नज़रिया: कितना बना बिरसा मुंडा के सपनों का झारखण्ड

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- Author, सुधीर पाल
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
बिरसा मुंडा के सपने झारखण्ड राज्य की बुनियाद हैं और यहां की राजनीति की धुरी भी.
लेकिन बिरसा मुंडा ने राज्य के लिए क्या सपना देखा था?
मुंडा का सपना था कि क़ुदरती संसाधनों जैसे जल, जंगल और ज़मीन पर सभी का हक़ हो और सबको अपने फ़ैसले लेने का अधिकार मिले.
खनिज संपदा
देश के सारे खनिज पदार्थों का तक़रीबन 40 फ़ीसदी अकेले झारखण्ड में मौजूद है.
ज़मीन में दबे यही खनिज झारखण्ड में विवाद की जड़ भी हैं.
राज्य की लगभग दो तिहाई आबादी की जीविका खेत-खलिहानों से आती है, लेकिन 'विकास' का रास्ता खनिजों के दोहन और इस पर आधारित उद्योगों से निकलता है.
बिरसा के सपनों में 'कम्युनिटी' है तो विकास के पंख 'कॉरपोरेट' से जुड़े हैं.
इसी साल फ़रवरी में हुए 'मोमेंटम झारखण्ड समिट' में 210 कम्पनियों के साथ 3,11,000 करोड़ के सहमति पत्र पर हस्ताक्षर हुआ था.
वहीं अक्टूबर महीने में हुई 'माइंस समिट' में झारखण्ड सरकार ने संदेश दिया कि खदान, पानी, ज़मीन से जुड़ी बाधाएं ख़त्म की जाएंगी.

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कमज़ोर पड़ते समुदाय
इंडस्ट्री के हितों की रक्षा के लिए ज़रूरी है कम्युनिटी को कमज़ोर करना और इस दिशा में ग्राम सभा के अधिकारों को छीनने, कमज़ोर करने और ग्राम सभा के निर्णयों को खारिज करने की पहल पूरे राज्य में देखने को मिल रही है.
वनाधिकार क़ानून 2006, 13 दिसम्बर 2005 के पहले जंगलों की ज़मीन पर बसे आदिवासियों तथा अन्य परम्परागत समुदायों के मामले में व्यक्तिगत और सामुदायिक मालिकाना हक़ देने का अधिकार ग्राम सभाओं को देता है.
झारखण्ड के लिए बेहद महत्वपूर्ण इस क़ानून के अनुपालन की दशा बेहद शर्मनाक है.
एक दशक का अनुभव बताता है कि वन विभाग और राजस्व विभाग के आगे ग्राम सभाओं के निर्णय की कोई बिसात नहीं है.

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बड़े पैमाने पर वनरोपण
मुख्य सचिव ने एक पत्र जारी कर सभी उपायुक्तों को आदेश दिया है कि जल्द से जल्द ग्राम सभाओं से 'अनापत्ति प्रमाण पत्र' लिया जाए कि उनके गांव में कोई भी वनाधिकार क़ानून के तहत दावेदार नहीं है.
राज्य में सारंडा और बेतला को छोड़कर लगभग सभी जंगल गांव के भीतर हैं और सदियों से इन जंगलों पर ग्रामीणों का अधिकार रहा है. वनाधिकार क़ानून में इस परम्परागत अधिकार को क़ानूनी मान्यता देने की पहल रही है. सरकारी आंकड़ों के हिसाब से 3,64,237 हेक्टेयर वन भूमि सामुदायिक दावेदारी के हिस्से में आती है.
वन भूमि से बेदखल करने के लिए राज्य सरकार कैम्पा-प्रतिपूरण वनीकरण क़ानून के बहाने सघन स्तर पर वनरोपण का काम कर रही है.
वन भूमि पर सालों से बसे आदिवासियों और परम्परागत समुदायों को सार्वजनिक भूमि अतिक्रमण के तहत उजाड़ा जा रहा है.
बिरसा मुंडा के उलगुलान के दौर-सी स्थिति बनी हुई है. अंतर सिर्फ इतना है कि बिरसा उस समय अंग्रेज़ों से लड़ रहे थे और आज लोगों को वनाधिकार जैसे प्रगतिशील और सामुदायिक हितों की हिफाज़त करने वाले क़ानून के बाद भी सरकार-कॉरपोरेट गठजोड़ से लड़ना पड़ रहा है.

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सरकार का पक्ष
'प्राण जाए पर वचन ना जाए' के नारों को आत्मसात करने वाले मुख्यमंत्री रघुवर दास ने कॉरपोरेट की सहूलियत के लिए ज़मीन से सम्बंधित कानूनों को शिथिल किया है.
छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट 1908 और संथाल परगना टेनेंसी एक्ट 1949 के प्रावधानों में संशोधन करने में विफल रहने के बाद भूमि अर्जन पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन में उचित प्रतिकर (हर्ज़ाना) और पारदर्शिता का अधिकार 2013 में संशोधन विधेयक - 2017 को मंज़ूरी दी गई है.
इस संशोधन के तहत भू-अर्जन के लिए सोशल इम्पैक्ट स्टडी कराने की बाध्यता नहीं है.
सरकार का तर्क है कि गोवा, गुजरात, तमिलनाडु और तेलंगाना में एसआईए की बाध्यता को समाप्त करने के प्रस्ताव को राष्ट्रपति की मंज़ूरी मिली है.
सोशल इम्पैक्ट स्टडी कराने की बाध्यता नहीं रहने से भू-अर्जन के लिए ग्राम सभा की अनुमति ज़रूरी नहीं होगी.
छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट 1908 और संथाल परगना टेनेंसी एक्ट 1949 में माइनिंग और उद्योग लगाने के लिए आदिवासी ज़मीन के अधिग्रहण का अधिकार सरकार को पहले से उपलब्ध है.
लेकिन इसके लिए ग्रामसभा की सहमति ज़रूरी है.
सोशल इम्पैक्ट स्टडी कराने की बाध्यता नहीं रहने से अब सरकार बिना ग्राम सभा की सहमति के स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी, अस्पताल, पंचायत भवन, आंगनवाडी, रेल परियोजना, सिंचाई, विद्युतीकरण, जलापूर्ति, सड़क, पाइपलाइन, जल मार्ग, आवास आदि के लिए भी भूमि ले सकती है.

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लैंड बैंक
केंद्र सरकार की रिपोर्ट के मुताबिक़ देश में 1000 करोड़ से ज़्यादा बड़ी निवेश वाली लगभग 1,92,000 करोड़ की परियोजनाओं में से 50 फ़ीसदी परियोजनाएं ग्रामसभा की सहमति के अभाव में लटकी पड़ी है.
कॉरपोरेट की बाधा दूर करने के लिए रघुवर दास की सरकार ने राज्य के लगभग ढाई लाख परिवारों की ज़मीन की बन्दोवस्ती को स्थगित कर दिया है.
मुख्य सचिव की पहल पर गैर-मजुरवा ज़मीन की लगान रसीद नहीं निकल रही है. सरकार की कोशिश है कि वर्षों पहले गरीबों को बंदोबस्त गैर-मजुरवा ज़मीन का मालिक़ाना हक़ वापस ले लिया जाए.
सरकार ने राज्य के हर ज़िले में लैंड बैंक की स्थापना की है.
इस लैंड बैंक में लगभग 15 लाख एकड़ ज़मीन को शामिल करने का लक्ष्य रखा गया है.
लैंड बैंक की ज़मीन इंडस्ट्री को उपलब्ध कराने की योजना है.
उपायुक्तों को लक्ष्य दिया गया है कि वे अपने ज़िले में ज़्यादा से ज़्यादा वन भूमि, गैर-मजुरवा भूमि, गोचर भूमि, खेल के मैदान, भू-दान की ज़मीन, सैरात, सामुदायिक भूमि को अपने जि़ले के लैंड बैंक में शामिल करें.

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सब कुछ उद्योगों की मदद के लिए
सामाजिक कार्यकर्ता जॉर्ज मोनापल्ली कहते हैं- ''अजीब माहौल बना हुआ है, ग्राम सभाओं को खत्म किया जा रहा है. हर तरह की ज़मीन को हथिया कर इंडस्ट्री को सौपने की कोशिश हो रही है. साफ़ दिख रहा है कि नीतियां, कानून सब कुछ इंडस्ट्री के हिसाब से बन रहे हैं.''
सरकार चाहे जो राग अलाप ले, सच तो यह है कि बिरसा मुंडा के सपने और इंडस्ट्री के सपने एक नहीं हो सकते.
बिरसा और इंडस्ट्री के सपने के इस अन्तर्विरोध को पाटने की सार्थक कोशिश विकास के नए आयाम की मांग करती है. संविधान की पांचवी अनुसूची का अक्षरशः अनुपालन इस अन्तर्विरोध को पाटने की कुंजी है.
(ये लेखक की निजी राय है)
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