ग्राउंड रिपोर्ट: उमर फ़य्याज़ के घर में आंसू, गाँव में पसरा सन्नाटा
- Author, माजिद जहांगीर
- पदनाम, श्रीनगर से बीबीसी हिंदी के लिए
दक्षिणी कश्मीर के कुलगाम ज़िले का सड़सन गांव. गुरुवार को हल्की धूप में जब मैं उमर फ़य्याज़ के घर पहुंचा तो वहां पीले रंग के शामियाने से महिलाओं के रोने की आवाज़ आ रही थी.
इसी शामियाने में उमर की मां भी रो रही थीं. वह किसी से बात नहीं कर रही थीं. यहां और भी लोग थे, जो ख़ामोशी से एक दूसरे को देख रहे थे.
बीते मंगलवार को 22 साल के उमर फ़य्याज़ की शोपियां ज़िले के हरमीन इलाक़े से अगवा करके हत्या कर दी गई थी. उमर फ़य्याज़ भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट थे.

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उमर नौ दिनों से छुट्टी पर थे और एक शादी में शरीक होने अपने मामा के घर पहुंचे थे. उनकी ड्यूटी जम्मू-कश्मीर के अखनूर में थी.
उमर ने सात साल अनंतनाग के जवाहर नवोदय स्कूल में पढ़ाई की थी. उनके पिता किसान हैं. दो छोटी बहने हैं जो अभी पढ़ाई कर रही हैं.

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मैं उमर के दो मंज़िला मकान में गया तो दाएं तरफ़ के कमरे में क़रीब 20 लोग बैठे थे. उमर के पिता फ़य्याज़ अहमद भी यहां मौजूद थे.
मैंने एक घंटे तक उनसे बात करने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने चुप्पी नहीं तोड़ी. फिर वह धीमी आवाज़ में बोले, 'आप मेरा नाम पूछना चाहते हैं' और फिर देर तक रोते रहे और रूमाल से आंसू पोंछते रहे.

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उमर के ममेरे भाई 27 साल के मुदासिर को यह बात परेशान करती है कि उमर को अगवा कैसे कर लिया गया. वह कहते हैं कि अगर उमर अपने घर पर होते तो वह ऐसा नहीं होने देते.
उन्होंने कहा, 'वे जो लोग भी थे, हम उमर को उनके हाथों में नहीं जाने देते, चाहे हमारी जान क्यों न चली जाती.'
मुदासिर कहते हैं कि उमर बहुत क़ाबिल लड़का था, हमेशा पढ़ाई की बातें करता था और पूरे कश्मीर में उसके जैसा दिमाग़ किसी के पास नहीं था.
उनके मुताबिक, 'उमर कभी स्कूल में पढ़ाई के नोट्स नहीं बनाता था. जो कुछ भी पढ़ाया जाता, उसको दिमाग़ में याद कर लेता था. वह बहुत शर्मीला लड़का था. अपने से बड़ों से बात करने में शर्माता था.'

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मुदासिर याद करते हैं कि पिछले दिनों जब उमर घर पर आया था तो उसने सेब के बाग़ में अपने पिता के काम में मदद की थी.
वह बताते हैं, 'एक बार मैंने उससे कहा कि अब तुम्हें नौकरी भी मिल गई, तनख़्वाह भी मिल रही है. अब तुम शादी कर लो. उसने कहा कि जब मैं 28 साल का हो जाऊंगा, फिर शादी करूंगा. अभी तुम देखना मैं कहां से कहां पहुंच जाऊंगा. तुम लोगों को ख़बर भी नहीं होगी."

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उमर के चचेरे भाई 30 साल के मुज़फ़्फ़र अहमद परे कहते हैं कि उमर को क्रिकेट खेलने का बहुत शौक था.
वह कहते हैं, 'उमर जब भी घर आते तो क्रिकेट खेलने के लिए कहते थे. कभी-कभी वॉलीबॉल भी खेलते थे. '
मुज़फ़्फ़र कहते हैं कि उमर की मौत उनके परिवार के लिए बड़ा नुक़सान है.' 'अब तो उमर के मां-बाप को ही यह सदमा बर्दाश्त करना है' कहकर वह रोने लगते हैं, फिर कहते हैं, 'ऐसा समझो कि उनके मां-बाप का जैसे कलेजा निकल गया है.'

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मुज़फ़्फ़र ने जब यह बुरी ख़बर सुनी थी तो वह बिस्तर में लेटे थे. उन्होंने बताया, 'जब मुझे घर वालों ने उमर की ख़बर दी तो मैं पागलों की तरह बाहर भागने लगा. '
उमर के दोस्तों का एक बड़ा हलक़ा भी यहां मौजूद था. उनके बचपन के दोस्त सहर अहमद एक दिन पहले से ही उमर के घर पर हैं.

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वह कहते हैं, 'उमर की बातों से हमेशा इंसान कुछ न कुछ सीखता था. मेरी आख़िरी मुलाक़ात उनसे बीती 21 अप्रैल को हुई थी. उस दिन भी हमने क्रिकेट की बातें की थीं. वह विराट कोहली का फैन था.'
जिस तरह से उमर का क़त्ल किया गया, सहर को इस बात का काफी रंज है. उन्होंने कहा, 'उमर की इस तरह की मौत के लिए हम तैयार नहीं थे.'

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इसी गांव के रहने वाले ग़ुलाम हसन कहते हैं कि जब उमर ने एनडीए पास किया था तो पूरा गांव ख़ुश था. वह यहां के नौजवानों का रोल मॉडल बन सकता था.
दक्षिणी कश्मीर चरमपंथ का गढ़ माना जाता है. बीते दो महीनों में यहां चरमपंथी हमलों में कई सुरक्षाकर्मी मारे गए हैं.
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