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नज़रिया- ये कोरस लोकतंत्र की हत्या का बैकग्राउंड म्यूज़िक है: रवीश कुमार
- Author, रवीश कुमार
- पदनाम, एनडीटीवी के वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
डर के दस्तावेज़ नहीं होते हैं, डर का माहौल होता है.
मेरा यही छोटा सा जवाब होता है जब कोई कहता है कि देश में इमरजेंसी नहीं है, इमरजेंसी का भ्रम फैलाया जा रहा है. सत्ता के आतंक और अंकुश का अंतिम पैमाना आपातकाल नहीं है. डराने के और भी सौ तरीके आ गए हैं, जो आपातकाल के वक्त नहीं थे.
सरकारें सबको नहीं डराती हैं, सिर्फ उन्हें डराती है, जिनसे उसे डर लगता है. ऐसे ही लोगों के आस-पास डर का माहौल रचा जाता है. यही वो माहौल है जहां से सत्ता आपको डराती है.
यूनिवर्सिटी में इंटरनेट कनेक्शन काट दिया जाता है. पटेल आंदोलन होता है तो इंटरनेट बंद कर दिया जाता है. दलित आंदोलन होता है तो इंटरनेट बंद हो जाता है. मध्य प्रदेश के मंदसौर में इंटरनेट बंद करने का क्या तुक रहा होगा? क्या मंदसौर में मॉस्को जितनी इंटरनेट कनेक्टिविटी होगी?
'डर का दस्तावेज़ फाइलों में नहीं मिलेगा'
गोली खाने वाले किसानों की 'डिजिटल और डेटा हिस्ट्री' चेक की जाएगी?
सरकार को जब जनता से डर लगता है, तब उसका विश्वास इंटरनेट से उठ जाता है लेकिन जब बर्मा और बांग्लादेश की फर्ज़ी तस्वीरों को लेकर सांप्रदायिक उन्माद फैलाया जाता है, तब इंटरनेट बंद नहीं किया जाता है.
यही वो उन्माद है जो हमारे समय में डर का दस्तावेज़ है. जो फाइलों में नहीं मिलेगा, माहौल में मिलेगा.
फ़ोन पर गालियां देने वाला ख़ुद को कोलकाता का बता रहा था, कह रहा था कि तुम सुधर जाओ जबकि मैं छह जून को किसानों की आमदनी पर चर्चा करके स्टूडियो से निकला था.
किसानों को सच बताना गलत है?
क्या किसानों को यह बताना ग़लत है कि आपकी मासिक आमदनी 1600 रुपये है. सरकार ने लागत में पचास फीसदी जोड़कर दाम देने का अपना वादा पूरा नहीं किया है.
क्या किसानों की बात करने पर गालियां दी जाएंगी? बहरहाल, जिस तरह की गाली दी गई, उसे मैं भारतीय संस्कृति का दुर्लभ दस्तावेज़ मानता हूं, इन सबको संकलित कर संसद के पटल पर रखा जाना चाहिए.
जब से एनडीटीवी के प्रमोटर के यहां सीबीआई ने छापे मारे हैं, तब से ऐसे फोन की तादाद बढ़ गई है. एनडीटीवी को लेकर पहले से झूठ की सामग्री तैयार रहती है, उसी का वितरण समय-समय पर चालू हो जाता है. फोन पर कोई मुझे माओवादी कहता है, कोई अलगाववादी.
कोई देख लेने की धमकियां दे रहा है, व्हाट्सऐप के ज़रिए लगातार अफ़वाह फैलाई जा रही है कि मैं माओवाद का समर्थन करता हूं. अहमदाबाद एयरपोर्ट पर ख़ुद को बीजेपी का समर्थक बताने वाले एक सज्जन को नहीं समझा सका कि मैं माओवाद का समर्थन नहीं करता हूं.
'मेरे जैसे लोग सड़क पर घेर कर मार दिए जाएंगे'
व्हाट्सऐप के ज़रिए फैलाए जाने वाला झूठ एक दिन लोगों के मन में रेफरेंस प्वाइंट बन जाता है. वो उसी चश्मे से देखने लगते हैं. जिस दिन बहुत से लोग इस झूठ पर यक़ीन कर लेंगे, मेरे जैसे लोग सड़क पर घेर कर मार दिए जाएंगे.
उनकी हत्या का आदेश गृह मंत्रालय की फाइल में नहीं मिलेगा. माहौल में मिलेगा जिसे राजनैतिक तौर पर रचा जा रहा है.
अफ़वाह भारत का नया राजनीतिक उद्योग है. राजनीतिक दल का कार्यकर्ता अब इस अफवाह को फैलाने वाला वेंडर बन गया है. सिर्फ दो सवाल कीजिए, आपको सारे जवाब मिल जाएंगे. ये लोग कौन हैं और कौन लोग इनके समर्थन में हैं.
'मोदी का ट्विटर हैंडल सब बता देगा'
इसके लिए आपको बार-बार प्रधानमंत्री मोदी के ट्विटर हैंडल पर जाकर चेक करने की ज़रूरत नहीं है, बहुत से गायक, लेखक, समाजसेवी बनकर घूम रहे लोगों की टाइमलाइन से भी आप इसकी पुष्टि कर सकते हैं.
ये वही लोग हैं जो किसानों और ग़रीबों की बात करने पर किसी को नक्सल घोषित कर रहे हैं. तभी तो मुख्यमंत्री कह पाते हैं कि किसान पुलिस की गोली से नहीं मरे, असामाजिक तत्वों की गोली से मरे हैं. एक और मुख्यमंत्री हैं जो कहते हैं कि जो लोग किसानों को आंदोलन के लिए भड़का रहे हैं वो पाप कर रहे हैं.
देश भर में अनेक जगहों पर किसान आंदोलन कर रहे होते हैं, एक दिन सोशल मीडिया पर उनके ख़िलाफ़ भी अभियान चलेगा कि ये किसान नहीं, पापी हैं.
आजकल कई पत्रकारों को विपक्ष के किसी नेता के ख़िलाफ़ कोई स्टोरी दे दीजिए, फिर देखिए उनके चेहरे पर कैसी आध्यात्मिक खुशी छा जाती है. आप इन्हीं पत्रकारों को केंद्र के ख़िलाफ़ या सत्ताधारियों के ख़िलाफ़ कोई स्टोरी दे दीजिए, फिर उनकी चुप्पी देखिए.
पत्रकार का काम होता है सरकार के दावों पर पहले संदेह करे, जांच करे. इन दिनों सरकार की बात पर यकीन करने वाले पत्रकारों का समूह बढ़ गया है. इन पत्रकारों के पास सबसे बड़ा तर्क यह है कि पहले भी तो होता था.
'वो एक दिन स्टूडियो में ही गोली चला देंगे'
भारतीय पत्रकारिता में सरकार परस्ती बढ़ गई है. सरकार से प्यार करने वाले पत्रकारों की आपूर्ति मांग से ज़्यादा है इसलिए अब पत्रकार हुकूमत की नज़र में आने के लिए कुछ भी कर सकते हैं.
यही कारण है कि ऐसे पत्रकारों में होड़ मची है कैसे हुकूमत की नज़र में आ सकें. चीख कर, चिल्ला कर, धमका कर या उकसा कर. वो एक दिन स्टूडियो में ही गोली चला देंगे.
जिन दोस्तों से बात करता हूं वो हर दूसरी बात के बाद यही कहते हैं कि फोन तो रिकॉर्ड नहीं हो रहा है. मेरे पास इसका कोई प्रमाण नहीं है मगर माहौल में यह बात है कि फोन रिकॉर्ड हो रहा है.
चुप रहने की सलाह बढ़ती जा रही है. जानता हूं भीड़ कुछ भी कर सकती है. यह भीड़ गौमांस के नाम पर किसी मुसलमान को मार सकती है, यह भीड़ बच्चा चोरी की अफवाह पर किसी हिन्दू को मार सकती है, यही भीड़ लंगर के लिए अनाज मांग रहे किसी सिख सेवादार की पगड़ी उछाल सकती है.
'यह भीड़ नहीं, राजनीति का नया रॉकेट है'
यूपी में जब पुलिस अधिकारी नहीं बचे तो मैं सुरक्षा किससे मांगू. कहीं ऐसा न हो जाए कि यूपी का एसएसपी बजरंग दल के नेताओं की सुरक्षा में ड्यूटी पर जा रहा हो.
यह भीड़ नहीं, राजनीति का नया रॉकेट है जिसका हर दिन प्रक्षेपण किया जाता है. सतर्क रहने की चेतावनी जब बढ़ जाए तो इसका मतलब है कि डर का सामाजिक राजनीतिक और आर्थिक वितरण व्यापक हो चुका है.
डर का माहौल हर जगह नहीं होता है. उन्हीं के आसपास होता है जो सामाजिक आर्थिक मसलों पर बोलते हैं. यह व्यक्ति भी हो सकता है और समूह भी. दो रोज़ पहले पुरानी दिल्ली के किनारी बाज़ार से एक फोन आया था. कहने लगे कि हम व्यापारी हैं, अब हम खुलकर तो नहीं बोल सकते वरना ये सेल्स टैक्स और सीबीआई लगा देंगे, सोशल मीडिया से गाली दिलवा देंगे.
अच्छा है कि भाई साहब आप खुलकर बोलते हो. कोई तो बोल रहा है.
'फोन से डर की आवाज़ आ रही थी'
मैं हर विषय पर नहीं बोलता हूं. बोलने की पात्रता भी नहीं रखता. मेरी इस सफाई से किनारी बाज़ार के व्यापारी को कोई फर्क नहीं पड़ा. उनकी आवाज़ में डर था. मेरा हौसला बढ़ाने के लिए किया गए फोन से डर की आवाज़ आ रही थी.
ठीक इसी समय में बहुत से पत्रकार बोल रहे हैं. लिख रहे हैं मगर उनकी खबरों की पहुंच लगातार सीमित होती जा रही है. वो सब अपने-अपने संस्थान और मोहल्ले में अकेले हैं. जो हुकूमत के सुर से सुर मिलाकर गीत गा रहे हैं, उनकी आवाज़ ज़्यादा है. आप इस कोरस को ग़ौर से सुनियेगा. इस कोरस से जो संगीत निकल रहा है, वो भय का संगीत है.
लोकतंत्र की हत्या से पहले का बैकग्राउंड म्यूज़िक है.
भारत का मीडिया डर की राजधानी में रहता है. हम सब उस राजधानी से रोज़ गुज़रते हैं. डर सीबीआई का नहीं है, उस भीड़ का है जो थाने के बाहर भी है, अदालत के परिसर में भी. इस भीड़ को लेकर जो लोग नरम हैं, वही तो डर के दस्तावेज़ हैं.
वैसे लोग फाइलों में नहीं मिलते, आपके पड़ोस में हैं.
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