेश कनेरिया का कहना है, "गुजरात देश में सबसे बड़ा मूंगफली उत्पादक राज्य है. बावजूद इसके यहां के किसानों को इसके उत्पादन से उतना मुनाफा नहीं हो रहा जितना होना चाहिए. किसानों को भाव पूरा मिल नहीं रहा."

मूंगफली का साथ छोड़ते किसान
बड़ौदा से 20 किलोमीटर दूर वाघोड़िया के किसान भावेश रविंद्रभाई पटेल बताते हैं कि पहले वहां भी खेती होती थी, लेकिन अब नहीं.
भावेश कहते हैं, "मूंगफली में मेहनत ज़्यादा लगती है, लेकिन उत्पादन कम होने के वजह से यहां के किसानों ने इसकी खेती बंद कर दी है. हालांकि इसके पीछे एक और प्रमुख वजह जंगली सूअर हैं जो इसकी खेती को बहुत नुकसान पहुंचाते हैं."
अब भावेश केला, आलू, मेथी के उत्पादन में लगे हैं. केले के उत्पादन में भी गुजरात देश के शीर्ष राज्यों में है. हालांकि भावेश ने यह स्पष्ट किया कि उनका किसा राजनीतिक पार्टी से कोई लेना देना नहीं है और उन्होंने मूंगफली की खेती इसलिए छोड़ी क्योंकि केले की खेती में मुनाफा ज्यादा है.

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मूंगफली को कितना जानते हैं आप?
मूंगफली का वैज्ञानिक नाम अराचिस हाइपोजिया है. दक्षिण भारत में भी मूंगफली की खेती बड़े पैमाने पर होती है. बेंगलुरू में 16 शताब्दी से ग्राउंडनट फ़ेस्टिवल मनाया जाता है.
- चीन के बाद मूंगफली का सर्वाधिक उत्पादन भारत में होता है. इसे सींगदाना या सेंगफली भी कहते हैं.
- बिनौला, सरसों, सोयाबीन के साथ ही मूंगफली की खली का पशु आहार के रूप में बहुतायत में उपयोग किया जाता है.
- पीनट बटर के बारे में तो आपने सुना या खाया होगा, इसे मूंगफली से ही बनाया जाता है. भारत में मूंगफली और गुड़ से बनी पट्टी का भी बड़ा बाज़ार है. मूंगफली की चिक्की और मूंगफली के लड्डू भी खासे पसंद किए जाते हैं.
- मूंगफली के तेल में अन सैचुरेटेड फ़ैट यानी असंतृप्त वसा होती है जो हाई ब्लड प्रेशर के रोगियों और हार्ट के लिए फ़ायदेमंद होता है.
- डायबिटीज़ में भी यह तेल लाभप्रद होता है. इससे शरीर में इंसुलिन की समुचित मात्रा बनी रहती है और खून में ग्लूकोज़ का स्तर सामान्य और नियंत्रित रहता है.
- मूंगफली का तेल शरीर में मौजूद वसा के स्तर को भी नियंत्रित करता है. यह शरीर का वजन कम करने में भी सहायक है.
- विटामिन ई भरपूर होने की वजह से मूंगफली का तेल बालों और त्वचा के लिए भी बेहद फ़ायदेमंद है.
- इसके उपयोग से बालों का झड़ना और रूसी की समस्या पर काबू पाने के साथ ही त्वचा की झुर्रियों को नियंत्रित भी किया जा सकता है.
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