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जब मुसलमानों ने ही तीन तलाक़ को ग़लत माना तो ये दख़ल क्यों?
भारत के सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय बेंच ने मंगलवार को दिए अपने एक फ़ैसले में मुसलमानों में शादी ख़त्म करने की एक साथ तीन तलाक़ की प्रथा को 3:2 से असंवैधानिक करार दिया है.
सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक़ पर फिलहाल छह महीने के लिए रोक लगा दी है और केंद्र सरकार से इस पर संसद में क़ानून लाने के लिए कहा है.
सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर पढ़िए मुस्लिम मामलों के जानकारों की राय.
ज़फ़र उल इस्लाम, अध्यक्ष दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग
"मैं व्यक्तिगत तौर पर तीन तलाक़ के ख़िलाफ़ हूं और इसे ग़लत समझता हूं लेकिन तीन तलाक़ पर बहस के दौरान मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने भी माना था कि ये ग़लत है और हम इस बारे में लोगों को जागरूक करेंगे.
जब मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने ही इसे ग़लत मान लिया था तो इस मामले में अदालत या सरकार को दख़ल देने की ज़रूरत नहीं थी. ये बिना वजह की दख़लअंदाज़ी है. अगर सरकार लोगों के धर्म में दख़ल देना शुरू कर देगी तो इससे बड़ी मुश्किल होगी. जो धार्मिक मामले हैं उसमें सरकार को नहीं पड़ना चाहिए.
तीन तलाक़ इस्लाम और कुरान की भावना के भी ख़िलाफ़ है लेकिन ये मज़हबी मामला है और ऐसे मामलों में दख़लअंदाज़ी करना सरकार का काम नहीं है."
प्रोफ़ेसर अख़्तर-उल-वासे
"इस फ़ैसले का सबसे संतोषजनक पहलू ये है कि सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं हस्तक्षेप नहीं किया है बल्कि सुप्रीम कोर्ट ने संसद से छह महीनों के अंदर विचार-विमर्श करके क़ानून बनाने के लिए कहा है.
मेरे मानना है कि अभी ये नहीं कहा जाना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक कह दिया है. यदि सुप्रीम कोर्ट ऐसा समझता तो फिर संसद से क़ानून बनाने के लिए नहीं कहा जाता."
"तीन तलाक के बारे में शुरू से ही मुस्लिम समाज में न तो सहमति थी न संतोष था. जो भी थोड़ा विरोध इसे लेकर मुस्लिम समाज की ओर से हुआ है उसकी वजह ये है कि ये भ्रांति पैदा की गई है कि मुसलमानों में न तो मां होती है, न बेटी होती है और न बहन होती है, सिर्फ़ बीवी होती है वो भी तलाक देने के लिए. इस्लाम की इस तरह घेराबंदी करना और इस्लाम के बारे में भ्रांति पैदा करना, इसे लेकर ही मुसलमानों में तकलीफ़ थी जिसकी वजह से इसका विरोध हुआ है.
ये अच्छी बात है कि भारतीय लोकशाही के अंदर सुप्रीम कोर्ट ने ये काम संसद को सौंपा है. लोकशाही में संसद सभी संप्रदायों और धर्मों का सामूहिक प्रतिनिधित्व करती है. मुझे उम्मीद है कि संसद मुसलमानों, ख़ासकर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की राय को शामिल किया जाएगा और ऐसा क़ानून बनाया जाएगा जो मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के हनन को रोकेगा.
इस फ़ैसले के लिए मैं सुप्रीम कोर्ट की प्रशंसा करता हूं क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने सीधे तौर पर हस्तक्षेप से इनकार करते हुए इस काम को लोगों के चुने हुए लोगों के हाथों में सौंपा है.
इसका अर्थ ये है कि जो समुदाय विशेष है उसके प्रतिनिधियों के साथ मशवरा करके ही आगे का रास्ता निकलना चाहिए.
मुसलमानों में तलाक की दर बेहद कम है और तीन तलाक की दर तो बहुत ज़्यादा कम है लेकिन यदि किसी एक व्यक्ति के अधिकारों का भी हनन होता है तो इस्लाम उसकी इजाज़त नहीं देता है. इस्लाम ज़ुल्म, नाइंसाफ़ी और शोषण के ख़िलाफ है."