नज़रिया: टाटा हो या इंफ़ोसिस, सवालों के घेरे में पेशेवर छवि

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- Author, परंजॉय गुहा ठाकुरता
- पदनाम, वरिष्ठ आर्थिक पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
इंफ़ोसिस के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के तौर पर विशाल सिक्का का इस्तीफ़ा कोई अचानक आया इस्तीफ़ा नहीं है.
पिछले कुछ महीनों से ये बात लगातार साफ़ होने लगी थी कि इंफ़ोसिस के प्रमोटर्स जिनमें नारायण मूर्ति भी शामिल हैं, वे सब विशाल सिक्का को नापसंद करने लगे थे.
नारायण मूर्ति ख़ुद विशाल सिक्का को 2014 में लेकर आए थे, लेकिन उन्हें भी विशाल सिक्का का स्वतंत्र रूप से काम करना पसंद नहीं आया.
विशाल सिक्का को लेकर कंपनी के शीर्ष प्रबंधन में कई तरह की बातें होने लगी थीं. उनपर ये आरोप लग रहा था कि वे शीर्ष अधिकारियों पर बहुत ज़्यादा पैसा ख़र्च कर रहे हैं, ख़ुद अपनी सुविधाओं पर उनका ख़र्च भी बहुत ज़्यादा हो गया है.
उनका विरोध करने वाले तो ये भी कहने लगे थे कि सिक्का कंपनी के काम के लिए निजी हवाई जहाज से इधर उधर घूम रहे हैं.
ये सब अंदरखाने चल रहा था और नारायण मूर्ति ने ख़ुद सार्वजनिक तौर पर कुछ लोगों के सामने कह दिया कि ये सब हो रहा है जो ठीक नहीं है.

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दोहराई कहानी
पहले ये लग रहा था कि शायद कंपनी के प्रमोटर और विशाल सिक्का के बीच आपस में ही बात बन जाएगी. कुछ सहमति हो जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया.
इसके उलट नारायण मूर्ति ने सार्वजनिक तौर पर विशाल सिक्का की आलोचना जारी रखी.
इंफ़ोसिस में जो हुआ है, वो काफ़ी हद तक टाटा एंड संस में जो हुआ था उसकी याद दिलाता है. रतन टाटा ने काफ़ी सोच विचारकर सायरस मिस्त्री को चुनकर कहा कि मेरे बाद यही सायरस टाटा एंड संस के चेयरमैन बनेंगे.
उस वक्त रतन टाटा ने ये भी कहा कि सायरस की उम्र काफ़ी कम है, थोड़े ही दिनों वे टाटा एंड संस का काम पूरी तरह संभालने लगेंगे.
लेकिन डेढ़-दो साल के अंदर ही टाटा एंड संस का पूरा समूह दो खेमे में बंटा हुआ नज़र आया.
एक रतन टाटा का समूह था, जो एक तरह से रतन टाटा के प्रति निष्ठा रखने वाले लोग थे और दूसरी तरफ़ वे लोग थे जो सायरस मिस्त्री के लाए हुए लोग थे.
दरअसल इंफ़ोसिस में जो हुआ है, वो टाटा एंड संस की कहानी का दोहराया जाना ही है.

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टकराव की वजह?
दरअसल एक कंपनी का शीर्ष आदमी जब ख़ुद इस्तीफ़ा देकर किसी नए आदमी को लाते हैं, तो कुछ ही दिनों में स्वतंत्र रूप से काम करने वाला आदमी उनको नापसंद होने लगता है.
इसकी कई वजहें बन भी जाती हैं, क्योंकि जो नया आदमी आता है, उसका कारोबार भी बढ़ाना होता है, तो काम बढ़ाने के लिए वह कंपनी में नए लोगों को लेकर आता है, शीर्ष स्तर पर लेकर आता है, ऐसे में पुराने लोग ख़ुद को उपेक्षित महसूस करने लगते हैं.
इतना ही नहीं कई बार कंपनी के लिए नए बॉस को पुराने बॉस का फ़ैसला बदलना भी पड़ता है. ये सब मिलकर वो हालात बना देते हैं जहां पर पुराने और नया नेतृत्व आमने सामने आ जाते हैं.
इंफ़ोसिस और टाटा एंड संस, दोनों ही मामलों में ये भी साफ़ हुआ है कि पुराने प्रमोटर चाहे वो नारायण मूर्ति हों या फिर रतन टाटा वह कंपनी पर नियंत्रण का मोह नहीं छोड़ पाए.
इसके लिए उन्होंने अपने विश्वासपात्र लोगों और नज़दीकी लोगों के बीच कई बार ये दोहराया कि कंपनी का नया नेतृत्व ठीक से काम नहीं कर रहा है.
यहां ये ध्यान देने की बात है कि दोनों ही मामलों में कंपनी की कारोबारी सेहत टकराव की अहम वजह नहीं थे.

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उठे सवाल
टाटा एंड संस में इस अलगाव में काफ़ी हद तक सायरस मिस्त्री के काम करने के अंदाज़ की भूमिका भी थी. क्योंकि वे टाटा एंड संस समूह के अंदर की कई चीज़ों को सामने लाने का काम भी कर रहे थे.
सेबी और ईडी को तो कार्रवाई करने का काम करना पड़ा था. एयर एशिया डील में 22 करोड़ रुपये कहां गए, इसका पता आज तक नहीं चल पाया. टाटा की कुछ संपत्तियों की ख़रीद पर भी सवाल उठने लगे थे.
ये बात भी बाहर निकल आई थी कि किस तरह टाटा एंड संस की बोर्ड मीटिंग में मौजूद एक सदस्य बाहर निकल कर फ़ोन पर रतन टाटा को मीटिंग की जानकारी दे रहा था, ये सेबी के कंपनी बोर्ड मीटिंग के प्रावधानों का उल्लंघन था. हालात इस स्तर तक भी पहुंच जाते हैं.
बहरहाल, टाटा एंड संस हों या फिर इंफ़ोसिस, दोनों ही कंपनी की साख को ऐसी स्थिति से नुकसान होता है.
कहने को तो कह सकते हैं कि इससे प्रोफेशनल छवि का नुकसान होता है, लेकिन उस वक्त ये भी महसूस होता है कि हम लोग अपने देश प्रोफेशनलिज्म की बात ज़्यादा करते हैं, उसे अमल में नहीं ला पाते.
चाहे वो इंफोसिस हो या फिर टाटा एंड संस, इन दोनों कंपनियों के शीर्ष नेतृत्व पर जिस तरह की खींचतान देखने को मिली है, उससे यही ज़ाहिर होता है कि कंपनी के प्रमोटरों ने प्रोफेशनलिज्म नहीं दिखाया.
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