गाय के नाम पर राजनीति का बदलता रंग

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- Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
ऐसा नहीं कि गौ-राजनीति भारत में कोई अनसुना मुद्दा रहा है.
सालों पहले गौ-रक्षकों की एक भीड़ ने संसद पर लगभग हमला बोल दिया था; एक गृह-मंत्री को अपनी कुर्सी से हाथ धोना पड़ा था, लेकिन पिछले तक़रीबन तीन सालों में गौ-रक्षा के नाम पर पूरे देश में 61 हमले हुए हैं जिनमें से कई में लोगों को पीट-पीटकर मारा डाला गया और एक मामले में तो एक 12 साल के बच्चे इम्तियाज़ ख़ान को मारकर पेड़ से लटका दिया गया.
पिछले सात सालों में, यानी 2010 से 2017 के बीच, गौ-रक्षा के नाम पर हिंसा की 63 घटनाएं सामने आईं, जिनमें से डॉटा जर्नलिज़्म की जानी-मानी संस्था इंडिया स्पेंड के मुताबिक़, 97 फ़ीसद या 61 वारदात मई 2014 के बाद हुए जब नरेंद्र मोदी ने केंद्र में प्रधानमंत्री के तौर पर सत्ता की बागडोर संभाली.

गौ राजनीति तब और अब
मशहूर वकील कॉलिन गोंज़ाल्विस कहते हैं, "अब गाय की हिफ़ाज़त के नाम पर लोगों को पीट-पीटकर मार डाला जाता है और ये गौ-रक्षा की राजनीति सीधे-सीधे वोट की राजनीति से जुड़ गई है. जितना बांट सकते हो समाज को, अल्पसंख्यकों को जितना मार सकते हो उतना वोट मिलेंगे. दूसरी बात ये हैं कि इस रणनीति के जनरल बड़े सीनियर लोग हैं."
कॉलिन गोंज़ाल्विस उस टीम का हिस्सा हैं जिसने दिल्ली में 'किस तरह बचा रही है पुलिस पहलू ख़ान के हत्यारों को' नाम की एक रिपोर्ट जारी की है.
देश-विदेश की जानी मानी मानवधिकार संस्थाओं के ज़रिये की गई जांच के आधार पर जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि राजस्थान पुलिस ने पहलू ख़ान के मामले को न सिर्फ़ शुरु से कमज़ोर किया - न मुख्य छह अभियुक्त कभी गिरफ़्तार हुए, न पहलू ख़ान के परिवार से कभी मामले में पूछताछ की गई बल्कि अब केस को बंद करने का ऐलान कर दिया गया है.
सीआईडी की जांच के आधार पर अलवर पुलिस ने कहा है कि चूंकि जिन छह लोगों के ख़िलाफ़ मार-पीट का आरोप लगाया गया था वो वारदात के वक़्त - यानी 1 अप्रैल, 2017 को घटनास्थल पर नहीं, बल्कि उससे दूर किसी गौशाला में थे, और उसके पास इसकी गवाही भी है इसलिए केस को बंद किया जाता है.
पुलिस इस नतीजे पर अभियुक्तों के मोबाइल लोकेशन के आधार पर पहुंची है.

पुलिस कार्रवाई में पैटर्न
पूर्व एडिशनल सोलिसिटर जनरल इंदिरा जयसिंह कहती हैं कि किसी के फ़ोन का लोकेशन ये साबित नहीं करता है कि वो व्यक्ति वहीं था या नहीं और लोकेशन की बात पर बहस मुक़दमे की सुनवाई के वक़़्त होती है न कि पुलिस के स्तर पर.
रिपोर्ट के दिल्ली के प्रेस क्लब में जारी करते हुए उन्होंने कहा कि गौ-रक्षा के नाम पर होनेवाली हिंसा और उसके बाद हुई पुलिस कार्रवाई में एक पैर्टन उभरकर सामने आ रहा है.
उनका कहना था कि ऐसे मामलों में एफ़आईआर के जवाब में दूसरा एफ़आईआर और 'अलीबाई' यानी घटनास्थल पर न मौजूद होने के ग़लत साक्ष्य और झूठे गवाह तैयार किए जा रहे हैं और उस आधार पर केस को ख़त्म करवाया जा रहा है.
इंदिरा जयसिंह ने कहा, 'मैंने ऐसी रिपोर्टे देखी है कि आरएसएस और वीएचपी ऐसी नियामवली वाली जारी करती हैं जिसमें बताया जाता है कि ऐसे मामलों को किस तरह ख़त्म किया जाये.'
फिलहाल पहलू ख़ान हत्या मामले में छह के छह अभियुक्त ज़मानत पर रिहा हैं. रिपोर्ट में सवाल उठाया गया है कि जबकि उन लोगों के नाम पहलू ख़ान ने मौत के पहले दिए गए बयान में पुलिस के सामने लिए थे तो इन लोगों को ज़मानत कैसे मिल गई?

क्या कहती है राजस्थान बीजेपी?
गुरुवार को प्रेस क्लब में रिपोर्ट जारी करते वक़्त मौजूद पहलू ख़ाने के बेटे इरशाद ख़ान ने कहा कि हमले के वक़्त आक्रमणकारी एक दूसरे को नाम से पुकार रहे थे जिससे उनके पिता और उन्हें इन लोगों के नाम पता चले.
हालांकि भारतीय जनता पार्टी की राजस्थान इकाई के प्रवक्ता मुकेश चेलावत ने बीबीसी से फ़ोन पर कहा, 'जो लोग पुलिस की मिलीभगत का आरोप लगा रहे हैं वो 2002 गुजरात दंगों के वक़्त से ऐसा करने की कोशिश करते रहे हैं और उन्हें इसमें नाकामी मिली है. इस बार भी ऐसा ही है.'
बीजेपी प्रवक्ता का इशारा मानवधिकार कार्यकर्ता तीसता सितलवाड़ की तरफ़ था जो पहलू ख़ान पर की गई जांच दल का हिस्सा रही हैं और रिपोर्ट जारी करते वक़्त भी वो मौजूद थीं.
मुकेश चेलावत का कहना था कि कोई हमला करते वक़्त एक दूसरे का नाम नहीं लेता है. इसलिए इस तरह की बात करना ग़लत है.
छात्र नेता उमर ख़ालिद का कहना था, 'ये एक बड़ा फ़र्क़ समझने की ज़रूरत है कि सामान्यत: अपराध करनेवाला व्यक्ति अपने कारनामे के निशान मिटाने की कोशिश करता है लेकिन ऐसे मामलों में ख़ुद हमलावर घटना के वीडयो बनाकर उसको सोशल मीडिया पर अपडोल करता है.'

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उमर ख़ालिद का कहना था, 'ये एक तरह का संदेश देने की कोशिश है.' बीफ़ रखने के नाम पर मार डाले गए अख़लाक़ के मामले में केंद्रीय संस्कृति मंत्री महेश शर्मा न सिर्फ दादरी गए बल्कि उस घटना में मौत हो गए एक व्यक्ति को तिरंगे में लपेटा गया.
तीसता सितलवाड़ का कहना था कि इस तरह के मामलों में मानवधिकार और अल्पसंख्यक आयोग जैसी संस्थाओं का रवैया भी सवालों के घेरे में है और उन्होंने और दूसरी संस्थाओं और मानवधिकार कार्यकर्ताओं ने ये फ़ैसला किया है कि पहलू ख़ान मामले में एक प्रोटेस्ट पेटीशन अदालत में अगले 15 दिनों में दाख़िल किया जायेगा.
मारे जानेवाले अधिकतर मुसलमान
गौ-रक्षा के नाम पर हुई हिंसा में मारे जानेवाले 28 लोगों में से 86 फ़ीसद मुसलमान थे.
हालांकि दूसरे समुदायों पर हमलों की बात भी सामने आई है जैसे गुजरात के उना में छह दलितों को जो मरी गाय का चमड़ा निकालन रहे थे कथित गौ-रक्षकों के ज़रिये बहुत बुरी तरह पीटा गया. जिसके बाद गुजरात में दलितों का बड़ा आंदोलन भी हुआ.
प्रशांत भूषण कहते हैं कि एक तरफ़ जहां पुलिस हमलावरों के ख़िलाफ़ कार्रवाई से बचती है वहीं ज़्यादातर मामलों में उन लोगों के ख़िलाफ़ मामले दर्ज किए गए हैं जो ख़ुद पीड़ित रहे हैं.

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इन हमलों की तादाद कुछ इस तेज़ी से बढ़े हैं कि ख़ुद प्रधानमंत्री मोदी ने पहले अगस्त 2016 और फिर जून 2017 में न सिर्फ़ कथित गौ-रक्षकों को असमाजिक तत्व क़रार दिया बल्कि ये भी कहा कि गांधी जी ऐसी हरकतों को बर्दाश्त नहीं करते.
लेकिन फ़िलहाल प्रधानमंत्री की बात का बहुत असर दिख नहीं रहा - साल 2017 के पहले छह माह में गौ-रक्षा के नाम पर 20 हिंसक वारदातें सामने आई हैं, जोकि इंडिया स्पेंड के मुताबिक़ 2016 का 75 फ़ीसद हैं - वो 2016 जो पिछले सात सालों में गौ-रक्षा के नाम पर हुई हिंसा का सबसे ख़राब साल रहा है.
ये प्रधानमंत्री के लिए सोचने की बात है कि आख़िर उनकी बात कथित गौ-रक्षकों तक क्यों नहीं पहुंची और क्या ज़रूरत है अपने कहने के अंदाज़ को बदलने की या किसी ऐसे कड़े क़दम की ताकि ये बात उनतक पहुंच सके जिनको वो पहुंचाने की बात कह रहे हैं.
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