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शायरा बानो केस में ऐसा क्या था जिसके चलते तीन तलाक़ असंवैधानिक
- Author, गीता पांडेय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बीते साल दो बच्चों की मां 35 वर्षीय मुस्लिम महिला शायरा बानो जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचती है तो तीन तलाक़ के ख़िलाफ़ अभियान एक बार फ़िर ज़िंदा हो उठता है.
शायरा बानो ने साल 2016 की फ़रवरी में अपनी याचिका दायर की. वे कहती हैं कि जब वह अपना इलाज कराने के लिए उत्तराखंड में अपनी मां के घर गईं तो उन्हें तलाक़नामा मिला.
शायरा बानो ने इलाहाबाद में रहने वाले अपने पति और दो बच्चों से मिलने की कई बार गुहार लगाई लेकिन उन्हें हर बार दरकिनार कर दिया गया.
और, उन्हें अपने बच्चों से भी मिलने नहीं दिया गया. शायरा बानो ने अपनी याचिका में इस प्रथा को पूरी तरह प्रतिबंधित करने की मांग उठाई.
उन्होंने ये भी कहा है कि हलाला और कई पत्नियां रखने की प्रथा को भी गैर क़ानूनी ठहराया जाए.
वे कहती हैं, "ये सारी प्रथाएं गैरक़ानूनी, असंवैधानिक, लैंगिक न्याय के ख़िलाफ़ और भेदभाव करने वाली हैं."
क़ुरान और शरिया में एक बार में तीन बार तलाक़ बोलने की प्रथा का जिक्र नहीं है. बीते कई सालों में कई महिलाएं अलग-अलग अदालतों में तीन तलाक़ को चुनौती देती आई हैं.
ऐसे में शायरा बानो की कहानी में ऐसा क्या था जिसकी वजह से इस अभियान में नई जान फूंक दी गई.
मूलभूत अधिकारों पर सवाल
शायरा बानो के वकील बालाजी श्रीनिवासन ने बीबीसी से बात करते हुए बताया, "ये पहला मौका था जब एक मुस्लिम महिला ने अपने तलाक़ को इस आधार पर चुनौती दी कि इससे उनके मूल अधिकारों का हनन हुआ."
भारतीय संविधान के तहत इन अधिकारों को भारतीय संविधान की रीढ़ माना जाता है. ऐसे में इन अधिकारों को आसानी से छीना नहीं जा सकता है और ऐसा होने पर नागरिक अदालत का सहारा ले सकते हैं.
"एक मौलवी ने उनसे कहा, आपके धर्म की वजह से आपके पास मूल अधिकार नहीं हैं."
ऐसे में अगर आप हिंदू, ईसाई या किसी अन्य धर्म को मानने वाली महिला हैं तो आप ठीक हैं लेकिन अगर आप मुस्लिम हैं तो आपके पास मूल अधिकार नहीं हैं?
श्रीनिवासन कहते हैं, "इसलिए, शायरा बानो ने कोर्ट में जाकर अपने संवैधानिक अधिकारों के हनन की बात रखी और सर्वोच्च अदालत ने इस मामले पर सुनवाई करने का फ़ैसला लिया."
वे कहते हैं मुझे आश्चर्य है कि आज तक किसी ने इस बारे में क्यों नहीं सोचा, शायद ये एक ऐसी चीज़ थी जिसका सही वक्त आ चुका था.
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