मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के किसान क्यों हैं नाराज़

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महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के किसान बीते कुछ दिनों से अपनी मांगों को लेकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं.
महाराष्ट्र में जहां किसानों के सब्जियां और दूध सड़क पर फेंकने की तस्वीरें सोशल मीडिया पर छाई रहीं.
वहीं मध्यप्रदेश के मंदसौर में किसानों के आंदोलन उग्र होने के बाद पुलिस फायरिंग में पांच किसानों समेत छह लोगों की मौत हो गई.

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'सरकार ने बताई मृतकों की ग़लत संख्या'
इंदौर में राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ के अध्यक्ष शिवकुमार शर्मा ने दावा किया कि मंदसौर घटना में आठ लोगों की मौत हुई है. किसान संघों ने सरकार पर मृतकों की ग़लत संख्या बताने का आरोप लगाया.
किसान संघ ने 10 जून के बाद 'जेल भरो आंदोलन' की धमकी दी है. इस बीच मध्यप्रदेश सरकार ने मंदसौर, रतलाम और उज्जैन में इंटरनेट सेवा बंद कर दी है.
इससे पहले सीएम शिवराज सिंह चौहान ने ट्वीट किया, ''सरकार किसानों के साथ खड़ी है. हम मिल बैठकर समस्या का हल निकालेंगे. किसान भाइयों की वाजिब मांगें मान ली गई हैं.''

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महाराष्ट्र: 'किसान आंदोलन से 270 करोड़ रुपए का नुकसान'
दूसरी ओर महाराष्ट्र में भी किसान आंदोलन को लेकर राज्य सरकार ने नुक़सान का दावा किया है.
स्थानीय पत्रकार अश्विन अघोर के मुताबिक, महाराष्ट्र के कृषि मंत्री पांडुरग फुंडकर ने कहा, ''किसान संघ के नेता राजनीति कर रहे हैं. इन नेताओं को इससे कोई नुकसान नहीं हुआ है. लेकिन बीते दिनों से महाराष्ट्र में जो आंदोलन चल रहा है, उससे किसानों, व्यापारियों को क़रीब 270 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है.''
उन्होंने बताया, ''किसान फिलहाल असमंजस की स्थिति में हैं. किसानों के आंदोलनों के नेताओं का कई कोर कमेटी बनाने से आंदोलन कमज़ोर हुआ है. मराठवाड़ा के किसानों पर कोई लोन नहीं है. फसल अच्छी हुई थी, फिर भी ये लोग हड़ताल पर जा रहे हैं.''
ऐसे में सवाल ये है कि मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के किसानों की मांग क्या है, जिसके चलते बीते दिनों से किसान विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं.

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मध्यप्रदेश के किसानों की क्या हैं मांगें?
- किसानों का कर्ज़माफ किया जाए.
- किसानों को उचित समर्थन मूल्य दिया जाए.
- मंडी का रेट फिक्स किया जाए.
- किसानों को पेंशन देने का इंतज़ाम किया जाए.
- स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू किया जाए.

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क्या हैं महाराष्ट्र के किसानों की मांगें?
- पूरा कर्ज़माफ किया जाए.
- स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट को लागू किया जाए.
- 60 साल से ज्यादा की उम्र वाले किसानों को पेंशन मिले.
- लागत का डेढ़ गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) मिले.

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क्या हैं स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें?
डॉ. स्वामीनाथन की अध्यक्षता में नवंबर 2004 को 'नेशनल कमीशन ऑन फारमर्स' बना था. दो सालों में इस कमेटी ने छह रिपोर्ट तैयार की. इन रिपोर्ट्स में तेज और समावेशी विकास की खातिर सुझाव दिए गए थे.
- फ़सल उत्पादन मूल्य से पचास प्रतिशत ज़्यादा दाम किसानों को मिले.
- किसानों को अच्छी क्वालिटी के बीज कम दामों में मुहैया कराए जाएं.
- गांवों में किसानों की मदद के लिए विलेज नॉलेज सेंटर या ज्ञान चौपाल बनाया जाए.
- महिला किसानों के लिए किसान क्रेडिट कार्ड जारी किए जाएं.
- किसानों के लिए कृषि जोखिम फंड बनाया जाए, ताकि प्राकृतिक आपदाओं के आने पर किसानों को मदद मिल सके.
28 फीसदी भारतीय परिवार ग़रीब रेखा से नीचे रह रहे हैं. ऐसे लोगों के लिए खाद्य सुरक्षा का इंतज़ाम करने की सिफारिश आयोग ने की.
किसानों की मौत पर चुप क्यों मोदी?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्ता में आने से पहले स्वामीनाथन सिफारिशों को लागू करने का वादा किया था. लेकिन अब तक ये वादे पूरे नहीं किए गए हैं.
वहीं, मध्यप्रदेश में किसानों की मौत के बाद पीएम नरेंद्र मोदी ने अब तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है. जबकि 2015 में दिल्ली के जंतर-मंतर में किसान गजेंद्र के फांसी लगाने के कुछ ही घंटों बाद मोदी ने ट्वीट कर दुख जताया था.

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सोशल मीडिया पर लोग मोदी की चुप्पी पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं.
@Marc__Me ने लिखा- गजेंद्र सौभाग्यशाली था, जो पीएम नरेंद्र मोदी ने उन पर ध्यान दिया.

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शुवांकर मुखर्जी ने लिखा, मंदसौर में पुलिस ने पांच किसानों को मार दिया. लेकिन मोदी ने अब तक दुख नहीं जताया.''
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