#SwachhDigitalIndia : झूठे मैसेज फैलाने में व्हाट्सऐप सबसे आगे!

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- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
"लड़ाकों की भर्ती के लिए इस्लामिक स्टेट में भारत में एक व्हाट्सऐप ग्रुप चला रहा है. उस ग्रुप को एक बार ज्वाइन कर लिया तो इससे निकलना मुश्किल है. सावधान रहें."
"अपनी गाड़ी में पेट्रोल अधिकतम सीमा तक न भरवाएं. विस्फोट हो सकता है."
व्हाट्सऐप इस्तेमाल करने वालों के लिए ये संदेश दुख और डर पैदा करने वाले हो सकते हैं. लेकिन ये असत्यापित संदेश हैं.
हम ऐसे दौर में रह रहे हैं जब जानकारी की भरमार है और झूठे संदेश फैलाने में व्हाट्सऐप शायद सबसे आगे है.
भारत में 20 करोड़ से ज़्यादा लोग व्हाट्सऐप का इस्तेमाल करते हैं.
व्हाट्सऐप की पहुंच
2016 के अंत तक भारत में 30 करोड़ से ज़्यादा स्मार्टफ़ोन यूज़र्स थे और इस हिसाब से भारत में व्हाट्सऐप की पहुंच बहुत बड़ी है.
काउंटर प्वाइंट रिसर्च के नील शाह कहते हैं, "व्हाट्सऐप ने जानकारी दी थी कि दिवाली के दिन भारत में आठ अरब संदेश शेयर हुए. नए साल के दौरान 14 अरब संदेश शेयर किए गए. इनमें तीन अरब तस्वीरें, 70 लाख जीआईएफ़ और 61 लाख वीडियो शामिल थे."
इस ऐप पर केवल अफ़वाह और घृणा फैलाने के लिए कितने झूठे संदेश लोग शेयर करते हैं इस बारे में कोई डेटा उपलब्ध नहीं है.
आलोचकों के अनुसार 'एंड टू एंड' एनक्रिप्शन के कारण व्हाट्सऐप में एक ऐसी दुनिया खड़ी हो गई है जिसमें झूठी ख़बरों, प्रोपगैंडा, विद्वेषपूर्ण वीडियो और संदेशों की भरमार है और कोई इन संदेशों की समीक्षा भी नहीं कर रहा है.
'एंड टू एंड एनक्रिप्शन' का मतलब है कि संदेश को केवल वही पढ़ सकते हैं, जिसने संदेश भेजा और जिसे ये भेजा गया हो.
चिंताएं
इंटरनेट के ज़रिए पीड़ित लोगों की काउंसलिंग करने वाली देबारती हालदार कहती हैं, "भयानक हिंसा, अश्लील और यौन दुराचार से सबंधित संदेशों पर कंपनी की चुप्पी चिंताजनक है."
कोई नहीं जानता कि सैंकड़ों हज़ारों ग्रुप में लोग किस तरह की चीज़ें शेयर कर रहे हैं.
वो कहती हैं, "अगर कोई व्यक्ति किसी कंपनी की सेवाओं के कारण पीड़ित है तो कंपनी अपनी आंखें बंद नहीं कर सकती. अगर मैं किसी प्रोफ़ाइल के बारे में शिकायत दर्ज कराना चाहूं तो मैं कहां जाऊं? आरोपी व्यक्ति को अगर ब्लॉक कर दिया जाए तो वो तुरंत नया सिम खरीद सकता है."
इंटरनेट के लगातार गिरते दाम सरकार के लिए तेज़ी से चुनौतियां बढ़ा रहे हैं.
प्राइवेसी के नाम पर
व्हाट्सऐप का कहना है कि वो किसी का संदेश नहीं पढ़ सकता क्योंकि वो अपने सर्वर पर डेटा सेव नहीं करता. कंपनी इसका कारण डेटा की निजता और सुरक्षा बताती है.
लेकिन क्या व्हाट्सऐप के सर्वर पर कोई भी जानकारी सेव नहीं होती?
फ़ेसबुक के एक प्रवक्ता ने बीबीसी को बताया कि वो फ़ेक न्यूज़ के मामले में बाहरी लोगों से बात नहीं कर रहे हैं. फ़ेसबुक ने व्हाट्सऐप को 2014 में ख़रीदा था.
एथिकल हैकर रिज़वान शेख कहते हैं, "व्हाट्सऐप के सर्वर पर जो जानकारी जमा होती है वो हैं- मोबाइल नंबर, आईपी नंबर, ऑपरेटिंग सिस्टम और हार्डवेयर आईडी. डेस्कटॉप के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले व्हाट्सऐप पर कुकीज़ इकट्ठा की जाती है."
कुकीज़ वो फाइलें हैं जिनके ज़रिए विज्ञापनों के लिए किसी व्यक्ति के पसंदीदा शब्द सेव किए जाते हैं.
राजनीतिक इस्तेमाल
व्हाट्सऐप की पहुंच का अंदाज़ा हाल में हुए उत्तरप्रदेश चुनाव में एक बार फिर हुआ है. भारतीय जनता पार्टी के 6000 'स्वयंसेवकों' ने 10,000 से ज़्यादा व्हाट्सऐप ग्रुप बनाए थे.
इन ग्रुप्स पर शेयर किए जाने वाली चीज़ें 'पेशेवर लोग' बनाते बनाते थे "ताकि बीजेपी की पहुंच ब्लॉक स्तर के वोटरों तक हो सके."
हर व्हाट्सऐप ग्रुप में 150-200 यूज़र्स होते थे. भाजपा के एक अधिकारी के अनुसार इन सभी 10,000 ग्रुप्स को लखनऊ पार्टी दफ्तरों में रखे गए क़रीब दर्जन भर मोबाइलों के ज़रिए संचालित किया जाता था. हर मोबाइल से करीब 1,000 ग्रुप संचालित होते थे.
अधिकारी का दावा है, "उत्तर प्रदेश में करीब पांच करोड़ लोग इस ऐप का इस्तमाल करते हैं. इसमें से 80 प्रतिशत लोगों की उम्र 45 साल से कम है. हमारा भेजा गया हर संदेश करीब 25 लाख लोगों तक सीधे पहुंचता था. जब इस संदेश को लोग फॉरवर्ड करते थे, ये करीब एक से दो करोड़ लोगों तक पहुंचता था."
इसके मुकाबले समाजवादी पार्टी का आईटी सेल करीब 4000 व्हाट्सऐप ग्रुप चलाता था. सपा आईटी सेल के एक अधिकारी ने माना कि भाजपा ने व्हाट्सऐप का इस्तेमाल कहीं ज़्यादा प्रभावी तरीके से किया.
दोनों पार्टियां इस बात से इनकार करती हैं कि उन्होंने हिंसा को बढ़ावा देने वाले, समुदायों को बांटने वाले संदेशों को शेयर किया लेकिन सच बात ये है कि ऐसे वीडियो लोगों तक पहुंचे.
अगर राजनीतिक पार्टियों ने अपने चुनावी अभियान में हिंसा को बढ़ावा देने वाले संदेशों को फैलाया तो इसकी निगरानी कौन कर रहा था? अगर किसी पार्टी से इस बारे में सवाल किया जाए तो ज़िम्मेदारी हमेशा किसी 'अति उत्साहित कार्यकर्ता' पर डाली जा सकती है.

बन रही है ताकत
झूठी ख़बरों के तेजी से बढ़ने का कारण ये भी है कि अब समाचार वेबसाइट शुरू करना, उनके लिए कंटेंट जुटाना आसान हो गया है.
व्यापमं घोटाला मामले में व्हिसल ब्लोअर प्रशांत पांडे कहते हैं, "जब तक एजेंसियों को कुछ समझ में आए, ऐसी ख़बरें व्हाट्सऐप की मदद से तेज़ी से फैलती हैं. ये एक ब्लैक होल की तरह है."
पर्दे के पीछे ऐसे अनगिनत पुरुष और महिलाएं हैं जो इस तरह का कंटेट डिजाइन कर रहे हैं. ये कहना हमेशा आसान होता है कि ये लोग भावुक होते हैं. कई लोग राजनीतिक दलों और कुछ कंपनियों के लिए भी काम करते हैं.
एक जानकार ने पूछा, "आपको क्या लगता है ये ज़हर भरे वीडियो और खाने में कीड़े वाले वीडियो कहां से आ रहे हैं?"
सरकार चुप क्यों?
सोशल मीडिया पर इस तरह के 'डिजिटल सेना' का पोषण करनेवाली एक बड़ी अर्थव्यवस्था है.
सेंटर फ़ॉर इंटरनेट एंड सोसाइटी के सुनील अब्राहम कहते हैं, "ऐसे लोग दो तरह से पैसे कमाते हैं. पहले उन लोगों से जिन्होंने इन्हें काम पर रखा है. दूसरे विज्ञापनों के सहारे."
अब चाहे वो 2000 रुपये के नोट में जीपीएस चिप की बात हो या मुज़फ़्फ़रनगर में दंगों को भड़काने वाले कथित वीडियो हों, ग़लत जानकारी फैलाने में व्हाट्सऐप की क्षमता से इनकार नहीं किया जा सकता.
सरकार ऐसे लोगों के ख़िलाफ़ क्यों नहीं कार्रवाई करती?
विशेषज्ञों के अनुसार सरकार की प्राथमिकता अभी लोगों तक मोबाइल फ़ोन और डिजिटल सुविधाएं पहुंचाने की है, न कि देश में उच्च तकनीक को देश के भीतर लाने वाली कंपनियों को हतोत्साहित करने की.
एक और पक्ष है कि राजनेता व्हाट्सऐप की पहुंच को समझते हैं और वो इसका फ़ायदा उठाना चाहते हैं. व्हाट्सऐप का बिज़नेस मॉडल भी पूरी तरह पारदर्शी नहीं है.
व्हाट्सऐप अपने पोस्ट की पहुंच के बारे में जानकारी देने के लिए डैशबोर्ड जैसी सुविधा नहीं देता, और इस कारण यह पता नहीं चल पाता कि एक वीडियो या तस्वीर को कितने लोगों ने देखा है.
सुनील अब्राहम के मुताबिक फ़ेक न्यूज़ की अर्थव्यवस्था को खत्म करने के लिए दोषियों को मिल रहे आर्थिक मुनाफ़े को खत्म करने की ज़रूरत है, साथ ही ज़रूरत है लोगों की न्यूज़ फीड में विविधता लाई जाए.
(ये लेख बीबीसी हिंदी और 'द क्विंट' की साझा पहल 'स्वच्छ डिजिटल इंडिया' का हिस्सा है. इसी मुद्दे पर 'द क्विंट' का अंग्रेज़ी लेख यहाँ पढ़िए.)
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