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'मोदी जी, मां को तो नहीं समझे, मुल्क की तो सोचें'
जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के लापता छात्र नजीब के केस की जांच अब दिल्ली पुलिस की जगह केंद्रीय जांच ब्यूरो करेगी.
मंगलवार को दिल्ली हाई कोर्ट ने नजीब अहमद के ग़ायब होने के मामले की जांच सीबीआई को करने के लिए कहा.
नजीब अहमद बीते साल 15 अक्टूबर से लापता हैं. कोर्ट ने कहा है कि सीबीआई की ओर से की जाने वाली जांच की निगरानी डीआईजी स्तर के अधिकारी करेंगे.
कोर्ट ने ये आदेश नजीब की मां फ़ातिमा नफ़ीस की याचिका पर सुनाया है. इस आदेश को लेकर फ़ातिमा का क्या कहना है, पढ़िए.
फ़ातिमा के 'मन की बात'
हमने तो कोर्ट से इससे कुछ ज़्यादा की मांग की थी. कोर्ट की देखरेख में अच्छे अधिकारियों की एक टीम बनाई जाए जो किसी के दबाव में न हो.
लेकिन कोई बात नहीं, हमें कोर्ट पर भरोसा है. कोर्ट ने जो आदेश दिए हैं वो बेहतर हैं. सीबीआई अच्छे से काम करे मुझे ज़्यादा कुछ नहीं चाहिए. मुझे मेरा बेटा चाहिए.
अगर क्राइम ब्रांच ने सही से काम किया होता तो ये नौबत नहीं आती. लेकिन मुझे ख़ुदा पर भरोसा है.
सच्चाई की जीत होती है. इंशा अल्लाह मेरा बच्चा जहां कहीं भी, जिसके पास भी है, उसने किस वजह से रखा है, मुझे नहीं मालूम.
सीबीआई से मांग
मेरा दिल कहता है कि मेरा बच्चा जहां भी है सुरक्षित है और सीबीआई अब ढूंढकर लाएगी.
अगर मेरे पास कोई जानकारी होती तो क्या मैं भटक रही होती? मैं सिसक रही होती?
मैं हर लम्हा अपने बच्चे के लिए यही दुआ करती रहती हूं कि मेरा बच्चा जहां भी हो अल्लाह की हिफ़ाज़त में हो.
जेएनयू के साथियों के साथ हम सीबीआई के प्रमुख से गुरुवार को मिलेंगे.
हालांकि अभी वक्त तय नहीं हुआ है. सीबीआई से यही मांग होगी कि जल्दी से जल्दी मेरे बच्चे को लाया जाए.
राजनाथ से गुहार
जो गुनहगार हैं, उनसे सवाल किए जाएं. उन्हें इस तरह कैसे छोड़ा जा सकता है?
लोग मुझसे ये सवाल करते हैं कि आपने पुलिस से शिकायत नहीं की? मैं क्या जवाब दूं उन लोगों को?
मैं कैसे समझाऊं उन लोगों को कि मैं हर मुमकिन कोशिश कर चुकी हूं. जिस तरह से कर सकती थी, किया.
मैं यही उम्मीद करती हूं कि सीबीआई को दो महीने का वक्त मिला है. वो मेरे और मेरे बच्चे के हक में जानकारी लेकर आएंगे. हो सकता है वो मेरे बच्चे को ले ही आएं.
मैं राजनाथ सिंह से मिली थी. उन्होंने कहा था कि हमने एसआईटी बनाई है. वो काम कर रही है. वो एसआईटी फ़ेल हो गई. क्राइम ब्रांच फ़ेल हो गया.
सुषमा से अपील
जो चीज़ें सरकार के अधीन हैं, अगर वो फ़ेल हो रही हैं तो कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ी है.
अब यही साबित करना है कि क्या सरकार चाहती है कि मेरा बच्चा सामने लाया जाए? अगर चाहती है तो ज़रूर लाया जाएगा वो.
मैंने किसी से कोई मदद नहीं ली है. केजरीवाल बेचारे की कोई औकात नहीं जो मेरी मदद कर सके किसी भी तरह से.
मेरी मदद बंदायू के सांसद धर्मेंद यादव ने की जिन्होंने दिल्ली आकर प्रदर्शन किया. डीयू के बच्चे, अलीगढ़ के बच्चे, जेएनयू के बच्चे यही मेरे अपने हैं.
मदद चाहिए थी तो हुकूमत से चाहिए थी जिसने आज तक वक्त नहीं दिया मिलने का. सुषमा स्वराज को मैंने हज़ारों ट्वीट किए. वो विदेशों से लोगों को छुड़ाती हैं.
नंबर एक यूनिवर्सिटी
अपने देश में क्या हो रहा है, वो ये नहीं देख रही हैं. कितनी बार मैंने उनसे मिलने की कोशिश की. कितनी बार ट्वीट कराया अपने बच्चों से. मोदी जी से मिलने की कोशिश की.
मैंने योगी जी से मिलने के लिए नौ अप्रैल को मेल कराया. मेरी बात का जवाब कोई क्यों नहीं देना चाहता. नजीब के मामले में सब चुप क्यों हो जाते हैं?
नजीब एक हिंदुस्तानी है. देश की नंबर एक यूनिवर्सिटी से उसका ताल्लुक है. वो यहां का छात्र है. क्या इनकी ज़िम्मेदारी नहीं है? विदेशों से यहां लोग पढ़ने आते हैं.
क्या ये हमारे देश की बदनामी नहीं है? एक मां को नहीं समझें. कम से कम अपने मुल्क के बारे में ही सोच लें. मेरा परिवार तितर-बितर हो गया है. मैं कभी दिल्ली होती हूं, कभी बदायूं होती हूं.
पिछले तीन महीने से धक्के खा रही हूं. बीमार हूं. शुगर पेशेंट हूं. हाई ब्लड प्रेशर की दिक्कत है. हर सुनवाई पर मुझे दिल्ली आना होता है.
मेरा यहां रहने का कोई ठिकाना नहीं है. कोर्ट ने आदेश दिया था कि इन्हें रहने की जगह दी जाए. दिल्ली सरकार वो भी नहीं कर सकी. रिश्तेदारों के यहां इधर-उधर भटकती हूं.
इतनी मालदार तो हूं नहीं कि एक फ़्लैट ख़रीदकर उसमें रहना शुरू कर दूं. मामला सीबीआई के पास गया तो पता नहीं अब कितने चक्कर लगाने होंगे.
जब सीबीआई तलब करेगी तब यहां आना होगा.
(नज़ीब की मां फातिमा नफीस से बीबीसी संवाददाता वात्सल्य राय की बातचीत पर आधारित)
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