यूपी निकाय चुनाव: बीजेपी की 'प्रचंड जीत' के बावजूद ख़तरे की घंटी!

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    • Author, समीरात्मज मिश्र
    • पदनाम, लखनऊ से, बीबीसी हिंदी के लिए

उत्तर प्रदेश के नगर निकाय चुनाव को आठ महीने पहले मुख्यमंत्री बने आदित्यनाथ योगी की बड़ी परीक्षा के रूप में देखा जा रहा था. परिणाम आने के बाद योगी इस परीक्षा में पास ही नहीं हुए, बल्कि ये कहा जाए कि उन्होंने ये परीक्षा 'विशेष योग्यता' के साथ पास की, तो ग़लत नहीं होगा.

पार्टी ने 16 में से 14 नगर निगमों में जीत हासिल की. साथ ही नगर पालिका और नगर पंचायतों में भी अपना परचम लहराया.

लेकिन परिणामों का विश्लेषण करने और जीत-हार के अंतर को देखने के बाद पर्यवेक्षकों का कहना है कि बीजेपी को जीत भले ही मिली हो, लेकिन इसे न तो विपक्ष की बड़ी हार के रूप में देखना चाहिए और न ही बीजेपी की 'बड़ी जीत' के रूप में.

ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि नगर निकाय चुनाव में उसकी स्थिति तब भी काफ़ी मज़बूत देखी गई थी जब वो न तो केंद्र की सत्ता में थी और न ही राज्य की.

क्या वाकई बड़ी है जीत?

साल 2012 में निकाय चुनाव से ठीक पहले हुए राज्य विधान सभा के चुनाव में समाजवादी पार्टी की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी थी. लेकिन निकाय चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने नगर निगम की 12 में से दस सीटें जीत ली थीं और वॉर्डों में भी उसकी दमदार मौजूदगी थी.

दूसरे, विपक्ष के एकजुट होकर न लड़ने के बावजूद भारतीय जनता पार्टी वैसा क्लीन स्वीप नहीं कर पाई है, जैसा उसने 2014 के लोकसभा और इसी साल हुए विधान सभा चुनाव में किया था.

नगर निगम में भी पार्टी तीन-चार जगहों पर मामूली अंतर से ही जीती है जबकि नगर पंचायत और नगर पालिका में समाजवादी पार्टी और बीएसपी ने उसे काफी अच्छी टक्कर दी है.

कांग्रेस पार्टी से भी बीजेपी को कई जगह कड़ी चुनौती मिली है.

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विपक्ष का प्रदर्शन ख़तरे की घंटी

वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्र कहते हैं कि सच तो ये है कि विपक्ष इस चुनाव के दौरान जनता के भीतर चल रहे द्वंद्व को समझने में नाकाम रहा जिसका वो फ़ायदा ले सकता था.

योगेश मिश्र कहते हैं, "अखिलेश यादव और मायावती प्रचार के लिए बाहर ही नहीं निकले जबकि आदित्यनाथ योगी का पूरा मंत्रिमंडल और पार्टी का पूरा संगठन रात-दिन एक किए हुए था."

"वास्तव में विपक्षी दल ये नहीं समझ पाए कि भारतीय जनता पार्टी की लहर वैसी नहीं है जैसी कि वो मानकर चल रहे हैं, जबकि जनता इस इंतज़ार में थी."

योगेश मिश्र कहते हैं कि नगर निगम में समाजवादी पार्टी को भले ही सफलता न मिली हो लेकिन नगर पालिका और नगर पंचायतों में उसने बेहतरीन प्रदर्शन किया है.

इसके अलावा, उनके मुताबिक पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी की 'दमदार वापसी' भारतीय जनता पार्टी के लिए किसी ख़तरे की घंटी से कम नहीं है.

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वो कहते हैं, "इससे साफ़ है कि दलित मतदाता मायावती के पास वापस आ गया है. यदि ऐसा रहा तो निश्चित तौर पर मुस्लिम मतदाता बीएसपी की ओर जाएगा और ज़ाहिर तौर पर ध्रुवीकरण का लाभ बीजेपी उस तरह से नहीं उठा सकेगी जैसा कि उसने लोकसभा या विधान सभा चुनाव के दौरान उठाया था."

यही नहीं, निकाय चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को भले ही अपार सफलता मिली हो लेकिन कुछ परिणाम बेहद चौंकाने वाले और पार्टी नेताओं की फ़ज़ीहत कराने वाले भी रहे.

मुख्यमंत्री योगी के गृह नगर गोरखपुर में पार्टी मेयर का चुनाव भले ही जीत गई हो लेकिन जिस वॉर्ड में योगी ख़ुद मतदाता हैं वहां पार्टी की करारी हार हुई है.

वहीं उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के गृह जनपद कौशांबी में नगर पंचायत चेयरमैन की छह सीटों में से एक पर भी पार्टी नहीं जीत पाई.

अखिलेश राहुल

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वैसे तो राहुल गांधी के गढ़ अमेठी में कांग्रेस की भी करारी हार हुई है. गढ़ के रूप में मशहूर कई सीटों पर सपा और बीएसपी को भी शिकस्त मिली है, लेकिन जानकारों के मुताबिक सबसे ज़्यादा सोचने वाली बात बीजेपी के लिए ही है.

लोकसभा और विधान सभा चुनाव में क़रीब 43 फ़ीसद मतदाताओं का जो समर्थन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सौंप कर गए थे, उसे बनाए रखने में वो क़ामयाब क्यों नहीं हुई?

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