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ग्राउंड रिपोर्ट-2: सहारनपुर में दलित ही नहीं, ठाकुर भी डरे हुए हैं
- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता रसूलपुर, सहारनपुर
रसूलपुर गांव की सुनीता को अपने पति सुमित को खोने का जितना गहरा दुख है, उतना ही अपने दो बच्चों के सवाल का जवाब न दे पाने का है, कि उनके पापा घर कब लौटेंगे?
तीन और चार साल के इन बच्चों को सुनीता क्या जवाब दें? 5 मई को शब्बीरपुर गांव में हुई दलित-ठाकुर हिंसा में उनके पति की हत्या कर दी गई थी.
"मेरे दोनों बच्चे रोज़ पूछते हैं, पापा कहां हैं, घर कब लौटेंगे, मैं....", सुनीता अपनी बात पूरी करने से पहले ही भावुक हो जाती हैं.
रसूलपुर ठाकुर बहुल गांव है. लेकिन यहां के ठाकुर आर्थिक रूप से काफी पिछड़े हैं.
27 वर्षीय सुमित रोज़ की दिहाड़ी करके अपने परिवार की परवरिश करते थे. उनकी मां नहीं हैं. पिता के पास एक छोटा सा खेत है. छोटा भाई पिता का हाथ बंटाता है. सुमित की हत्या के बाद यह परिवार गहरे आर्थिक कष्ट के दलदल में फंस गया है.
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गांव के मुहाने पर ही सुमित का घर है, जिसमें उनकी पत्नी, दो बच्चे, पिता और भाई रहते हैं. घर छोटा है. इसके अहाते में कुछ भैंसे बंधी हैं और सामने के कमरे में मवेशियों के लिए चारा रखा है.
सुमित घर का सब से बड़ा बेटा था. उसके एक चचेरे भाई कहते हैं, "वो दो भाई और एक बहन में सबसे बड़ा था. घर का बड़ा तो बड़ा ही होता है".
सुनीता और सुमित की शादी पांच साल पहले हुई थी.
पल्लू से अपना चेहरा ढंके सुनीता अपने चेहरे की उदासी और दुख चाहकर भी नहीं छिपा पा रही थीं.
जात-पात के दंगों के बाद दलितों के गांवों में जितना डर है, उससे कम डर ठाकुर गांवों में नहीं है. मई में तीन बार झड़पें हुईं हैं जिनमें ठाकुरों में सुमित की हत्या हुई और दलितों में 19 वर्षीय आशीष की. गोली और तलवारों से दर्जनों घायल हुए हैं.
तनाव बना हुआ है. दोनों समुदाय के लोग एक दूसरों के गांवों और मोहल्लों में नहीं जा रहे हैं.
ऐसे में सुनीता दोनों पक्ष से शांति की अपील करती हैं और कहती हैं कि क़ानून को कोई अपने हाथ में न ले.
सुनीता ने दोनों समुदायों से अपील करते हुए कहा, "मेरे बच्चे यतीम हो गए हैं. हिंसा से दोनों ओर के बच्चे यतीम होंगे. इसे बंद करना चाहिए." वो आपसी दुश्मनी के ख़िलाफ़ हैं .
उनके पति सुमित इसी आपसी दुश्मनी के शिकार हो गए. जब 5 मई को वो अपने घर से सुबह निकले थे तो सुनीता से उन्होंने कहा, "मैं शब्बीरपुर अपनी मासी से मिलने जा रहा हूँ".
सुनीता कहती हैं, "साढ़े ग्यारह बजे फोन आया. उनकी जान मौके पर ही निकल गई थी." परिवार और मोहल्ले वालों ने बताया कि सुमित को पत्थर से पीट-पीट कर मार दिया गया था.
सुनीता दावा करती हैं कि उनके पति की हत्या के पीछे शब्बीरपुर के दलितों का हाथ था, लेकिन इसकी पुष्टि पुलिस ने अब तक नहीं की है.
क्या 23 मई को दलित युवा आशीष की हत्या सुमित की हत्या का बदला था? पुलिस ने कुछ गिरफ्तारियां ज़रुर की हैं लेकिन इस सवाल का जवाब फ़िलहाल किसी के पास नहीं.
सहारनपुर से भाजपा के सांसद राघव लखनपाल शर्मा कहते हैं अब समय है ज़ख्म भरने का, मरहम लगाने का. लेकिन दोनों समुदायों में सुनीता से अधिक इस सुझाव पर हाथ उठाने वाला इस समय शायद ही कोई मिले.
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