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ब्लॉग: महमूद फ़ारूक़ी बलात्कार मामला और 'सहमति' का सवाल
- Author, दिव्या आर्य
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
किसी औरत से जिस्मानी संबंध बनाने से पहले क्या मर्द सचमुच उनसे पूछते हैं, 'क्या आप मेरे साथ सेक्स करना चाहेंगी?'
क्या औरतें एकदम साफ़ जवाब देती हैं, 'हां, मैं चाहती हूं' या 'नहीं, मैं नहीं चाहती'?
मेरे ख़याल से ज़्यादातर मामलों में तो ऐसा कुछ नहीं होता.
ना मर्द इतने स्पष्ट तरीके से पूछते हैं और ना औरतें इतने साफ़ तौर पर जवाब देती हैं.
पर हम अंदाज़ा लगा ही लेते हैं ना?
लगा लेते हों तो ही बेहतर है. क्योंकि क़ानून के मुताबिक सेक्स अगर सहमति से ना हो तो बलात्कार है.
यानी अगर हम दोस्त भी हैं पर मैं आपको साफ़ तौर पर कहूं कि मुझे आपके साथ सेक्स नहीं करना और आप फिर भी मुझसे ज़बरदस्ती करें तो वो बलात्कार है.
'हां' का आकलन कैसे हो?
पर दिक्क़त तब आती है जब ये बात साफ़ तौर पर नहीं होती, जैसा कि कथित तौर पर फ़िल्मकार महमूद फ़ारूक़ी के मामले में हुआ.
फ़ारूक़ी के ख़िलाफ़ एक अमरीकी रिसर्चर के बलात्कार का आरोप था.
दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा कि जब फ़ारूक़ी ने रिसर्चर से जिस्मानी संबंध बनाने की कोशिश की तो ना ये साफ़ हुआ कि रिसर्चर ने स्पष्ट तौर पर 'नहीं' कहा और ना ये कि फ़ारूक़ी को वो 'असहमति' समझ में आई है.
इसलिए फ़ारूक़ी को 'संदेह का लाभ' देते हुए निर्दोष क़रार दिया गया.
पिछले साल उन्हें निचली अदालत ने दोषी पाया था और सात साल की सज़ा सुनाई थी.
यानी सवाल वही है, बिस्तर में हमबिस्तर होते व़क्त 'हां' का आकलन कैसे हो?
बंद कमरे में चादरों की उथलपुथल के बीच वो बारीक़ 'हां' जो कहीं खो जाती है, वो कैसे मुकम्मल हो?
ज़बरदस्ती क्या है?
अब सेक्स तो हम सबको पसंद है पर उसके बारे में बात करने में बेइंतहा शर्मिंदगी महसूस करते हैं.
एक वीडियो ने इसी शर्म को लांघने के लिए सेक्स की जगह चाय को रखा और फिर सवाल पूछा कि 'क्या आप चाय पीना चाहते हैं?'
वीडियो में दिखाया गया कि अगर आप किसी को चाय की पेशकश करें और वो 'नहीं' कह दे, तो उन्हें ज़बरदस्ती चाय नहीं पिलानी चाहिए.
अगर वो 'हां' कहें पर बाद में मन बदल दें, तो भी उन्हें ज़बरदस्ती चाय नहीं पिलानी चाहिए.
अगर वो बेहोश हों या चाय पीने के लिए 'हां' कहने के बाद बेहोश हो जाएं, तो उन्हें ज़बरदस्ती चाय नहीं पिलानी चाहिए.
और अगर पिछले हफ़्ते या कल रात उन्होंने चाय पीने के लिए सहमति दी थी पर आज नहीं चाहते, तो भी उन्हें ज़बरदस्ती चाय नहीं पिलानी चाहिए.
लब्बोलुआब ये कि सहमति ही सब कुछ है.
क्या इशारा समझ पा रहे हैं?
अब आप ये बहस कर सकते हैं कि बिस्तर में सेक्स के लिए सहमति लेने के मुकाबले चाय पीने के लिए 'हां' या 'नहीं' पूछना बेहद आसान है.
पर पेशकश चाय की हो या सेक्स की, क़ायदा यही है कि जवाब मांगने, सुनने और मानने की नीयत होनी चाहिए.
क्या आप क़रीब आना चाहते हैं पर उस औरत की आंखों में ना का अनुरोध है, वो आपके हाथ पीछे कर रही है, आपके शरीर को दूर कर रही है या सरलता से रुकने को कह रही है?
क्या वो कोई इशारा कर रही है? क्या आप सुन रहे हैं? क्या आप देख पा रहे हैं? और सबसे ज़रूरी, क्या आपकी नीयत है?
हमारी फ़िल्मों, सीरियल और मुख़्यधारा के मीडिया में हमने अजनबियों को ही बलात्कार करते देखा है.
मर्द अपनी ताकत से औरत को दबा रहा है और वो रोकर, चिल्लाकर कह रही है कि उसे ये नहीं चाहिए. यानी सहमति नहीं है और बलात्कार हो रहा है.
पर अगर वो मर्द कोई जानने वाला हो, दोस्त हो, आशिक़ हो या पति?
क्या आप भी ऐसे हैं?
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के पिछले दो दशक के आंकड़े बताते हैं कि पुलिस के पास दर्ज किए गए 97 फ़ीसदी मामलों में बलात्कार करनेवाला मर्द, औरत का जानने वाला होता है.
महमूद फ़ारूक़ी वाले फ़ैसले में अदालत ने कहा कि औरत अगर कमज़ोर तरीके से 'नहीं' कहे तो इसका मतलब 'हां' भी हो सकता है. ख़ास तौर पर अगर मर्द और औरत एक दूसरे को जानते हों, पढ़े-लिखे जानकार हों और पहले भी जिस्मानी संबंध बना चुके हों.
क्या ये जाना-पहचाना लगता है? क्या ये आपके जाननेवाले लोगों की तस्वीर के क़रीब है? क्या आप भी ऐसे हैं?
पढ़े-लिखे लोग जो अपने जाननेवाले किसी व्यक्ति के साथ अच्छा जिस्मानी रिश्ता बनाना चाहते हैं.
कितना मुश्किल है ये मालूम करना कि दूसरा व्यक्ति क्या चाहता है?
उस अमरीकी रिसर्चर ने अपनी एक दोस्त से कहा, "मैं हमेशा एक ऐसी औरत थी जो अपने शरीर और सेक्सुआलिटी की मालिक है. उस रात जो हुआ उसने मुझसे वो हक़ छीन लिया."
कितना मुश्किल है उस औरत के दिए इशारे सुनना, देखना और मानना?
और अगर 'ना' कमज़ोर तरीके से कही गई हो तो फिर वो सहमति है भी?
क्या ऐसे में पूरा मन जानने की ज़रूरत नहीं है?
एक-दूसरे के लिए हमें इतना तो करना चाहिए ना?
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