केरल में बाहरी मज़दूर सीख रहे हैं मलयालम

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भारत के दक्षिणी राज्य केरल में दूसरे राज्यों से आने वाले मज़दूरों के लिए एक किताब तैयार की गई है जो हिंदी के साथ- साथ स्थानीय भाषा मलयालम सीखने में मदद करती है.

बेंगलुरु में पत्रकार इमरान क़ुरैशी के मुताबिक भारत में क्षेत्रवाद के उदय के माहौल में इस प्रयोग का स्वागत किया जा रहा है.

केरल स्टेट मिशन अथॉरिटी (केएसएमए) ने 'हमारी मलयालम' के नाम से ये किताब लॉन्च की है. उम्मीद की जा रही है कि ये किताब दक्षिण भारत में हिंदी विरोधी माहौल और भाषा को लेकर होने वाले तनाव में नरमी लाएगी.

दिल्ली विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के प्रोफ़ेसर सतीश देशपांडे कहते हैं, "दक्षिण भारत के कई हिस्सों में हिंदी विदेशी भाषा की तरह है." वह आगे कहते हैं कि भाषा पहचान का हिस्सा है, ये भारत की सीमाओं के मज़बूत निशान हैं.

केरल में असम के मज़दूरों का एक समूह
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हिंदी का विरोध

पिछले महीने सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कर्नाटक में मेट्रो स्टेशन पर लगे साइनबोर्ड को काला कर दिया था. वहीं, मार्च में तमिलनाडु में सड़कों के साइनबोर्ड को अंग्रेज़ी से हिंदी में बदलने पर विरोध प्रदर्शन देखने को मिले थे.

देशपांडे कहते हैं, "भाषा का भारत में ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण स्थान है और इसकी भावना देशभक्ति से जुड़ी है."

केएसएमए की मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. पीएस श्रीकला कहती हैं कि दर्जनभर कक्षाएं लेने का मकसद ग़ैर-मलयाली भाषी लोगों को सामाजिक रूप से केरल समाज में शामिल करना है. वह कहती हैं कि कई लोग भारत के विभिन्न क्षेत्रों से आते हैं जिन्हें हिंदी भी नहीं आती है इसलिए हिंदी सिखाने की भी योजना शुरू की गई है.

मलयालम सीखने का उत्साह

इस कार्यक्रम के तहत कुछ उत्साही छात्र भी मिलते हैं. पश्चिम बंगाल के एक मज़दूर अब्दुल रहमान ने बताया कि उन्हें मलयालम सीखना बहुत कठिन लगा. लेकिन चूंकि केरल में लोग हिंदी नहीं बोलते हैं इसलिए उन्होंने मलयालम सीखी.

भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य असम के संजय गुरुंग कहते हैं कि इस भाषा को सीखने में तीन महीने लगते हैं. वह कहते हैं, "मैंने अभी मलयालम बोलने में कामयाबी हासिल की है लेकिन इसे लिखना और पढ़ना भी अच्छा रहेगा."

इसके मुकाबले कई ऐसे भी लोग हैं जिन्हें नई भाषा को अपनाने में दिक्कत आ रही है. प्रवासी मज़दूरों के लिए चलाए जा रहे ऐसे ही कार्यक्रम में मलयालम सीख रहे मोहम्मद नजमल हक़ तीन महीने के दौरान कुछ ही शब्द बोलना सीख पाए हैं.

ट्रेड यूनियन का इतिहास

स्थानीय भाषा न जानने की असमर्थता ने बाहरी होने की भावना को बढ़ाया है.

नाम न छापने की शर्त पर एक अधिकारी कहते हैं, "स्थानीय समुदाय के कुछ लोग उन्हें अपराधी भी कहते हैं क्योंकि ये सभी राज्य के बाहर से आते हैं."

उर्दू की एक किताब

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इमेज कैप्शन, भारत के सांस्कृतिक परिदृश्य में है भाषा का महत्व

वहीं, कई प्रवासी मज़दूर केरल जैसे राज्य में काम करने में फ़ायदा देखते हैं क्योंकि यहां का इतिहास मज़बूत ट्रेड यूनियन आंदोलन के साथ जुड़ा हुआ है. हक़ कहते हैं, "दूसरे राज्यों की तरह यहां हमें एक दिन में 8 घंटे से अधिक काम करने की ज़रूरत नहीं है."

विशेषज्ञ और सेंटर फॉर डेवलपमेंट स्टडीज़ की प्रोफ़ेसर इरुदया राजन राज्य में प्रवासी मज़दूरों के महत्व पर ज़ोर देते हुए कहते हैं, "प्रवासी मज़दूरों को केरल की नहीं बल्कि केरल को प्रवासी मज़दूरों की ज़रूरत है."

केरल के 33 लाख लोग बाहर

राजन कहते हैं कि केरल के तकरीबन 22 लाख लोग भारत से बाहर हैं और 11 लाख लोग केरल के बाहर भारत के अलग राज्यों में हैं. वो कहते हैं कि इसका मतलब है कि केरल के 33 लाख लोग अपने राज्य में नहीं रहते हैं.

वो कहते हैं, "केरल का एक प्लम्बर खाड़ी देश में काम करने जाता है जिसकी जगह ओडिशा का एक शख्स यहां आकर भरता है. मैं इसे प्रवासी मज़दूरों की अदला-बदली कहता हूं."

प्रोफ़ेसर राजन के अनुसार केरल के कई मालिक प्रवासी मज़दूर को नौकरी देने में विश्वास रखते हैं ताकि उन्हें कम पैसा देने पड़े क्योंकि केरल के मज़दूर को अधिक पैसे देने पड़ेंगे.

भारत में जब क्षेत्रों का बंटवारा होता है तो सांस्कृतिक पहचान और भाषा की बात आती है. प्रोफ़ेसर राजन कहते हैं कि स्थानीय भाषा सीखाने की पहल के सकारामत्मक परिणाम हो सकते हैं. वह कहते हैं कि यह एक दूसरी तरह का एकीकरण है जो ज़रूरी है.

(अतिरिक्त इनपुट्स कृतिका पाठी द्वारा)

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