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नज़रिया- जो ख़ुद को हिंदू न माने उसे नक्सली माना जाए?
- Author, अनिल यादव
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
पाखंड कोई करना चाहता नहीं है, लेकिन संविधान और कानून के कारण करना पड़ता है जिसने लोकतंत्र में सबके अधिकार और कर्तव्य तय किए हैं.
बिना दोहरे-तिहरे पैमाने अपनाए जातिवाद और धर्मांधता का मध्ययुगीन एजेंडा आगे बढ़ा पाना संभव नहीं है.
इसे इन दिनों चर्चा में आए दलित युवाओं के नए संगठन भीम आर्मी और जाति-धर्म की आग में झुलसते सहारनपुर की दो घटनाओं के जरिए समझा जा सकता है.
अंबेडकर जयंती 14 अप्रैल को होती है लेकिन सहारनपुर के सांसद राघव लखनपाल शर्मा और सत्ताधारी भाजपा के कई विधायकों ने अंबेडकर शोभा यात्रा 20 अप्रैल को निकाली.
नेता ही ले रहे क़ानून हाथ में
मुस्लिम बहुल इलाकों से बिना प्रशासन की अनुमति के निकाले गए अंबेडकर जयंती जुलूस में 'जय श्रीराम' और ...'योगी योगी कहना होगा' के नारे लग रहे थे, यह अंबेडकर को हिंदुत्व की श्रद्धांजलि थी.
दोनों पक्षों के बीच पत्थरबाज़ी और आगज़नी के बाद प्रशासन ने जुलूस को रोका तो भाजपा सांसद की अगुवाई में सीनियर एसपी के बंगले पर तोड़फोड़ हुई.
इस कांड के ठीक पहले यूपी के मुख्यमंत्री योगी ने पार्टी के सांसदों-विधायकों से कानून हाथ में न लेने को कहा था जिसे उन्होंने एक कान से सुना दूसरे से निकाल दिया.
शायद वे जानते थे कि मुख्यमंत्री की पृष्ठभूमि को देखते हुए उनकी सलाह को कितनी गंभीरता से लेने की ज़रूरत है.
भीम आर्मी पर एनएसए लगाने की तैयारी
दूसरी घटना शब्बीरपुर में 5 मई को महाराणा प्रताप जयंती के जुलूस के दौरान हुई.
बड़े पैमाने पर हिंसा हुई, दलितों के बीसियों घर जला दिए गए, मंदिर में रखी संत रविदास की मूर्ति तोड़ दी गई.
इस हिंसा में एक राजपूत युवक की मौत हो गई जिसकी मौत का कारण पोस्टमार्टम रिपोर्ट में दम घुटना बताया गया है.
बताया जा रहा है कि अब प्रशासन भीम आर्मी पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) लगाने की तैयारी में है और उसके नक्सली संबंधों की जांच की जा रही है क्योंकि उसके तौर-तरीके नक्सलियों से मिलते-जुलते बताए जा रहे हैं.
पीड़ितों पर ही कार्रवाई
यहां गौर किया जाना चाहिए कि पांच घंटे तक पुलिस की मौजूदगी में शब्बीरपुर में नंगी तलवारें भांजने वालों और पेट्रोल बम लेकर दलितों के घर जलाने वालों से तो मानो राष्ट्रीय सुरक्षा को कोई खतरा नहीं है?
मुख्यमंत्री की हिदायत के बावजूद कार्यकर्ताओं को साथ एसपी के बंगले पर आक्रमण कर उसके बीबी-बच्चों को गौशाला में छिपने के लिए मजबूर कर देने वाले भाजपा सांसद की छापामार शैली क्या नक्सलियों से नहीं मिलती है?
लेकिन ये क़ानून भीम आर्मी पर आज़माए जाने की संभावना है जिसने किसी के घर तोड़फोड़ नहीं की, बल्कि उन्हीं के घर जलाए गए थे.
यहाँ प्रशासन का जातीय पूर्वाग्रह और सत्ताधारी पार्टी की चुप्पी सामने आती है.
सभी जानते हैं कि यूपी प्रशासन की जातीय लॉबियों को सत्ताधारी दल अपने लिए मुफीद जातीय समीकरणों के हिसाब से ताश के पत्तों की तरह फेंटते और इस्तेमाल करते रहते हैं.
यही कारण है कि हर बिरादरी अपने कलेक्टर और थानेदारों की संख्या को प्रशासन में भागीदारी का पैमाना मानने लगी है.
पहली बार'फ़ाइट बैक'
अब तक दलित जातीय संघर्ष की घटनाओं में पीड़ित और फरियादी के रूप में ही दिखाई देते रहे हैं, लेकिन पहली बार वे आश्चर्यजनक रूप से संगठित होकर लड़ते दिखाई दिए.
पहली बार एक संगठन 'गर्व से कहो हम चमार हैं' का नारा बुलंद कर रहा है, वरना दलितों की पार्टी बसपा (जिसने भीम आर्मी से दूरी बना ली है) अब तक इसे अपमानजनक जाति सूचक शब्द मानने, न मानने की बहस में उलझी है.
इसके नेता चंद्रशेखर ने हिंदुओं से अलगाव दिखाने के लिए अपना उपनाम 'रावण' रखा है और उनका कहना है कि आरएसएस राष्ट्रविरोधी है.
उधर मुख्यमंत्री योगी ताल ठोंक रहे हैं कि राणा प्रताप को महान मानना होगा, अकबर को नहीं.
इन सब बातों से एक सूत्र निकलना लाज़िमी है कि जब दलित खुद को हिंदू मानने से इनकार करते हैं तो वे नक्सलियों जैसे दिखने लगते हैं.
भीम आर्मी बसपा की सियासी तिकड़मों से नाराज़ नौजवानों की आवाज़ है.
मीडिया कहां बिज़ी है?
पाखंड की संस्कृति के कारण राजनीतिक पार्टियां यह नहीं कह पा रही हैं कि अंबेडकर दरअसल हिंदुत्व विरोधी थे, उन्होंने हिंदू धर्म में मौजूद छुआछूत के विरोध में बौद्ध धर्म अपना लिया था.
इसी तरह महाराणा प्रताप सिर्फ़ ठाकुर होने के कारण वीर नहीं थे, उनकी जिंदगी भीलों और मुसलमानों के समर्थन और बहादुरी पर निर्भर थी.
मुसलमान हकीम ख़ान सूर राणा प्रताप के सिपहसालार थे और अकबर की लड़ाई असल में राजपूत मान सिंह लड़ रहे थे.
ये बातें मीडिया बता सकता था, लेकिन जिन दिनों सहारनपुर जल रहा था वह पॉप सिंगर जस्टिन बीबर की अदाएं दिखाने में व्यस्त था.
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