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ग्राउंड रिपोर्ट 1: जात-पात की लड़ाई में नहीं मारा गया दलित युवक?
- Author, जुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, सहारनपुर के सुवाखेड़ा गांव से
सहारनपुर का सुवाखेड़ा गांव दलित युवा आशीष की हत्या के दो दिन बाद ही सामान्य होता नज़र आ रहा था.
महिलाएं सर पर भारी बोझ उठाए अपने काम पर जा रही थीं. पुरुष खेती करने में जुट गए थे और युवा गांव की ओर आने वाली सड़क पर भीड़ लगाकर खड़े दुनिया भर की बातें किए जा रहे थे.
गांव में माहौल लगभग सामान्य था ,लेकिन आशीष के घर पर नहीं. दलित और ठाकुरों के बीच जारी हिंसा का ताज़ा शिकार 19 वर्षीय आशीष था जिसका परिवार अब भी शोक में डूबा था.
मैं जब वहाँ पहुँचा तो महिलाएं ग़म में डूबी थीं. मर्द एक साथ ख़ामोशी से बैठे थे. आशीष की अचानक मौत गांव वालों के लिए एक ज़बरदस्त झटका थी.
आशीष को पढ़ा चुके गाँव के एक शिक्षक ने कहा आशीष की ज़िंदगी अभी तो शुरू ही हुई थी.
उन्होंने कहा, "उसकी पूरी ज़िंदगी उसके सामने पड़ी थी. उसने किसी का क्या बिगाड़ा था."
घर वालों के घाव अभी ताज़ा थे. पाँच मई को शब्बीरपुर गांव में दलितों के घर जलाए जाने की घटना के कुछ समय बाद बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती 23 मई को शब्बीरपुर आई थीं.
आशीष उनकी रैली में शामिल होने शब्बीरपुर आया था. वापसी में दलितों पर हमला हुआ. गोलियाँ चलीं. आशीष की वहीं मौत हो गई.
पुलिस अब भी हमला करने वालों की शिनाख्त करने में जुटी है, लेकिन गांव वालों को यक़ीन है कि हमला ठाकुरों ने किया था.
उत्तर प्रदेश पुलिस के एक शीर्ष अधिकारी अमिताभ यश ने कहा कि आशीष की हत्या का कारण फ़िलहाल "हेट क्राइम" या ज़ात-पात की लड़ाई नहीं कही जा सकती.
उन्होंने कहा, "फ़िलहाल हम ऐसा नहीं कह सकते. तफ़्तीश जारी है. अभी कुछ कहना मुश्किल होगा "
भारतीय जनता पार्टी के सहारनपुर से सांसद राघव लखनपाल शर्मा कहते हैं कि उन्हें अफ़सोस है कि कम उम्र का दलित युवा मारा गया. लेकिन वो फ़िलहाल इसे जात-पात पर आधारित हत्या नहीं मानते.
आशीष के पिता मेघराज के आस-पास गांव के कई मर्द बैठे उनसे सहानुभूति दिखा रहे थे. गांव वालों को ठाकुरों पर शक होने के बावजूद मेघराज जल्दबाज़ी में किसी नतीजे पर नहीं पहुँचना चाहते थे.
"हमें क्या मालूम मेरे बेटे को किसने मारा? हम लोग मज़दूर हैं. मेरा बेटा केवल मज़दूरी करता था. उसकी दुश्मनी किसी से नहीं थी."
सोहनपाल सिंह आशीष के चाचा हैं. वो कहते हैं कि वो कमाने वाला घर का अकेला लड़का था.
वो बताते हैं, "आशीष के तीन भाई और एक बहन हैं. वो मंझला है, लेकिन स्कूल के बाद पढ़ाई नहीं की. दूसरे भाई बेरोज़गार हैं."
मिलजुल कर रहने के अलावा चारा नहीं
आशीष की माँ महिला रिश्तेदारों से घिरी थीं. उनका दर्द भरा चेहरा पल्लू से ढका था. मेघराज ने कहा कि आशीष की "मम्मी" को सब से बड़ा झटका लगा है.
"वो दो दिन से किसी से बात ही नहीं कर रही है."
आशीष की 14 वर्षीय इकलौती बहन उसे बहुत याद कर रही है.
वो रोते हुए कहती है, "मुझे मेरा भाई रोने नहीं देता था. मुझ से सबसे ज़्यादा प्यार करता था."
गाँव के दूसरे दलितों की तरह आशीष का परिवार भी काफ़ी ग़रीब है. मज़दूरी करने भी उन्हें ठाकुरों के खेतों पर काम करने जाना पड़ता है.
आशीष के पिता मेघराज दबी जुबान में कहते हैं वो ठाकुरों से दुश्मनी मोल नहीं ले सकते.
गाँव के प्रधान सतेंद्र के अनुसार दोनों समुदायों में कुछ ही बुरे लोग हैं. उनके अनुसार दोनों समुदायों को मिलजुल कर रहने के अलावा और कोई चारा नहीं.
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