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नज़रिया: भीम आर्मी बेज़ुबान दलितों की आवाज़ है या लोकतंत्र के लिए चुनौती?
- Author, सुभाष गताडे
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में राजपूतों और दलितों के बीच हिंसक घटनाओं के बाद भीम आर्मी चर्चा में है.
भीम सेना के नाम से लोगों को कन्फ़्यूजन हो सकता है. सेना से आर्मी का मतलब निकाला जाता है.
लेकिन इससे जुड़े लोग संविधान के दायरे में रहकर काम करने की बात करते हैं. दलितों को संगठित करने की बात करते हैं.
मेरा मानना है कि ऐसी समानांतर सेनाएं खड़ी होने लगेंगी और ये ज्यादा उग्र तरीके से काम करेंगी तो लोकतंत्र के लिए अलग ढंग से चुनौती खड़ी हो सकती है.
दलितों की शिकायत की समस्या के जड़ में जाने की जरूरत है.
दलितों की पार्टियों को फ़ुर्सत नहीं
ये सोचे जाने की जरूरत है कि किन वजहों से दलित ऐसे उग्र संगठनों का गठन कर रहे हैं. इसकी दो-तीन वजहें दिखाई देती हैं.
दलितों के हितों के लिए काम करने का दावा करने वाली बड़ी पार्टियां अपनी प्रासंगिकता खो रही हैं. वो सिर्फ सत्ता की राजनीति में उलझ कर रह गई हैं.
जिसकी वजह से दलित आबादी के साथ हो रही बदसलूकी और जिसे वो दोयम दर्जे का बर्ताव मानते हैं, उसे कोई जुबान नहीं मिल पा रही है.
दूसरी वजह ये है कि पूरे देश में एक तरह का वातावरण बन रहा है कि कुछ लोग खुद को डॉक्टर आंबेडकर का वारिस तो बता रहे हैं लेकिन दलितों के लिए कुछ करने से बच रहे हैं.
ये विरोधाभास दिख रहा है.
उग्र विरोध में भीम सेना बस एक हिस्सा
भीम सेना के प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि सहारनपुर हिंसा के बाद अगड़ी जाति के लोगों को हथियारों के साथ प्रदर्शन की इजाजत दी गई जबकि दलितों को शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने से भी रोका गया.
प्रशासन और सरकार के स्तर पर ये दोहरा बर्ताव दिख रहा है.
जनांदोलन और इन संगठनों के रूप में दलितों का जो उभार हो रहा है, उससे राजनीतिक दल अपने तौर तरीकों में बदलाव लाने पर विवश होंगे.
देश भर में दलितों के साथ जो कुछ हो रहा है, भीम सेना केवल उसका एक हिस्सा है.
गुजरात में गाय के नाम पर दलितों के साथ जो कथित ज़्यादतियां हुईं, उससे दलित उग्र विरोध करने पर विवश हो रहे हैं, फिर ये मामले चाहे गुजरात या फिर झारखंड के हों.
ये विरोध अलग-अलग स्तरों पर दिख रहा है और इसी के कारण मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियां अपने नीति बदलने पर मजबूर होंगी.
दक्षिणपंथी राजनीति
सेना या संगठन बनाने का शगल अगड़ी जातियों में भी देखा जा रहा है. कोई ये पूछ सकता है कि उन्हें आखिर किस तरह की असुरक्षा है?
मेरा मानना है कि पूरी दुनिया में जिस तरह से दक्षिणपंथ का उभार हो रहा है, उससे एक अनुदारवादी माहौल हर जगह बन रहा है.
आप देख सकते हैं कि लोग चाहे गाय के नाम पर हो या बच्चा चोरी के नाम पर, कानून अपने हाथों में लेकर किसी को भी मार रहे हैं.
और पिछले तीन सालों, भीड़ द्वारा पीट-पीटकर मार देने की घटनाएं बढ़ी हैं.
संविधान में सबका विकास की बात कही गई है लेकिन ये भावना बढ़ रही है कि अलग-अलग विकास हो और सभी को अपनी-अपनी तरक्की चाहिए.
सरकार ख़ास लोगों के बारे में सोच रही हैं
देश में जिस तरह की दक्षिणपंथी राजनीति का चलन बढ़ा है, ये उसी का प्रतिबिंब है कि कथित अगड़ी जातियों या फिर किसी अन्य समुदाय के नाम पर कैसे तथाकथित सेनाएं खड़ी हो रही हैं.
इसके लिए कहीं न कहीं सरकारें भी जिम्मेदार हैं. वो दोनों पक्षों की चिंताएं दूर करने में नाकाम रही है.
दिल्ली में आयोजित विरोध प्रदर्शन में सहारनपुर से लोग आ रहे हैं तो इसका मतलब साफ है कि लोग उपेक्षित महसूस कर रहे हैं.
सरकार की तरफ से जो समावेशी रुख होना चाहिए, वो नहीं दिख रहा है और ये भावना बन रही है कि मौजूदा सरकार ख़ास लोगों के बारे में ज्यादा सोचती है.
(बीबीसी संवाददाता निखिल रंजन से बातचीत पर आधारित.)
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