नज़रिया: चीन की किस आशंका ने सुलझाया डोकलाम विवाद?

भारतीय सेना

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    • Author, एसडी गुप्ता
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीजिंग

भारत और चीन द्वारा डोकलाम से अपनी-अपनी सेना पीछे हटाने की खबरें हैं. भारत कह रहा है कि दोनों देश आपसी सहमति से अपनी सेना हटा रहे हैं.

इसमें कोई दो मत नहीं है कि भारत और चीन के बीच सहमति बनी है और चीन ने इसकी पुष्टि भी की है.

चीन के विदेश मंत्रालय ने ये भी बताया है कि वो खुश हैं, लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि चीन का विदेश मंत्रालय अपने लोगों के सामने ये ज़ाहिर करने की कोशिश कर रहा है कि उन्होंने कोई रियायत नहीं दी है.

भारती सेना

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डोकलाम में पेट्रोलिंगजारी रहेगी

उन्होंने तीन बातें कहीं हैं. पहली कि भारत ने अपने सैनिकों को हटाया है. दूसरा कि डोकलाम क्षेत्र में हम अपनी पेट्रोलिंग जारी रखेंगे और तीसरा कि चीन अपनी संप्रभुता, अखंडता और सीमा की सुरक्षा के लिए जो भी ज़रूरी है वो करेगा.

चीन में फ़िलहाल स्थिति यह है कि बहुत से लोग सरकार पर प्रश्नचिन्ह लगाने लगे हैं. सोशल मीडिया पर लोग सवाल कर रहे हैं, "हमारी सरकार दो महीने से कह रही है कि कोई घर में घुस गया है तो धक्के मारकर क्यों नहीं बाहर निकाल रहे हैं?"

इस सवाल को लेकर ही चीन ने इस तरह से स्पष्टीकरण दिया है.

भारत में अगर नेता और अधिकारी परिपक्वता नहीं दिखाते हैं और ये समझने की कोशिश नहीं करते हैं कि ये स्थानीय लोगों को खुश करने की कोशिश की जा रही है. वो अगर इसे चुनौती देते हैं और ये कहते हैं कि नहीं, 'उनको तो हमने भगाया है.' तो फिर वही स्थिति बन सकती है.

चीनी राष्ट्रपति

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इमेज कैप्शन, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग

परिपक्वता दिखानी होगी

ये सहमति आसानी से नहीं बनी है. ऐसे में किसी न किसी को कहीं न कहीं परिपक्वता तो दिखानी होगी.

भारत अगर अब चीन के दावों को चुनौती देता है तो फिर से तीखी बयानबाज़ी शुरू हो जाएगी.

चीन के लिए सितंबर में होने वाला ब्रिक्स सम्मेलन अहम है. चीन अपने आपको अमरीका के मुक़ाबले देखता है और दुनिया को भी दिखाना चाहता है.

चीन ने कुछ संस्थाएं बनाई हैं. जैसे एशिया इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक, शंघाई स्थित ब्रिक्स बैंक, शंघाई कॉरपोरेशन ऑर्गनाइज़ेशन.

चीनी राष्ट्रपति

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इमेज कैप्शन, नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग

लग सकता था चीन को झटका

चीन दुनिया को बताना चाहता है कि अमरीका संस्थाए बनाता है तो हम भी बनाते हैं. अगर ब्रिक्स सम्मेलन में भारत के प्रधानमंत्री हिस्सा नहीं लेते हैं तो चीन को बड़ा झटका लगेगा और चीन के दुनिया का नेता होने के दावे पर भी असर होगा.

सबको जानकारी है कि रूस के व्लादिमीर पुतिन सम्मेलन में हिस्सा लेंगे. रूस की अर्थव्यवस्था बुरी हालात में है. चीन के अलावा रूस के पास कोई और रास्ता नहीं है.

दक्षिण अफ्रीका में भी जैकब ज़ुमा मुश्किलों में घिरे हैं. वो आंतरिक दबाव महसूस कर रहे हैं. ब्राज़ील का भी ज्यादा बोलबाला नहीं है. सारी दुनिया की नज़र इसी बात पर होगी कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सम्मेलन में आए या नहीं.

भारत ने शायद खुले तौर पर तो सख़्ती नहीं दिखाई होगी, लेकिन इसे परिदृश्य में लेते हुए बात की होगी कि ब्रिक्स में वो चाहते हैं कि मोदी आएं. इसलिए ये सहमति बनी होगी.

इस पूरे तनाव में भारत को जो हासिल हुआ है वो पहले किसी सरकार को नहीं हुआ. ये मोदी सरकार की बड़ी उपलब्धि है या एक हादसे की वजह से उपलब्धि हासिल हो गई है, वो इतिहास तय करेगा.

भारती सेना

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चीन ने पहली बार ऐसा कहा

बीते 20 साल में भारत ने डेढ़ सौ बार कहा है कि चीन के सिपाही हमारे यहां दाखिल हो गए हैं और रोते रहे हैं. अब पहली बार चीन ने कहा और दो महीने तक कहता रहा कि भारत अंदर आ गया.

इतिहास देख लें, भारत तो हमेशा आक्रमण का शिकार हुआ है. ये पहला मौका है जबकि भारत को इस तरह की इज़्ज़त मिली है.

चीन से अमरीका को डर लगता है. यूरोप तो दबा हुआ है. उस चीन का सामना भारत ने किया और युद्ध को भी परे रखा. अगर युद्ध हो जाता तो सम्मान नहीं रहता. दोनों स्थितियों के बीच से भारत के निकलने को लेकर उसकी कूटनीति और हिम्मत की दाद दुनिया दे रही है.

भारतीय सेना प्रमुख जरनल बिपिन रावत के एक बयान को अगर आप देखें तो उनका ये कहना है कि चीन ऐसा बार-बार करेगा.

ब्रिक्स

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अब होगा अमन-चैन?

अब सवाल यही रहेगा कि चीन क्या फिर ऐसी परिस्थिति बनाएगा? क्या लद्दाख़ या कहीं और दोनों देशों के बीच ऐसी स्थिति बनेगी या फिर दोनों देश अमन-चैन चाहते हैं?

ये दोनों देशों के आला नेताओं की परिपक्वता पर निर्भर करता है. दोनों नेता अपने लोगों को क्या संकेत देते हैं, ये इस पर भी निर्भर करेगा.

ब्रिक्स में मोदी आएंगे, उस वक्त अगर दोनों देश एक दूसरे के प्रति उदार रुख दिखा सके तो बड़ी बात होगी.

मुझे लगता है कि मोदी इस बात पर ज़ोर देंगे कि अगर आपको कोई संकेत देना है तो जो चरमपंथी पाकिस्तान से आते हैं, उन पर दबाव बनाकर रखिए.

चरमपंथियों पर रोक या फिर एनएसजी को लेकर समर्थन जैसे किसी मुद्दे पर अगर चीन से कोई संकेत मिलता है तो दोनों देशों के बीच बहुत अच्छे संबंध बन सकते हैं.

(बीबीसी संवाददाता वात्सल्य राय से बातचीत पर आधारित)

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