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ग्राउंड रिपोर्ट 4: किससे लड़ रही है आज़ाद की भीम आर्मी
- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, सहारनपुर से लौटकर
सहारनपुर से लगभग 20 किलोमीटर दूर सरसावन गांव में भीम आर्मी की एक बैठक चल रही है.
बैठक में शामिल लगभग सभी लोग 30 साल से कम उम्र के हैं. अधिकतर पढ़े-लिखे लगते हैं. एक कमरे का ये कार्यालय बीच बाज़ार में है.
बाहर बाबा साहेब आंबेडकर की एक बड़ी तस्वीर लगी है जो कमरे के अंदर वाली तस्वीर से काफ़ी बड़ी है. दरवाज़े पर हिंदी में "भीम आर्मी" लिखा है.
इसके नीचे छोटे अक्षरों में "भारत एकता मिशन" दर्ज है. लोगों के अंदर आने-जाने का सिलसिला लगा रहता है.
भीम आर्मी
कमरे में पंखे की आवाज़ जितनी तेज़ है, इसकी गति उतनी ही धीमी.
यहाँ मौजूद लोग पसीने से नहा रहे हैं लेकिन अपनी एकाग्रता नहीं खोते हैं. अपनी बातें पूरे आत्मविश्वास के साथ कहते हैं.
भीम आर्मी के सरसावन क़स्बे के अध्यक्ष अलोक लोहानी कहते हैं, "आस-पास के गांवों में अब भी छुआ-छूत आम है. वो हम से कहते हैं कि भाई ये चमार है, इसे पीछे बैठा दो."
अलोक के एक दबंग साथी ने कहा, "ये ठाकुर लोग दलितों की शादियों में बारात अपने इलाक़े से गुज़रने नहीं देते."
ये हैं दलितों के नए चेहरे, उनकी नई आवाज़. भीम आर्मी इन दिनों सुर्ख़ियों में है.
इसके संस्थापक हैं चंद्रशेकर आज़ाद जिन्हें हिंसा में शामिल होने के इल्ज़ाम में पुलिस तलाश कर रही है.
दलित-ठाकुर हिंसा
इस महीने के शुरू में दलित-ठाकुर हिंसा से पहले भीम आर्मी का शायद ही किसी ने नाम सुना हो.
यहाँ के स्थानीय पत्रकारों ने भी मुझसे ज़ोर देकर कहा कि उन्होंने न तो भीम आर्मी और न ही इसके संस्थापक चंद्रशेखर आज़ाद का नाम इस महीने से पहले कभी सुना था.
पांच मई को एक धार्मिक जुलूस को लेकर सहारनपुर के शब्बीरपुर गांव में ठाकुरों और दलितों में झड़पें हुईं.
इस हिंसा में दलितों के 50 से अधिक घर जला दिए गए और एक ठाकुर युवक मारा गया.
चंद्रशेखर आज़ाद
अगले कुछ दिनों में भीम आर्मी काफ़ी सक्रिय हो गई. इसने 9 मई को सहारनपुर के गांधी पार्क में एक विरोध प्रदर्शन का आयोजन किया.
इस प्रदर्शन में सहारनपुर ज़िले से क़रीब हज़ार प्रदर्शनकारी इकट्ठा हो गए लेकिन प्रशासन की इजाज़त न होने के कारण पुलिस ने इसे रोकने की कोशिश की.
भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आज़ाद ने बीबीसी को बताया था कि प्रशासन की ओर से अनुमति न मिलने के कारण प्रदर्शनकारियों में आक्रोश बढ़ा और कई जगहों पर भीड़ और पुलिस में झड़पें हुईं.
इस दौरान एक पुलिस चौकी फूंक दी गई, एक बस को जला दिया गया और कई वाहनों को क्षतिग्रस्त कर दिया गया.
भीम आर्मी यहीं से सुर्ख़ियों में पहली बार आई. पहली बार पुलिस ने इसके नेताओं के नाम मुक़दमे दर्ज किए. इनके कुछ लोग गिरफ्तार भी किए गए.
इनमें से एक अलोक लोहानी भी थे जो हमारी मुलाक़ात से कुछ दिन पहले ही ज़मानत पर रिहा हुए हैं.
पुलिस का आरोप
अलोक लोहानी के साथी रमाकांत कहते हैं कि भीम आर्मी की स्थापना दो साल पहले दलित युवाओं को एकजुट करने और इन्हें पढाई में मदद के लिए हुई थी.
उन्होंने कहा, "हमारे लोग 100- 50 रुपए चंदा देते हैं जिससे संगठन 300 स्कूल चलाता है जहाँ दलित युवाओं को शिक्षा दी जाती है."
अब इसकी शाखाएं सात राज्यों में हैं लेकिन ये सहारनपुर में अधिक सक्रिय हैं.
उत्तर प्रदेश के एक उच्च पुलिस अधिकारी अमिताभ यश ने भीम आर्मी के खिलाफ हिंसा में शामिल होने के सबूत मिलने का दावा किया है.
लेकिन संगठन के सभी लोग इससे इनकार करते हैं. हाँ वो ये ज़रूर स्वीकार करते हैं कि भीम आर्मी ने 5 मई के दिन दलितों पर हुए हमले के खिलाफ प्रदर्शन ज़रूर किया था लेकिन हिंसा में इसके सदस्य शामिल नहीं थे.
नक्सलाइट शब्द का इस्तेमाल
प्रशासन और पुलिस में भीम आर्मी के लिए नक्सलाइट शब्द का इस्तेमाल किया जा रहा है.
अलोक लोहानी प्रशासन और पुलिस के खिलाफ भेद-भाव का इल्ज़ाम लगाते हैं, "शिव सेना और हिंदू युवा वाहिनी हथियार उठा सकती है. हम प्रदर्शन भी नहीं कर सकते? हमें नक्सलाइट कहा जा रहा है जो बिल्कुल ग़लत है."
भीम आर्मी दलितों का नया चेहरा ज़रूर है लेकिन वो ऐसा इकलौता संगठन नहीं.
उत्तर भारत में ही इस तरह के कई संगठन हैं, जिनमें भीम सेना, दलित चेतना विकास समिति, बहुजन मुक्ति पार्टी और राष्ट्रीय दलित महासभा ख़ास हैं.
महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान में भी दलित युवा एकता के नाम पर संगठन बना रहे हैं.
समाजशास्त्रियों के अनुसार मायावती जैसी दलित लीडरशिप दलितों के नए चेहरों को नहीं पहचानती, इनके बीच पीढ़ीगत फासले हैं.
मोदी समर्थक
अलोक लोहानी के अनुसार, "अगर मायावती, दूसरे दलित नेता और बीजेपी के अंदर दलित सांसद हमारे साथ होते तो ये दिन न देखने पड़ते."
भीम सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल भारती के विचार में भी नए दलित संगठनों की स्थापना के पीछे मायावती समेत दलित नेताओं की नाकाम लीडरशिप है.
इसीलिए जब 23 मई को मायवती ने शब्बीरपुर का दौरा किया तो उन्होंने भीम आर्मी जैसे संगठनों पर बीजेपी की बी टीम होने का इल्ज़ाम लगाया.
इस पर सहारनपुर से बीजेपी के सांसद राघव लखनपाल शर्मा ज़ोर से हँसे और कहा ये सब राज्य सरकार को बदनाम करने की एक साज़िश है.
अलोक लोहानी और उनके कई साथियों ने स्वीकार किया कि वो मोदी समर्थक थे.
मायावती के खिलाफ
उन्होंने कहा, "हमने लोक सभा और हाल में असेंबली चुनावों में दुनिया भर में लोकप्रिय नेता मायावती के ख़िलाफ़ मोदी को वोट दिया. बीजेपी को वोट दिया. लेकिन योगी आदित्यनाथ सरकार हमारे ख़िलाफ़ हो गई है."
उनके अनुसार हर नेता और हर पार्टी दलित को केवल चुनाव के समय पूछती है, "चुनवा के बाद वो हमें पहचानते भी नहीं."
भीम आर्मी और इस तरह के दूसरे कई दलित संगठनों की स्थापना के पीछे यही दलित-विरोधी सोच है.
लेकिन क्या ये संगठन दलितों को एकजुट करने में कामयाब हुए हैं? इसका जवाब कुछ समय बाद ही मिल सकेगा.
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