'गोरक्षकों' पर लगाम कसने के लिए सुप्रीम कोर्ट सख़्त

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सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को देश के सभी राज्यों के सभी ज़िलों में गोहत्या रोकने के नाम पर हिंसा करने वालों पर लगाम कसने के लिए एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को नोडल अफ़सर के तौर पर तैनात करने का आदेश दिया है.
एक याचिका की सुनवाई करते हुए जस्टिस अमिताव रॉय और एएम ख़ानविलकर ने कहा कि ये नोडल अफ़सर इस पर नज़र रखेंगे कि कथित गोरक्षक क़ानून अपने हाथ में ना लें और उनके ख़िलाफ़ जल्द मामला दर्ज़ किया जाए.
मामले की अगली सुनवाई 22 सितंबर को होगी.

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क्या कहता है कोर्ट का आदेश?
कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता की तरफ से पेश हुई वकील इंदिरा जयसिंह ने कहा है कि राज्य सरकारों का काम केवल घटना होने के बाद एफ़आईआर दर्ज करना ही नहीं है, बल्कि ये देखना भी है कि ऐसे मामलों में लोग कथित गोरक्षा के नाम पर क़ानून अपने हाथों में ना लें.
इसके उत्तर में हरियाणा, गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान सरकार की तरफ से पेश हुए एडिशनल सॉलीसिटर जनरल ने कहा था कि इन राज्यों में पुलिस किसी वरिष्ठ अधिकारी को इस तरह के मामलों पर रोक लगाने के लिए नोडल अफ़सर को नामांकित करेगी.

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'केंद्र सरकार की कोई ज़िम्मेदारी बनती है'
अदालत का कहना है कि गोरक्षा के नाम पर राष्ट्रीय राजमार्गों पर पहरा देने वालों के संबंध में इन चार राज्य सरकारों ने क्या क़दम उठाए हैं इसके बारे में अदालत को जानकारी दी जाए.
राजमार्गों पर पहरा देने वालों के मामले में राज्यों के मुख्य सचिवों को डीजीपी से बात कर अगली सुनवाई होने तक अदालत को पूरी जानकारी देंगे.
कोर्ट का आदेश पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.
मामले में याचिकाकर्ता की तरफ से वकील इंदिरा जयसिंह ने बीबीसी संवाददाता मानसी दाश को बताया कि देश भर में लोगों की हत्या, महिलाओं का बलात्कार हो रहा है. और ये सब सिर्फ संदेह के आधार पर हो रहा है.
वो कहती हैं, "झारखंड में 12 साल के एक बच्चे का शव पेड़ से लटका मिला. उसे गोमांस खाने के शक़ में मार दिया गया था."
वो कहती हैं, "देश के अलग-अलग हिस्सों में जो हत्याएं हो रही हैं उसी के संबंध में हमने याचिका दायर की थी कि केंद्र सरकार की भी कोई ज़िम्मेदारी बनती है कि वो हर राज्य को इसे रोकने के आदेश दे."

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कितना संभव है ये आदेश लागू कर पाना
"इसी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने नोडल अफ़सर तैनात करने का आदेश दिया है. उनका एक ही काम होगा कि वो पेट्रोलिंग करें और इस तरह की घटनाओं को रोकें."
वो बताती हैं कि कोर्ट की अगली सुनवाई में इन नोडल अफ़सरों को बताना होगा कि इस तरह की हिंसा रोकने के लिए उन्होंने क्या किया और किस तरह के बंदोबस्त किए.
हाल में हुई कथित गोरक्षा के मामलों में जिस तरह के दलों और लोगों के नाम सामने आए हैं वो वैचारिक स्तर पर मौजूदा सरकार के करीब नज़र आते हैं. तो ऐसे में अदालत के आदेश को ज़मीनी स्तर पर लागू करना कितना संभव है?
इस पर इंदिरा जयसिंह कहती हैं, "ये एक गंभीर समस्या है लेकिन हम जैसे लोगों के हाथों में सिवाय क़ानून के के कुछ और नहीं है. हम बस इतना कर सकते हैं कि हम सुप्रीम कोर्ट से मांग करें कि सरकार के जो अधिकारी अपनी ड्यूटी भूल गए हैं वो उसे पूरा करें."

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क़ानून व्यवस्था
इंदिरा जय सिंह कहती हैं कि इस तरह के आदेश का उल्लंघन होगा "तो हम वापस सुप्रीम कोर्ट से कहेंगे कि वो इस अधिकारियों के ख़िलाफ़ कुछ कार्रवाई करे. जब हम कहते हैं कि क़ानून निजी हाथों में ना जाए तो इसका मतलब होता है कि पुलिस इसकी रक्षा करे. वो अपनी ड्यूटी नहीं करते तो इसका मतलब ये तो नहीं कि हम लोगों को अपने हाथों में हथियार उठाने दें. इस मामले में क़ानून हमारा बहुत बड़ा सहयोग दे सकता है."
इंदिया जयसिंह सवाल करती हैं कि हमारे यहां पर ये क्यों और कैसे हुआ कि क़ानून व्यवस्था टूट गई और लोग अपने हाथ में क़ानून लेने लगे.
वो कहती हैं, "ऐसे मामलों में पुलिस क्यों कुछ कर नहीं पाती? ज़रूरत है कि उनकी ज़िम्मेदारियां भी तय हों."
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