टूटी सड़कें, उखड़े पेड़, बंद रेल ट्रैक...यह बिहार की बाढ़ है

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- Author, रवि प्रकाश
- पदनाम, नरकटियागंज (पश्चिमी चंपारण) से बीबीसी हिंदी के लिए.
हमारी गाड़ी चलते-चलते अचानक रुक जाती है. ड्राइवर कहता है, उतर जाइए. आगे रिस्क है. वह सड़क जो मुझे रक्सौल से सिकटा ले जा रही थी, यहां उसका अस्तित्व ही खत्म होने के कगार पर है.
नहर के किनारे भीषण कटाव है. सड़क पूरी तरह कट चुकी है. दलदल है और कई गाड़ियां एक-एक कर पार हो रही हैं. वे ऐसे हिलती हैं, मानो अब गिरीं, तब गिरीं. मैं रक्सौल (पूर्वी चंपारण) से सिकटा (पश्चिमी चंपारण) जा रहा था.
भेलाही चौक पर इजहार हुसैन मिले. उन्होंने मुझे बताया कि 100 घरों वाले उनके गांव में एक भी कच्चा मकान सलामत नहीं बचा है. पक्के मकानों में रहने वाले लोग भी अपनी छतों पर चले गए. उनकी जान तो बच गयी लेकिन सारा चावल-गेहूं और घर का सामान बर्बाद हो गया.

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पानी हट चुका है
पश्चिमी चंपारण के अधिकतर इलाकों से बाढ़ का पानी हट चुका है. दरअसल, यह इलाका बाढ़ के जाने का मार्ग है. लिहाजा, गंड़क और उसकी सहायक नदियों में उफान के बाद उसका पानी बड़ी तबाही मचाता हुआ पूर्वी चंपारण, गोपालगंज और सारण के इलाके मे चला गया. इधर से गुजरती हुई बाढ ने पश्चिमी चंपारण की जमीन पर विनाश की ऐसी पेंटिंग की है, जिसे आप कभी भी नहीं देखना चाहेंगे.

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घर टूट गया
नूरबानो नेशां 70 साल की हैं. उन्होंने बताया कि सन 86 के बाद ऐसी विध्वंसकारी बाढ़ पहली बार आयी है. वे भेलाही की रहने वाली हैं और पानी हटने के बाद फल बेचने निकली हैं, ताकि कुछ पैसों का इंतजाम हो जाए.
नूरबानो नेशां ने बीबीसी से भोजपुरी में कहा- 'का कहीं हो बाबू. सब खत्म हो गइल. कुछो नईखे बाचल. पनिया आएल नु तो सुतल रही जा. हल्ला होखे से नींन खुलल. ओकरा बाद त 4-5 रात जगले रह गइनी. कहा सुतती आ कईसे नींद आइत. (क्या कहें बाबू. सब खत्म हो चुका है. कुछ भी नहीं बचा. पानी आया, तो हमलोग सोए थे. शोर से नींद खुली. उसके बाद तो 5 रातो तक रतजगा ही हुआ. कहां सोते और कैसे सोते. घर मे पानी आ गया था.)'
नहर क्षतिग्रस्त
पश्चमी चंपारण जिले में दोन, गंडक और त्रिवेणी नहरों को काफी क्षति हुई है. भेड़िहड़वा के हशमुद्दीन मिस्त्री ने बीबीसी को बताया कि इन सड़कों को बन पाने में काफी वक्त लगेगा. जबतक नहर के टूटे किनारों को नहीं बनाया जाता, तबतक गांव वालों पर ख़तरा बना रहेगा.

इमेज स्रोत, नहर टूटने से ख़तरा बना हुआ है.
भूकंप-सा नजारा
यह कहानी पश्चिमी चंपारण जिले की है. रक्सौल-सिकटा, सिकटा-नरकटियागंज और नरकटियागंज से बगहा होकर वाल्मीकि नगर जाने का रास्ता भी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुका है. जगह-जगह टूटी सड़कें, गिरे हुए पेड़ और बिजली के पोल इस भ्रम में डाल देते हैं कि कहीं यहां भूकंप तो नहीं आया था.

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नदियों में बाढ़
मेंने उन सभी जगहों की कष्टप्रद यात्राएं की, जहां से होकर नेपाली नदियां गुजरती हैं. इन सभी नदियों में अभी भी बाढ़ है. चंपारण का शोक कही जाने वाली मसान नदीं में पानी का वेग डरा देता है. धार इतनी तेज है कि छोटी-सी चूक आपको बहा ले जाएगी.

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वहां मछली मार रहे भखरु थारु मुझे नदी की धार से बचने की सलाह देते हैं. इसी तरह हरबोड़ा, बरगेर, बेला, हरहा जैसी नदियां भी उफान पर हैं.
गंडक नदी में आयी बाढ़ का बड़ा कारण ये नदियां हैं, जो नेपाल मे हिमालय और दूसरे पहाड़ों से निकलती हैं. स्थानीय पत्रकार अवधेश शर्मा कहते हैं कि इन नदियों पर किसी का नियंत्रण नही है. अगर नेपाल के पहाड़ी इलाको में बारिश हुई, तो इन नदियों में दोबारा बाढ़ आने से कोई नही रोक सकता.
रेलवे ट्रैक क्षतिग्रस्त
बाढ़ ने रक्सौल-नरकटियागंज रेलखंड को बुरी तरह तोड़ा है. इस रुट पर ट्रेनें नहीं चल रही हैं. इसी तरह रक्सौल-सीतामढ़ी रेलखंड पर कुंडवा चैनपुर के आगे ट्रैक टूट गयी है. ट्रेनें कुंडवा चैनपुर तक ही जा रही हैं. वे भी इक्का-दुक्का. रक्सौल के स्टेशन अधीक्षक पीएनपी श्रीवास्तव ने बीबीसी को बताया कि इन सभी ट्रैकों के पूरी तरह मरमम्त में एक सप्ताह या इससे अधिक का समय लग सकता है.
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