'जब मैं इंदिरा गांधी पर गुस्सा हो गई थी'

इंदिरा गांधी

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    • Author, सुभाषिनी अली
    • पदनाम, वामपंथी नेता

इंदिरा गांधी का व्यक्तित्व विरोधाभासों से भरा हुआ है और उनकी विरासत पर दशकों तक बहस जारी रहेगी. मेरे पास उनके साथ दो मुलाक़ातों का जीवंत अनुभव है.

एक मुलाक़ात हिन्दी विरोधी आंदोलन के दौरान हुई थी. तब आंदोलन के तीन या चार दिन हुए थे. 1965 में हिन्दी विरोधी आंदोलन के कारण तमिलनाडु की राजनीति में भारी उठापटक हुई थी. इस आंदोलन का राजनीति पर व्यापक प्रभाव पड़ा था.

तब इंदिरा गांधी कुछ ही दिन पहले सूचना एवं प्रसारण मंत्री बनी थीं. इंदिरा गांधी के मंत्रालय ने हिन्दी में एक सर्कुलर जारी किया था और इस सर्कुलर के कारण भी हिन्दी विरोधी आंदोलन को हवा मिली थी.

मेरी नानी अमु स्वामीनाथन कांग्रेस की बड़ी नेता थीं. वो नेहरू-गांधी परिवार के काफ़ी क़रीबी थीं.

इंदिराजी से मुलाकात

इंदिराजी मेरी नानी के घर पर आई थीं. तब मैं भी वहीं थी. मैं काफ़ी अस्त-व्यस्त स्थिति में थी. मैं भावनात्मक रूप से भी ज़्यादा परेशान थी. तब इंदिरा गांधी का व्यक्तित्व काफ़ी संतुलित और शांत था.

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इमेज कैप्शन, इंदिरा गाधी और जवाहरलाल नेहरू

इंदिरा गांधी आकर बैठ गईं और उन्होंने मेरी दादी से हिन्दी विरोधी आंदोलन के बारे में बात करने लगीं.

उन्होंने बताया कि वो इस आंदोलन से किस कदर विचलित हैं. इंदिरा जी ने हिन्दी विरोधी आंदोलन को लेकर जारी गतिरोध को ख़त्म करने की बात की थी.

उस वक़्त मैं एक कॉलेज स्टूडेंट थी. इस आंदोलन को लेकर मेरे मन में भी ग़ुस्सा था. मैंने दोनों की बातचीत में हस्तक्षेप किया और इंदिरा जी से कहा कि इसमें सारी ग़लती आपकी है.

मैंने कहा कि यह आप ही का मंत्रालय है जिसके एक सर्कुलर के कारण सारा हंगामा खड़ा हुआ है और अब आप शांति बहाल करने की बात कर रही हैं. उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और पूछा कि मैं इसके बारे में सब कुछ कैसे जानती हूं.

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मैंने उनसे कहा कि मैं इस आंदोलन की समर्थक हूं. ऐसा एक हिन्दी भाषी होने के बावजूद था.

मेरे जवाब के बाद इंदिरा जी की दिलस्पी बढ़ गई थी. उन्होंने मुझसे कुछ सवाल पूछना शुरू किया. इंदिरा जी की दिलचस्पी इस आंदोलन में शामिल छात्रों को लेकर थी. इस आंदोलन में शामिल छात्रों को मैंने क़रीब से देखा था.

मैंने इंदिरा जी से सरकार की कठोर कार्रवाइयों के बारे में बात की. मैंने कहा कि उनकी सरकार गोलीबारी कर रही है और तमिलों को अलग-थलग कर रही है.

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'कांग्रेस में शामिल होने का न्योता'

मैंने कहा कि उन्हें इसे लेकर माफ़ी मांगनी चाहिए. वो पूरी तरह से हैरान रह गईं और कुछ मिनट बाद वहां से चली गईं. हालांकि बाद में उन्होंने अधूरे मन से माफ़ी मांगी थी, लेकिन तब तक काफ़ी देरी हो गई थी.

दूसरी बार इंदिरा जी से मुलाक़ात बांग्लादेश युद्ध से ठीक पहले हुई थी. तब वो बेहद ताक़तवर प्रधानमंत्री थीं और मैं कानपुर में एक अनुभवहीन ट्रेड यूनियन नेता. मेरे यूनियन को रायॉन फ़ैक्ट्री में काफ़ी प्रताड़ना सहनी पड़ी थी.

इसी को लेकर मैंने प्रधानमंत्री कार्यालय से संपर्क किया था. मैंने इसे लेकर एक नियुक्ति की बात की थी जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया था. मेरी मुलाक़ात संसद स्थित उनके ऑफिस में हुई थी. मैंने उनसे यूनियन की समस्याओं के बारे में बात की थी. उन्होंने मुझे सब्र के साथ सुना और कहा कि वो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी से बात करेंगी.

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मैंने उनसे पूछा था कि क्या वो सीधे हस्तक्षेप नहीं कर सकती हैं, तो इंदिरा जी मुस्कुराने लगी थीं. उन्होंने कहा कि चीज़ों को करने का तरीक़ा होता है.

इसके बाद हमलोगों ने अपनी नानी और उनकी दोस्त के बारे में बात की. उनकी तबीयत ठीक नहीं थी. मुझे याद है कि उन्होंने कहा था कि हमें जाकर नानी का हालचाल लेना चाहिए.

इतने के बाद मैं वहां से निकल गई थी. इंदिरा जी ने त्रिपाठी जी से बात की थी और उन्होंने अपने स्तर से मदद की थी. उन्होंने एक कांग्रेस नेता को मेरे पास भेजा था कि मैं कांग्रेस में शामिल हो जाऊं.

मैंने उस नेता से कांग्रेस में आने से इनकार कर दिया तो उन्होंने कहा कि इंदिरा जी को लगा था कि आप पार्टी में शामिल हो जाएंगी.

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