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आंखों देखी: मैं महिला थाने क्यों नहीं जाऊंगी?
- Author, सिन्धुवासिनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
"मैम...आप कुछ करिए, समझाइए मेरे पति को. ऐसी रोज़-रोज़ की मार खाने से तो अच्छा है मैं खुदकुशी कर लूं."
25-30 साल की एक औरत रुआंसी आवाज़ में कहती है.
"सुसाइड करोगी तुम? अगले जन्म में कोढ़ी बनोगी. भीख़ मांगकर जीना पड़ेगा. समझीं? ऐसा सोचना भी मत.'' सामने बैठी कॉन्स्टेबल डांटने के अंदाज़ में बोलती है.
ये बातचीत सुनकर मैं हैरत में पड़ गई. घरेलू हिंसा की शिकायत पुलिस के पास ले जाने पर क्या उन्हें इस तरह की प्रतिक्रिया देनी चाहिए?
मुझे लगा था कि पुलिस एफ़आईआर दर्ज करेगी और पीड़िता को क़ानूनी मदद देगी लेकिन वहां का नज़ारा देखकर लगा कि किसी 'विवाद निवारण केंद्र' पहुंच गई हूं.
पुलिस स्टेशन की इमारत
महिलाओं के साथ लगातार बढ़ते अपराधों को देखते हुए केंद्र सरकार ने महिला पुलिस थाने बनाए जाने की सिफ़ारिश की थी.
माना जा रहा था कि यहां औरतें बेहिचक होकर अपनी बात रख सकेंगी और उनकी सुनवाई भी तुरंत होगी. लेकिन क्या वाक़ई ऐसा है?
मुझे तो दिल्ली से सटे नोएडा के इस महिला थाने में जाकर कुछ और ही चौंकाने वाली बातें नज़र आईं.
31 अक्तूबर की तारीख़, दोपहर के तक़रीबन तीन बजे थे. बाहर से ठीक-ठाक दिखने वाले पुलिस स्टेशन की इमारत अंदर से उजाड़ थी.
थोड़ा और अंदर जाने पर एक महिला के सुबकने की आवाज़ आई. वो अपनी सलवार मोड़कर पैरों पर पड़े निशान कॉन्स्टेबल गीता को दिखा रही थीं.
इंसाफ़ की उम्मीद
उनके पैरों की उंगलियों से ख़ून बह रहा था. दादरी में रहने वाली सोनी का आरोप था कि उनका पति उन्हें रोज़ पीटता है.
उनका कहना था कि वो पति से तलाक़ नहीं ले सकतीं लेकिन रोज़ इतना दर्द भी नहीं सह सकतीं इसलिए इंसाफ़ की उम्मीद में महिला थाने आई हैं.
वो औरत पहले भी इस थाने आ चुकी थी पर कोई क़ानूनी कार्रवाई नहीं की गई थी. हर बार कोशिश सुलह करने की थी.
कॉन्स्टेबल ने मुझे धीमी आवाज में बताया, "इसका पति बहुत बदतमीज़ है. हमने उसे समझाने की बहुत कोशिश की लेकिन वो नहीं माना. मुझे तो लगता है वो किसी दूसरी औरत के चक्कर में फ़ंस गया है."
केस दर्ज करने के लिए उनकी अनिच्छा साफ़ नज़र आ रही थी. पुलिस की ऐसी बेबसी मैंने शायद पहली बार देखी थी.
महिलाओं का उत्पीड़न
मैं सोच रही थी, अगर औरतों को हिंसा या उत्पीड़न की हालत में केस दर्ज़ कराने के लिए इतनी मशक़्कत करनी पड़े तो इन सारी कोशिशों का क्या मतलब बनता है?
2009 में खुला यह थाना महिलाओं के उत्पीड़न रोकने और क़ानूनी मदद देने के मक़सद से बनाया गया है.
लेकिन पीड़ित औरतों और पुलिस की बातचीत पर ध्यान दें तो 'आपस में समझ लो', 'मिल-जुलकर रहो', 'तुम्हारा ही पति है' जैसे शब्द सुनाई पड़ते हैं.
कॉन्स्टेबल गीता के मुताबिक वो दोनों पक्षों में सुलह कराने की कोशिश करती हैं क्योंकि शादी टूटने से किसी का फ़ायदा नहीं होता.
पुलिस की बातों से ऐसा लगा जैसे उनकी प्राथमिकता शादी और परिवार टूटने से बचाना है, क़ानूनी कार्रवाई करना नहीं.
'झूठी' शिक़ायत
थाने में बैठी पुलिसकर्मी भले महिला थी लेकिन उसके मन में भी वही रूढ़िवादी धारणाएं मौज़ूद थीं जो महिलाओं के साथ हिंसा को आम मानती हैं.
ऐसे मामलों को समझने के लिए जो संवेदनशीलता और जागरूकता पुलिस की रग़-रग़ में होनी चाहिए, वो मुझे ढूंढनी पड़ रही थी.
थाने की एसएचओ अंजू सिंह तेवतिया ने बताया कि पतियों का अक्सर ये कहना होता है कि पत्नी खाना नहीं बनाती, बच्चों का ख़याल नहीं रखती या ज़्यादा खर्च करती हैं इसलिए बात झगड़े और मारपीट तक पहुंच जाती है.
कॉन्स्टेबल गीता मानती हैं कि कई बार औरतें इसलिए भी 'झूठी' शिक़ायत लेकर आ जाती हैं क्योंकि उनका कहीं और अफ़ेयर चल रहा होता है.
यानी बात घूमकर वहीं आ जाती है. हिंसा के लिए किसी न किसी तरीके से औरत को ज़िम्मेदार ठहरा दिया जाता है, चरित्र पर शक़ किया जाता है.
दोषी को सज़ा
पुलिस के दावों से ऐसा लगा जैसे अगर औरत पति या परिवार की पसंद का खाना न बनाए तो पिटना ही उसकी किस्मत है.
ये सब देखने के बाद मेरे मन में सवाल उठा कि किसी मुसीबत में क्या मैं महिला थाने जाना चाहूंगी? और मेरा जवाब है- नहीं.
पुलिस स्टेशन जाने का मेरा मक़सद दोषी को सज़ा दिलवाना और इंसाफ़ पाना होगा.
पुलिस मुझे समझौता करने के लिए समझाए, मुझ पर ही शक़ करे और कार्रवाई करने से इतना कतराए, ये मुझे मंज़ूर नहीं.
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