नज़रिया: जनाधार खिसकने के डर से सहारनपुर पहुंचीं मायावती

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- Author, कँवल भारती
- पदनाम, दलित चिंतक और लेखक
डॉक्टर आंबेडकर ने दलितों को अल्पसंख्यक समुदाय माना था. उनका कहना था कि 'अलग धर्म का होना ही अल्पसंख्यक होने की एकमात्र कसौटी नहीं है.
अल्पसंख्यक होने का यह सर्वश्रेष्ठ और सही मानदंड नहीं है, बल्कि सामाजिक भेदभाव ही इस बात की वास्तविक कसौटी है कि कौन सा समुदाय अल्पसंख्यक है, और कौन सा नहीं.'
इसके बाद उन्होंने कहा था कि 'भारत के अल्पसंख्यकों का यह दुर्भाग्य है कि यहाँ राष्ट्रवाद ने एक नया सिद्धांत विकसित कर लिया है और यह मान लिया है कि बहुसंख्यकों को अल्पसंख्यकों पर शासन करने का दैवीय अधिकार हासिल है.
इस सिद्धांत के अंतर्गत अल्पसंख्यकों के प्रतिरोध को साम्प्रदायिकता अथवा जातिवाद का नाम दिया जाता है, और बहुसंख्यकों की तानाशाही को राष्ट्रवाद की संज्ञा दी जाती है.'
इस नज़रिये से जो जातिवादी हैं, वे बहुत आसानी से राष्ट्रवादी हो जाते हैं, और जो जातिवाद से आज़ादी चाहते हैं, उन्हें राष्ट्र-विरोधी, यहाँ तक कि देशद्रोही कह दिया जाता है. यह हम रोहित वेमुला और कन्हैया कुमार के मामलों में देख चुके हैं.

यही राष्ट्रवादी सिद्धांत शब्बीरपुर (सहारनपुर) की घटना में काम कर रहा है.
वहाँ 5 मई को ठाकुरों द्वारा दलितों के घरों को जलाने और उन पर जानलेवा हमला करने के लिए उत्तर प्रदेश का योगी शासन दलितों को ही दोषी मान रहा है और उसने भीम आर्मी के जवानों के ही ख़िलाफ़ कार्यवाही की हुई है.
उसके करीब 50 लड़के आज जेल में हैं और आर्मी चीफ चंद्रशेखर पर एक दर्जन एफआईआर दर्ज हैं. यह कितना विद्रूप है कि दलित बस्ती में आगजनी के वक़्त कथित रूप से एसपी देहात ख़ुद मौजूद थे.
उन्होंने हमलावरों को सब कुछ जल जाने के बाद ही वापस जाने को कहा था. इसके बाद भी अगर मुख्यमंत्री ने तुरंत संज्ञान लिया होता, और गांव में जाकर पीड़ितों को देखा होता, और हमलावरों के ख़िलाफ़ कार्रवाई के आदेश दिए होते, तो भीम आर्मी शायद न भी बनी होती.

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यह भी विद्रूप है कि यहाँ बड़े राजनीतिक नेता भी दर्द जानने नहीं पहुंचे, जिस तरह रोहित वेमुला मामले में भाग-भाग कर हैदराबाद गए थे.
मायावती भी दिल्ली में जंतर मंतर पर एकत्र हुए विशाल जनसमूह को देखकर अपना पारंपरिक जनाधार खिसकने के डर से मंगलवार को सहारनपुर पहुंचीं, जो एक रस्म अदायगी से ज़्यादा कुछ नहीं है.
क्या है समस्या का हल
अब सवाल यह है कि समस्या का हल क्या है? आक्रोश अपनी जगह सही है. आक्रोश लोकतंत्र में ज़रूरी भी है, पर क्या लोकतंत्र में इसका हल भी है? यह महत्वपूर्ण सवाल है, और इस पर राजनीतिक दृष्टि से ही विचार करना होगा.
मैं समझता हूँ कि आज किसी भी राजनीतिक और समाजशास्त्री के पास इसका हल नहीं है. इस सवाल पर दो तरह से विचार किया जा सकता है. एक, जातीय दृष्टिकोण से, और दूसरा वर्गीय दृष्टिकोण से, जो समाजवाद का रास्ता है, और जिसके समर्थक डा. आंबेडकर भी थे.
पर न तो संविधान ने आर्थिक समाजवाद का ढांचा निर्धारित किया है, और न वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था इसके पक्ष में है.
पूंजीवाद भी यहाँ सम्पूर्ण रूप से नहीं आया है, और जो है, वह हिन्दू पूंजीवाद है, जिसका सामंतवाद से गठजोड़ है.

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यह स्थिति भारतीय लोकतंत्र को ब्राह्मणवाद से ग्रस्त करती है, और ऐसा लोकतंत्र कभी अल्पसंख्यकों के हित में नहीं हो सकता.
इसलिए वर्गीय राजनीति का रास्ता सही होते हुए भी दलितों को ब्राह्मणवाद के ख़िलाफ़ सीधी लड़ाई का पहला रास्ता ही रास आता है.
सामाजिक लड़ाई का रास्ता
लेकिन क्या यह सामाजिक लड़ाई का रास्ता है? मेरा उत्तर 'हाँ' में है. पर वर्तमान में जो सामाजिक आंदोलन दलितों में चल रहे हैं, वे अधिकतर दलितों को भटकाते हैं.
वे दलितों में हिन्दूकरण की प्रक्रिया को रोकने में कोई भूमिका नहीं निभाते, बल्कि उनको मुद्दों से भटका कर आरक्षण, और आर्य-अनार्य के इतिहास में उलझाकर रखते हैं.

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लेकिन जब चुनाव आते हैं, तो सपा, बसपा, कांग्रेस और भाजपा ही उनके सामने विकल्प होते हैं. तब वे बिखर जाते हैं. उनमें से अधिकांश अपनी हिन्दू चेतना के कारण मुसलमानों के ख़िलाफ़ हो जाते हैं और भाजपा जैसी हिन्दू पार्टियों को वोट देते हैं.
आर्य-अनार्य की धारा वाले दलित बसपा को पसंद करते हैं. पर जब उनके चुने हुए नेता उनके उत्पीड़न में उनके साथ खड़े नहीं होते हैं, तो वे अपने को ठगा सा पाते हैं. इसीलिए आज अधिकांश दलित नेता भाजपा के साथ हैं, और सवर्णों के ख़िलाफ़ नहीं हैं.
इसी तरह मायावती भी भाजपा की विरोधी हैं, पर सवर्णों के ख़िलाफ़ नहीं हैं. आज उत्तर प्रदेश की विधानसभा में दलित जातियों के 80 विधायक हैं, जो आरक्षित सीटों से जीतकर आए हैं.
वे सब के सब सहारनपुर की घटना पर मुंह में दही जमाए बैठे हैं. ऐसा नहीं है कि उनमें दलित प्रेम नहीं है. उनमें प्रेम है, पर यह पूना पैक्ट का दुष्परिणाम है कि वे दलितों के प्रति उत्तरदायी नहीं रह सकते?
मूल प्रश्न
यही वह मूल प्रश्न है, जिसके प्रति किसी का ध्यान नहीं जा रहा है. कांग्रेस ने दलितों को आरक्षित सीटों की रियायतें देकर हिन्दुओं का चमचा बनाने के लिए पूना पैक्ट किया था. और बहुत सुनियोजित तरीके से दलितों के लिए सुरक्षित निर्वाचन के लिए मुस्लिम या सवर्ण बहुल क्षेत्रों को चुना था.

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आज जो दलित नेता भाजपा के साथ चले गए हैं, वे अगर वहाँ नहीं जाते, तो अपने समुदाय के वोटों पर अपनी जमानत भी नहीं बचा पाते. वे आज सदन में हैं, तो हिन्दुओं के वोटों से हैं. फिर उनसे दलितों के प्रति उत्तरदायी होने की अपेक्षा कैसे की जा सकती है?
ब्राह्मणवाद के ख़िलाफ़ चिल्लाने वाला कोई भी दलित नेता, राजनीति में आने पर, अपने समुदाय के बल पर नगरपालिका का चुनाव भी नहीं जीत सकता. यही कारण है कि दलित राजनीति दलितों के प्रति उत्तरदायी नहीं बनी रह सकती.
क्या भीम आर्मी के पास इसका कोई विकल्प है? यदि भीम आर्मी को सचमुच क्रान्ति करनी है, तो उसे हिन्दूराष्ट्र तथा ब्राह्मणवाद के विरुद्ध पृथक निर्वाचन की मांग को अपना हथियार बनाना होगा और डा. आंबेडकर की हारी हुई लड़ाई को फिर से लड़ना होगा.
यही वह लड़ाई है, जो हिन्दू राष्ट्रवाद को चुनौती दे सकती है. जब तक दलितों के वोटों से दलित प्रतिनिधि नहीं चुने जाएंगे, तब तक दलित राजनीति को दलितों के प्रति उत्तरदायी नहीं बनाया जा सकता.
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