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नज़रिया: एनडीटीवी पर सीबीआई का छापा: रपट पड़े तो हर गंगे!
- Author, जगदीश उपासने
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
'रपट पड़े तो हर गंगे' कहावत है हिंदी की.
समाचार चैनल के प्रमोटरों के घर-दफ्तरों पर (न्यूज चैनल के दफ्तर, स्टूडियो या न्यूज़रूम पर नहीं) सीबीआई छापा डाले जालसाजी और आपराधिक षड़यंत्र के आरोपों में और स्यापा होने लगे प्रेस की आजादी का गला घोटने का!
जांच एजेंसी बताए कि जनाब, छापे इसलिए नहीं पड़े कि कर्ज समय पर चुकता नहीं हुआ बल्कि आईसीआईसी बैंक और एनडीटीवी के एक शेयर होल्डर की यह शिकायत दर्ज होने की वजह से पड़े कि प्रमोटरों ने आईसीआईसी बैंक के अधिकारियों से मिलीभगत के जरिए 48 करोड़ रुपये गलत तरीक़े से जेब में डाल लिए.
जांच एजेंसी दो साल पहले दिए सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले से लैस है कि निजी क्षेत्र के बैंकों के कर्मचारियों पर भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत कार्रवाई हो सकती है.
'प्रेस की आजादी पर हमला'
बैंकिंग और कंपनी नियमों से खिलवाड़, मुखौटा (शेल) कंपनियों के जरिए पूंजी उगाहकर चैनल का स्वामित्व बदल देने जैसे कई तथ्य इन छापों के बाद सामने आ रहे हैं जो देर-सवेर जांच के दायरे में जरूर आएंगे.
यही वजह है कि तमाम चीखपुकार के बावजूद दूसरे कई चैनलों ने छापों को लेकर आसमान सिर पर नहीं उठाया. देश के बड़े अखबारों ने इसे 'प्रेस की आजादी पर हमला' मानने से इनकार कर दिया.
यहां तक कि एडिटर्स गिल्ड ने महज चिंता जताई और कह दिया कि कानून से ऊपर कोई नहीं है. सीबीआई या पुलिस न तो एनडीटीवी के दफ्तर या स्टुडियो में गई, न ही छापों से चैनल के समाचार प्रसारण में कोई बाधा ही आई.
इंदिरा सरकार
आपातकाल की मिसाल देने वाले ज़रा भी नहीं जानते या जानना नहीं चाहते कि इंदिरा गांधी सरकार ने तब प्रेस का गला किस तरह और कितनी तेजी से घोंटा था!
सरकार विरोधी पत्र-पत्रिकाओं पर 25-26 जून की दरम्यानी रात में ही ताला लगा दिया गया और सैकड़ों पत्रकारों को जेल में ठूंस दिया गया. 'विचहंट' यानी बदला लिए जाने की कार्रवाई इसे कहते हैं!
और अब? मोदी सरकार आने के बाद से जिस तरह गाली-गुफ्तार चल रही है, प्रधानमंत्री का सिर तक काटकर लाने तक के फतवे जारी किए जा रहे हैं, उससे कोई भी सभ्य समाज शर्मसार हो सकता है.
यूपीए शासन में कभी आपने सुना कि किसी ने सोनिया गांधी या मनमोहन सिंह के लिए ऐसी बातें की हों? लेकिन 'अभिव्यक्ति की आजादी खतरे में' वाला अरण्यरोदन जारी है.
गोधरा कांड
संविधान में प्रेस को एक आम नागरिक जितनी ही आजादी है, न उससे कम, न ज्यादा. इस आजादी का कैसा इस्तेमाल हुआ?
2002 के गोधरा कांड में रेल डिब्बे में जलाकर मार दिए गए अयोध्या से लौट रहे लोगों की लाशों के वीभत्स दृश्यों के लाइव प्रसारण- जो गुजरात दंगों की भयावहता का सबब बने- से लेकर दंगों के दौरान प्रेस की परंपराओं को ठेंगा दिखाते हुए दंगाइयों और पीड़ितों की पहचान उनके धर्म-मजहब से करने तथा नितांत झूठी रिपोर्टिंग (जिससे दंगे और भड़के) में कौन-सी पत्रकारिता थी? उससे किनके हित साधे गए?
और फिर मोदी को हर जांच ने तमाम आरोपों से बरी कर दिया लेकिन चैनल की घरेलू अदालत उन्हें 2014 के लोकसभा चुनाव तक उन्हें कसूरवार ठहराती रही!
सबूत की क्या जरूरत थी? तथ्य जुटाने, तथ्यों को जांचने या क्रॉसचेक करना भी जरूरी नहीं था. गोधरा से लेकर 2014 तक और उसके बाद पत्रकारिता के धर्म-ऑब्जेक्टिविटी का क्या हुआ?
काली स्क्रीन
पूर्वाग्रहों और दुराग्रहों से आप भरोसेमंद कैसे बन सकते हैं? फिर प्रतिद्वंद्वी चैनल पर एक उभरता, डांटता-फटकारता एंकर अपने चैनल को टीआरपी में बढ़त दिलाए तो अपनी स्क्रीन पर अंधेरा कर दिया जाए.
बेचारे दर्शकों, दूसरे तमाम एंकरों, देश-राष्ट्र की बातें करने वालों और मोदी सरकार को रूंधे गले से प्रवचन पिला दिया जाए. और कोसने के लिए हिंदी बहुत प्रभावी भाषा है ही.
मोदी सरकार के तीन वर्षों में चैनल की स्क्रीन दो बार काली हुई. यह तब काली न हुई जब दिल्ली और पूरे देश को दहला देने वाला निर्भया कांड हुआ, लेकिन उस पर बने वृत्तचित्र पर पाबंदी लगते ही हो गई! यह आश्चर्य ही है कि इन छापों पर स्क्रीन काली नहीं की गई.
पठानकोट में सैन्य बेस पर आतंकियों के हमले के चैनल के लाइव प्रसारण से आतंकियों को भले ही मदद मिली हो पर मंत्रालय एक दिन की बंदी का हुक्म सुनाए तो मीडिया की आजादी संकट में?
मोदी राज
मीडिया बड़ा उद्योग है जिसमें बड़ी पूंजी चाहिए. एनडीटीवी जैसी कई मीडिया कंपनियां शेयर बाजार में सूचीबद्ध हैं. उन्हें कंपनी एक्ट से लेकर बैंकिंग के कई नियम पालन करने होते हैं.
प्रेस की आजादी के नाम पर इनका उल्लंघन करने की छूट किसी को नहीं, न ही इस नाम पर मीडिया कंपनियों को गोलमाल करने का विशेषाधिकार मिल जाता है.
मीडिया के व्यवसाय और प्रेस की आजादी में विभाजक रेखा बहुत पतली है जिसे बनाए रखने की प्राथमिक ज़िम्मेदारी मीडिया की है.
लेकिन गड़बड़ियां कर धन कमाने वाले और सरकारों के मुंहलगे मीडिया समूह अगर समझें कि 'न खाऊंगा, न खाने दूंगा' के घोषवाक्य के साथ सत्ता में आए मोदी के राज में वे ऐसा कर पाएंगे तो यह उनकी भूल होगी.
(लेखक जगदीश उपासने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रकाशन समूह के संपादक हैं)
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