जानते हैं! बिहार में भी है एक ‘खजुराहो’

मंदिर की जर्जर हालत

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    • Author, सीटू तिवारी
    • पदनाम, हाजीपुर (बिहार) से, बीबीसी हिन्दी के लिए

बिहार का खजुराहो अपनी किस्मत पर रो रहा है. वो वीरान पड़ा है. उसके परिसर में कोई मच्छरदानी लगाकर सोया है तो किसी ने इस जगह को अपनी गाड़ी की बना रखा है.

झुंड में बैठे लोग ताश के पत्ते यहां फेट रहे हैं. ये अलग बात है कि बाहर 'वैधानिक सूचना पट्ट' लगा है जिस पर लिखा है कि ये राज्य सरकार द्वारा संरक्षित स्मारक है.

बिहार का खजुराहो या मिनी खजुराहो हाजीपुर के कौनहारा घाट पर बना नेपाली मंदिर है. भगवान शिव के इस मंदिर में काष्ठ कला का ख़ूबसूरत काम है. इसी काष्ठ (लकड़ी) कला में काम कला के अलग-अलग आसनों का चित्रण है.

बिदुपुर से मंदिर घूमने आए बाहरवीं के छात्र बिपिन कहते हैं, "लकड़ी पर पुराने कलाकारों ने जो काम किया है यही देखने के लिए हम यहां आए हैं. अगर लकड़ी पर किया ये काम टूट गया तो फिर आज का कोई कलाकार लकड़ी पर ऐसा काम नहीं कर पाएगा."

काम कला का एक नमूना

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18वीं सदी में हुआ निर्माण

हालांकि मंदिर घूमने आए बहुत सारे दूसरे लोगों की तरह बिपिन भी काम कला के अलग-अलग आसनों पर सीधी टिप्पणी नहीं करते.

पटना संग्रहालय के पूर्व निदेशक उमेश चंद्र द्विवेदी बताते हैं, "इस मंदिर का निर्माण 18वीं सदी में नेपाली सेना के कमांडर मातंबर सिंह थापा ने करवाया था. नेपाली आर्किटेक्चर का ये मंदिर है और लकड़ी पर काम कला के अलग-अलग आसनों का चित्रण है. चूंकि मंदिर का संरक्षण ठीक से नहीं हो पाया है इसलिए वुडन पैनल जिस पर इरोटिक सीन्स है उसमें दीमक भी लग गई है."

मंदिर को नेपाली सेना के कमांडर ने बनवाया था इसलिए आम लोगों में ये नेपाली छावनी के तौर पर भी लोकप्रिय है. स्थानीय निवासी रामानंद सिंह पेशे से राज मिस्त्री हैं.

मंदिर परिसर के दरवाज़े पर बैठे रामानंद कहते हैं, "देखिए मंदिर के चारों कोनों पर कटे हुए हाथ का चित्रण है. हमारे पूर्वज बताते थे कि जिन कारीगरों ने लकड़ी पर इतनी ख़ूबसूरत आर्ट की, उनके हाथ काट लिए गए, लेकिन उनके खाने-पीने और रहने की व्यवस्था नेपाल सरकार ने की."

लकड़ियों पर काम कला

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काम कला पर बात करने लगे हैं लोग

गंगा और गंडक नदी के संगम पर बने नेपाली मंदिर स्थानीय लोगों के बीच बहुत लोकप्रिय है. विजय मंदिर के गार्ड हैं, उन्हें 2 साल से वेतन नहीं मिला है.

वो कहते हैं, "जितने अफ़सर आते हैं सबको मंदिर के बारे में बता-बताकर थक चुके हैं, लेकिन कोई ध्यान नहीं दे रहा है. जगह-जगह से लकड़ी गिर रही है. इसी कौनहारा घाट पर 13 मंदिर हैं, कोई दूसरे मंदिर जाए ना जाए ये मंदिर ज़रूर देखने आता है."

समस्तीपुर के उजियारपुर की पिंकी भी अपनी मां और महिला रिश्तेदारों के साथ कौनहारा घाट आई है. जब महिलाओं का ये दल मंदिर के अंदर गया तो काम कला के आसन देखकर कुछ महिलाओं ने अपने सिर पर रखे पल्लू को और नीचे कर लिया.

हालांकि, बारहवीं की छात्रा पिंकी खुलकर बात करती हैं. वो कहती हैं, "देखने वाली चीज़ है. सब देख रहे हैं तो हम भी देख रहे हैं. लज्जा की क्या बात है."

पिंकी कुमारी

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गंदे इशारे भी करते हैं लोग

वहीं, मंदिर में अपने पति के साथ पूजा करने आई प्रीति कहती हैं, "इतिहास के हिसाब से तो ठीक है. कुछ गलत नहीं है. खजुराहो में भी हमें ऐसी मूर्तियां मिल जाएंगी. लेकिन अजीब तब लगता है जब लोग इन मूर्तियों को देखकर गलत इशारे करते हैं."

जहां कौनहारा घाट पर श्राद्ध कर्म करने आए लोगों ने मंदिर परिसर को श्राद्ध स्थल बना रखा है वहीं कुछ स्थानीय निवासियों की स्पष्ट समझ है कि मंदिर को पर्यटन स्थल के तौर पर विकसित किया जाए.

प्रीति कुमारी

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बिहार सरकार

अवधेश श्रीवास्तव स्थानीय निवासी हैं. वो कहते हैं, "सरकार उदासीन है, अगर सरकार इस जगह को पर्यटन स्थल के तौर पर विकसित करे तो लोगों को रोज़गार मिलेगा और इलाका समृद्ध होगा. वर्ना तो ये जगह लोगों की शरण स्थली बनी रहेगी."

इसके संरक्षण को लेकर जब पुरातात्विक निदेशालय (बिहार सरकार) के निदेशक अतुल कुमार वर्मा ने बीबीसी से कहा, "नेपाली मंदिर के संरक्षण को लेकर सरकार गंभीर है और हमने इनटैक (इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हैरिटेज) से संपर्क साधा है. उम्मीद है दो माह में संरक्षण का काम शुरू हो जाएगा."

अगर सरकार अपने आश्वासनों पर खरा उतर पाई तो बिहार में पर्यटन को बढ़ाने के लिए ये बहुत मददगार साबित होगा.

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