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क्या फांसी से बच्चों के ख़िलाफ़ रेप का अपराध रुकेगा?
- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
मध्य प्रदेश कैबिनेट ने 12 साल या उससे कम उम्र की लड़कियों से बलात्कार या किसी भी उम्र की लड़कियों के साथ गैंगरेप के दोषी को फांसी की सज़ा देने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है.
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक मध्यप्रदेश के वित्त मंत्री जयंत मलैया ने कैबिनेट के फ़ैसले की जानकारी देते हुए कहा कि राज्य सरकार इसी शीतकालीन विधानसभा सत्र में इस प्रस्ताव को लेकर बिल लाएगी.
अगर ये प्रस्ताव क़ानून बन जाता है तो मध्य प्रदेश देश का पहला राज्य होगा जहां रेप के लिए इस तरह की सज़ा का प्रावधान होगा.
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के 2015 के आंकड़ो की मानें तो महिलाओं के ख़िलाफ़ रेप के सबसे अधिक मामले मध्य प्रदेश में दर्ज हुए. एनसीआरबी के मुताबिक 2015 में देश भर में 34,651 रेप के मामले दर्ज हुए जिनमें सबसे ज्यादा 4,391 मध्य प्रदेश में रिपोर्ट हुए जो कुल आंकड़े का क़रीब 12.7 फ़ीसदी हैं.
कैसे होगा क़ानून में बदलाव?
आख़िर कितना आसान है किसी राज्य के लिए इस तरह का क़ानून बनाना. इस मामले पर संविधान के जानकार सुभाष कश्यप का मानना है कि ऐसा करना राज्य सरकार के कार्यक्षेत्र के अंदर आता है. लेकिन इसमें लंबा समय लग सकता है.
सुभाष कश्यप कहते हैं, "इस प्रस्ताव पर मध्यप्रदेश सरकार को बिल तैयार करना होगा. इस बिल को राज्य सरकार का क़ानून मंत्रालय और महिला बाल कल्याण विभाग मिल कर तैयार कर सकते हैं. बिल तैयार होने के बाद इसे विधानसभा से पारित करने की ज़रूरत होगी. बिल विधानसभा से पारित होने के बाद राज्यपाल को भेजना होगा."
आम तौर पर राज्यपाल के विवेक पर होता है इस तरह के बिल को मंजूरी दें या न दें. लेकिन रेप जैसे संवेदनशील मामले में ये मुमकिन है कि राज्यपाल बिल को राष्ट्रपति के पास मंज़ूरी के लिए भेज दें.
सुभाष कश्यप के मुताबिक, "अगर राष्ट्रपति के पास राज्यपाल इस बिल को मंजूरी के लिए भेजते हैं तब राष्ट्रपति चाहें तो इस पर महिला बाल विकास मंत्रालय और क़ानून मंत्रालय की राय मांग सकते हैं. ऐसी सूरत में केंद्र सरकार भी इस क़ानून में अपनी राय रख सकती है."पूरी प्रक्रिया में कई बार दो महीने भी लग सकते हैं और दो साल भी.
मध्य प्रदेश सरकार
बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष स्तुति कक्कड़ का मानना है कि राज्य सरकार चाहे तो ये क़ानून बदल सकती है. लेकिन आज ज़रूरत है 2012 के पोक्सो एक्ट में बदलाव लाने की.
उनके मुताबिक, "बच्चों के ख़िलाफ़ लैंगिक अपराध के मामले बढ़ते जा रहे हैं. ये एक ऐसा रोग है जो रुकने का नाम नहीं ले रहा. इसको रोकने का एक ही तरीक़ा है कि क़ानून में संशोधन करके इस तरह के अपराध में होने वाली सज़ा बढ़ा दी जाए."
फिलहाल पोक्सो एक्ट में नाबालिग लड़कियों से बलात्कार के मामले में अधिकतम 10 साल से लेकर उम्र क़ैद की सज़ा का प्रवाधान है.
बच्चों के ख़िलाफ़ हो रहे अपराध के आंकड़े की बात करें तो 2014 में नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के रिकॉर्ड के मुताबिक़ 8904 मामले सामने आए. 2015 में 14913 अपराध बच्चों के खिलाफ अपराध के मामले सामने आए जो 2016 में बढ़ कर 35955 हो गए.
क़ानून में बदलाव
यानी बच्चों के खिलाफ अपराध में दो साल में चार गुना बढ़ोतरी हुई है. मध्य प्रदेश की बात करें तो इस तरह के अपराध में इसका नाम पांच शीर्ष राज्यों में शामिल रहता है. स्तुति कक्कड़ मुताबिक़ इन आकड़ों के मद्देनज़र मध्यप्रदेश राज्य सरकार का क़ानून में बदलाव का ये फ़ैसला सराहनीय है.
लेकिन फ़ैसले का अभी से विरोध शुरू हो गया है. जानी-मानी क्रिमिनल साइकॉलजिस्ट डॉक्टर अनुजा कपूर के मुताबिक़, "अगर इस तरह का क़ानून लोगों में डर लाने के लिए बनाया जा रहा है मुझे लगता मौजूदा क़ानून भी इतने सख्त हैं. ज़रूरत है तो इन्हें सख्ती से लागू करने की."
डॉक्टर अनुजा कपूर कहतीं है, "रेप के रेयरेस्ट ऑफ रेयर मामले में पहले से ही फांसी की सज़ा का प्रावधान है. इसके बाद क़ानून में कोई भी बदलाव रेप क़ानून को और ज्यादा अपाहिज बना देगा और ज्यादा कंफ्यूज़न पैदा करेगा."
सिस्टम और क़ानून
लेकिन डॉक्टर अनुजा कपूर की राय से दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल सहमत नहीं हैं. स्वाति मालीवाल की राय में "मध्य प्रदेश सरकार का ये क़दम सराहनीय है, केंद्र सरकार को चाहिए कि पूरे देश में लागू करे."
स्वाति का कहना है कि डेढ़ साल की बच्ची के साथ रेप होता है और 15 साल उसको अदालतों के चक्कर काटने में लग जाते हैं. स्वाति मध्य प्रदेश सरकार के फ़ैसले से एक क़दम आगे की बात करतीं है.
उनके मुताबिक़, "रेप के मामले में पूरा ट्रायल 6 महीने में ख़त्म हो जाना चाहिए और दोषी को सज़ा मिल जाए. तभी लोगों में सिस्टम और क़ानून के प्रति डर पैदा होगा."
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