नज़रिया: बीजेपी को अयोध्या मसला सुलझाने की क्या जल्दी पड़ी है?

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- Author, शरद प्रधान
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक सुझाव क्या दे दिया कि भारतीय जनता पार्टी के नेताओं में खलबली मच गई.
जी हां, सुप्रीम कोर्ट की यह कहने की देर थी कि अयोध्या मामले को बातचीत के ज़रिए सुलझाने के भी प्रयास होने चाहिए. बस तब से लोगों में एक होड़-सी लग गई है कि इस काम में कौन पहल करता है.
इस दौड़ में हिंदुओं के प्रतिनिधित्व का बीड़ा उठाकर 'आर्ट ऑफ लिविंग' के गुरु श्री श्री रविशंकर सबसे आगे निकल पड़े. इससे पहले की कोई और इस पर प्रतिक्रिया देता बीजेपी की ओर से इस बात का स्वागत होने लगा.

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शिया सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड
अब कमी थी तो मुसलमानों की तरफ़ से पहल की तो वो भी कुछ समय बाद ही पूरी हो गई. इस कमी को उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड के चेयरमैन वसीम रिज़वी ने पूरा किया.
रिज़वी साहब की पृष्ठभूमि भी बड़ी दिलचस्प है. वैसे तो उनको समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आज़म ख़ान का करीबी माना जाता था. लेकिन एक दौर ऐसा आया जब उनके ख़िलाफ़ जाने-माने शिया गुरु मौलाना कल्बे जव्वाद ने आरोपों का पुलिंदा खोलकर रख दिया और सीबीआई जांच की मांग कर डाली.
इसके बाद आज़म ख़ान बतौर वक़्फ़ मंत्री इस मांग को पूरा करने पर मजबूर हो गए.

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सुप्रीम कोर्ट
अब सीबीआई जांच से बचने के लिए आज की तारीख़ में बीजेपी के साथ अच्छे संबंध बनाना ज़रूरी हो गया है. तो रिज़वी साहब के योगी आदित्यनाथ सरकार में विराजमान इकलौते मुसलमान (शिया) मंत्री मोहसिन रज़ा के साथ व्यक्तिगत संबंध काम आ गए.
आनन-फ़ानन में रिज़वी साहब ने अयोध्या प्रकरण सुलटवाने का बयान दे डाला. वो इस हद तक चले गए कि उन्होंने मंदिर बनवाने का ज़िम्मा भी ले लिया.
बीजेपी वाले किसी शख़्स के अंदाज़ में रिज़वी साहब बोलने लगे, "मंदिर वहीं बनाएंगे जहां रामलला विराजमान हैं."
इस माहौल में वो शायद ये भूल गए कि उनका रोल वैसा ही था जैसे कि 'बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना.'

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बाबरी मस्जिद
न रिज़वी साहब का और न ही उनके शिया वक़्फ़ बोर्ड का सुप्रीम कोर्ट में चल रहे क़ानूनी विवाद से कोई लेना-देना है. हाईकोर्ट द्वारा सितंबर 2010 में दिए गए फ़ैसले में भी शिया वक़्फ़ बोर्ड का दूर-दूर तक कोई ज़िक्र नहीं है.
बस रिज़वी साहब ने एक रट लगा ली कि बाबरी मस्जिद एक शिया मस्जिद थी क्योंकि उसका निर्माण बाबर के नुमाइंदे मीर बाक़ी ने करवाया था जो एक शिया थे. इसी आधार पर उन्होंने बाबरी मस्जिद पर शिया वक़्फ़ बोर्ड का अधिकार मान लिया और सौदा करने की पहल भी कर डाली.
रिज़वी साहब को एक और झटका तब लगा जब ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड ने ये साफ़-साफ़ कह दिया कि वो ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की राय के साथ ही चलेंगे.

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श्री श्री रविशंकर
और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का स्पष्ट मत रहा है कि इस पेचीदा मसले का हल केवल सुप्रीम कोर्ट के आदेश से ही हो सकता है न कि आपसी बातचीत से.
वैसे तो किसी भी पेचीदा मसले का हल बातचीत के ज़रिए निकले तो उससे समझदारी माना जाता है. लेकिन यहां तो सबसे बड़ी मुश्किल ये हो गयी है कि दोनों तरफ़ से वो लोग पहल करने पर आमाद हैं जिनका चल रहे क़ानूनी विवाद से कोसों दूर तक कोई सरोकार नहीं है.
जिस प्रकार से शिया वक़्फ़ बोर्ड अपने आपको स्वयं बाबरी मस्जिद का प्रतिनिधि बता रहा है वैसे ही श्री श्री रविशंकर भी अपने आप को हिंदुओं का प्रतिनिधि समझ बैठे हैं. उनकी पहल का विरोध केवल विश्व हिंदू परिषद ही नहीं बीजेपी के वरिष्ठ नेता सुब्रमण्यम स्वामी भी कर रहे हैं.

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राम मंदिर का निर्माण
ये बात दीगर है कि श्री श्री अयोध्या पहुंचकर केस में शामिल अधिकतर पार्टियों के प्रतिनिधियों से मुलाक़ात कर रहे हैं. उन्हें हिंदू-मुसलमान दोनों पार्टियों का समर्थन मिलता है या नहीं यह तो समय ही बताएगा.
फिलहाल तरह-तरह के जो प्रस्ताव सामने आये हैं उनका एक ही रास्ता दिख रहा है. एक भव्य राम मंदिर का निर्माण वहीं पर हो जहां 2 दिसंबर 1992 से एक 'अस्थाई' मंदिर बना हुआ है (मस्जिद गिराए जाने के बाद से). जहां तक मस्जिद का सवाल है, उसे कहीं और बना दिया जाए.
ज़ाहिर है कि ऐसे एकतरफ़ा 'समाधान' को समझौता नहीं माना जा सकता. ये तो वैसे ही जो जाएगा जैसे कि बीजेपी कह रही हो, 'चित भी मेरी, पट भी मेरी.'

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'काशी और मथुरा'
बीजेपी को ऐसे 'समझौते' की हड़बड़ी शायद इसलिए है कि अयोध्या मामले को गर्म रखकर उन्हें विभिन्न प्रदेशों में होने जा रहे चुनावों और यूपी में होने वाले स्थानीय निकाय के चुनावों में इससे कुछ फ़ायदा मिल सकता है.
दूसरा 'आउट ऑफ कोर्ट' समझौता हो जाने से 'काशी और मथुरा' जैसे मामलों में समझौते की उम्मीद दिख सकती है जो अभी ठंडे बस्ते में हैं.
शायद यह भी एक कारण है कि मुस्लिम समुदाय को सर्वोच्च न्यायालय के सुझाए हल पर ज़्यादा भरोसा और आस्था है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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