तो क्या 'बेमतलब' है श्री श्री की अयोध्या यात्रा?

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- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर की अयोध्या यात्रा से पहले ही ये आशंका जताई जा रही थी कि इस विवाद का हल शायद ही निकले और हुआ भी वैसा ही, लेकिन उनकी यात्रा के दौरान साधु संतों और हिन्दू संगठनों के बीच जिस तरह की बयानबाज़ी हुई, उससे ये बात भी सामने आ गई कि विवाद इनके बीच भी दरअसल कितना उलझा हुआ है.
अयोध्या में रविशंकर ने पत्रकारों से बातचीत में स्वीकार किया कि ये मामला इतना आसान नहीं है और इसे सुलझाने के लिए आम सहमति बनाने में चार-छह महीनों का कम से कम समय लगेगा.
हालांकि ये उन्हें भी पता है कि क़रीब तीन हफ़्ते बाद से यानी पांच दिसंबर से सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की नियमित सुनवाई होनी है और तब बातचीत के रास्ते लगभग बंद हो चुके होंगे.
अयोध्या पहुंचने पर रविशंकर की सबसे पहले मुलाक़ात राम जन्म भूमि न्यास के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास से हुई. नृत्य गोपाल दास के यहां कुछ और साधु संत जमा थे.
लेकिन मुलाक़ात के बाद नृत्य गोपाल दास ने जो वक्तव्य दिया उसने ज़ाहिर तौर पर श्री श्री रविशंकर की कोशिशों को बड़ा झटका दे दिया.
महंत नृत्य गोपालदास का कहना था, "श्री श्री से हमारे पुराने संबंध हैं. शिष्टाचार के तहत वो भेंट करने आए थे. राम मंदिर मामले में उनसे कोई बातचीत नहीं हुई."

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सुलझने की कितनी गुंज़ाइश?
यही नहीं, अयोध्या जाने से पहले श्री श्री ने मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी से भी मुलाक़ात की थी और योगी का कहना था कि बातचीत कोई भी करे, कोई दिक़्क़त नहीं है. लेकिन जब रविशंकर अयोध्या पहुंचे तो योगी ने कहना शुरू कर दिया कि अब बातचीत से मसले के सुलझने की गुंज़ाइश न के बराबर है.
दरअसल, बतौर वार्ताकार श्री श्री रविशंकर के अयोध्या आने को लेकर सवाल पहले से ही उठ रहे थे, उनके पहुंचने के बाद भी पक्षकारों के इस रुख़ में कोई बदलाव नहीं आया.
मंदिर आंदोलन से जुड़े रहे बीजेपी के पूर्व सांसद राम विलास वेदांती पूछ बैठे कि रविशंकर आख़िर किस हैसियत से वार्ता करने आ रहे हैं. वेदांती ने तो ये आरोप भी लगा दिए कि रविशंकर एनजीओ चलाते हैं और उनकी सक्रियता का मक़सद सिर्फ़ ये है कि वो अपने एनजीओ को जांच से बचा लें.
वेदांती का साफ़ कहना था कि मंदिर आंदोलन के लिए उन्होंने और विश्व हिन्दू परिषद से जुड़े तमाम दूसरे लोगों ने संघर्ष किया है और अब वार्ता करने के लिए श्री श्री रविशंकर क्यों आ रहे हैं ?

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वार्ताएं बेमतलब
यूं तो श्री श्री रविशंकर विवाद को सुलझाने का न तो कोई फ़ार्मूला लेकर गए थे और न ही उन्होंने विवाद से जुड़े विभिन्न पक्षों से सुलह का कोई फ़ार्मूला माँगा था.
लेकिन बताया जा रहा है कि वो इस फ़ार्मूले पर बात करना चाहते थे कि अयोध्या में मंदिर और मस्जिद दोनों ही बनें. ज़ाहिर है, ये ऐसा फ़ॉर्मूला है जिस पर हिन्दू पक्ष क़तई राज़ी नहीं है. ख़ासकर विश्व हिन्दू परिषद की बातों से तो यही लगता है.
विश्व हिन्दू परिषद के प्रवक्ता शरद शर्मा कहते हैं, "मंदिर निर्माण का कार्य साठ प्रतिशत से ज़्यादा हो चुका है. पत्थर तराशे जा चुके हैं और अब उन्हें सिर्फ़ जोड़ना भर बाक़ी है. वार्ताएं पहले भी बहुत हो चुकी हैं जिनका कोई मतलब नहीं और अब होने का तो कोई अर्थ ही नहीं है."
आगे वह कहते हैं, "अब तो सिर्फ़ संसद में क़ानून बनाकर मंदिर निर्माण का रास्ता सरकार को साफ़ कर देना चाहिए."
विश्व हिन्दू परिषद इस मामले के कोर्ट में होने को भी ख़ास महत्व नहीं दे रहा है और उसका कहना है कि उसे विवादित जगह पर सिर्फ़ और सिर्फ़ मंदिर चाहिए.
हालांकि मुस्लिम पक्ष की निग़ाहें इस मामले में सुप्रीम कोर्ट पर ही टिकी हुई हैं. अयोध्या दौरे के अंत में श्री श्री रविशंकर ने मुस्लिम पक्षकार हाशिम अंसारी के बेटे इक़बाल अंसारी से भी मुलाक़ात की लेकिन उनकी नज़र में भी इस प्रयास में कोई ख़ास दम नहीं दिखा.
इस विवाद में मुस्लिम पक्ष की ओर से अंतर्विरोध पहले से ही दिख रहे थे जब शिया वक़्फ़ बोर्ड पूरी तरह से राम मंदिर बनाने के पक्ष में उतर आया, लेकिन श्री श्री रविशंकर के अयोध्या दौरे के दौरान हिन्दू पक्षकारों के बीच के भी तमाम विवाद उभर कर सामने आए. निर्मोही अखाड़े ने जहां विश्व हिन्दू परिषद पर करोड़ों रुपये के घोटाले का आरोप लगा दिया वहीं विश्व हिंदू परिषद का कहना था कि ऐसा वो लोग कह रहे हैं जिनका आंदोलन से कोई लेना-देना नहीं.
अयोध्या विवाद से श्री श्री का कितना नाता?

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श्री श्री रविशंकर की इस पहल पर तमाम और साधु संतों ने भी आपत्ति जताई है जिनका मंदिर आंदोलन से परोक्ष नाता रहा है, भले ही वो पक्षकार न हों. वहीं जानकारों का कहना है कि सब कुछ पहले से ही पता था तो रविशंकर की ये क़वायद बिना किसी मक़सद के हो, ये कहना भी मुश्किल है.
वरिष्ठ पत्रकार सुभाष मिश्र कहते हैं, "सुप्रीम कोर्ट में फ़ाइनल सुनवाई महज़ कुछ दिन पहले इतने पेचीदा विवाद की बातचीत से हल की कोशिश का कोई मतलब तो नहीं दिखता, वो भी कोशिश वो व्यक्ति कर रहा है जिसका इस विवाद और मंदिर आंदोलन से दूर-दूर तक का रिश्ता नहीं है."
इसमें ही आगे जोड़ते हुये मिश्र कहते हैं, "लेकिन इतना तो है ही कि श्री श्री की इस सक्रियता से अयोध्या मुद्दा सुर्खियों में आ गया. इसके सुर्खियों में आने से किसको क्या फ़ायदा या क्या नुक़सान होगा, ये पता नहीं. लेकिन मौजूदा सरकार को ये ख़ूब सूट करता है, ये सबको पता है."
शायद इसीलिए कुछ पर्यवेक्षक ये भी कह रहे हैं कि तमाम पक्षकार इस पहल में भले ही गंभीरता और कोई उम्मीद न देख रहे हों लेकिन श्री श्री रविशंकर पूरी तरह से नाउम्मीद होकर नहीं गए हैं.
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