अबू सलेम को फांसी क्यों नहीं हो सकती थी?

अबू सलेम

इमेज स्रोत, AFP

साल 1993 में मुंबई सिलसिलेवार बम धमाकों से दहल उठा था. इसमें 250 से ज़्यादा लोगों ने अपनी जान गंवाई. 700 से ज़्यादा लोग ज़ख़्मी हुए और करोड़ों रुपयों की संपत्ति का नुकसान.

24 साल बाद इस मामले में सुनवाई कर रही टाडा अदालत ने गुरुवार को फ़ैसला सुनाया.

दोषी ठहराए गए ताहिर मर्चेंट और फ़िरोज़ अब्दुल राशिद ख़ान को फांसी की सज़ा सुनाई गई है जबकि रियाज़ सिद्दीक़ी को 10 साल की सज़ा सुनाई गई है.

इसके अलावा अबू सलेम और करीमुल्लाह को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई.

छह लोग दोषी, दो को फांसी

अबू सलेम

इमेज स्रोत, Getty Images

सरकारी वकील उज्ज्वल निकम ने बताया कि दोषियों को जो सज़ा मिली है वो कंसॉलिडेट होगी और जितना वक़्त वो जेल में काट चुके हैं वो कुल सज़ा में से कम हो जाएगी.

कोर्ट ने इसी साल 16 जून को इस मामले में 6 लोगों (ताहिर मर्चेंट, फिरोज अब्दुल राशिद खान, करीमुल्लाह, अबू सलेम, रियाज़ सिद्दीक़ी और मुस्तफ़ा दोसा) को दोषी क़रार दिया था.

लेकिन एक सवाल ज़ेहन में आ सकता है कि जिस मामले में दो दोषियों को फांसी की सज़ा दी गई, उसी मामले में अबू सलेम को आजीवन कारावास क्यों हुआ?

निकम ने बताया, ''अबू सलेम के मामले में हम प्रत्यर्पण संधि के तहत फांसी की सज़ा नहीं मांग सकते हैं, इसलिए उसे उम्र कैद की सज़ा दी गई है.''

भारत और पुर्तगाल के बीच समझौता

अबू सलेम

इमेज स्रोत, AFP

सलेम के मामले में भारत और पुर्तगाल के बीच हुए समझौते और प्रत्यर्पण संधि की अहम भूमिका रही है.

इसकी कहानी आज से करीब 12 साल पहले शुरू हुई थी. भारत ने तीन साल जारी रही कानूनी लड़ाई के बाद अबू सलेम और मोनिका बेदी को लिस्बन से भारत लाने में कामयाबी हासिल की थी.

लिस्बन पुलिस ने सितंबर 2002 में फ़र्ज़ी दस्तावेज़ों पर सफ़र करने की वजह से सलेम और मोनिका बेदी को गिरफ़्तार कर लिया था.

लेकिन भारत और पुर्तगाल के बीच उस वक़्त कोई प्रत्यर्पण संधि नहीं थी, इस वजह से भारत को सलेम को लाने के लिए नवंबर 2005 तक का इंतज़ार करना पड़ा.

क्या शर्त रखी थी पुर्तगाल ने?

अबू सलेम

इमेज स्रोत, AFP

सलेम और मोनिका को भेजने के वक़्त पुर्तगाल ने ये शर्त रखी कि जिस व्यक्ति को वहां से भारत भेजा जाएगा, उसे सज़ा-ए-मौत या फिर 25 साल से ज़्यादा कैद की सज़ा नहीं सुनाई जा सकती.

साल 2007 में भारत और पुर्तगाल के बीच आख़िरकार प्रत्यर्पण संधि हुई. भारत की तरफ़ से तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पुर्तगाल के राष्ट्रपति अनिबल कवाचो सिल्वा ने इस पर दस्तख़त किए.

भारत ने पुर्तगाल की ये शर्त स्वीकार की कि दोषी को सज़ा-ए-मौत या 25 साल से ज़्यादा क़ैद की सज़ा नहीं दी जा सकती, इसके बाद ही दोनों मुल्क़ों के बीच ये संधि हुई थी.

अबु सलेम पुर्तगाल में गिरफ़्तार होने से पहले अमरीका से भाग निकलने में कामयाब रहा था. पुर्तगाल में गैर-कानूनी रूप से दाख़िल होने की वजह से सलेम और मोनिका पांच साल कैद की सज़ा का सामना कर रहे थे.

बच गए मौत की सज़ा से

अबू सलेम

इमेज स्रोत, AFP

ख़बर पता चली तो सीबीआई हरकत में आई और वकील पुर्तगाल रवाना किया गया ताकि वहां ये बताया जा सके कि भारत में उस पर संगीन मामलों में आरोप हैं.

भारत सरकार के साथ सहयोग करते हुए पुर्तगाली न्यायालय सलेम को सौंपने पर राज़ी हो गया लेकिन कहा कि क्योंकि उसे सज़ा पूरी करनी है, ऐसे में उसे फांसी की सज़ा नहीं दी जा सकती.

यूनाइटेड नेशंस कनवेंसन ऑन सप्रेशन ऑफ़ टेररिज़्म 2000 के तहत और पुर्तगालियों के साथ समझौते के तहत सलेम और मोनिका भारत आए थे.

और इसी समझौते ने सलेम को फांसी से बचा दिया.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)