सुकमा हमले के बाद कैंप के जवानों पर कितना असर?
- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, चिंतागुफा (सुकमा), बस्तर से
बारूदी सुरंगों से पटी हुई सुकमा ज़िले के दोरनापाल से लेकर जगरगुंडा की सड़क पर हिचकोले खाती हुए मेरी गाड़ी आगे बढ़ने लगी. दूर-दूर तक इस सड़क पर ना तो कोई दूसरी गाड़ी और ना ही कोई इंसान.
गरम हवा के थपेड़ों के बीच चिंतागुफा तक का सफ़र बहुत ही जोख़िम भरा है. कुछ-कुछ दूरी पर सुरक्षा बलों के कैंपों में रजिस्टर लिए जवान आने-जाने वाली गाड़ियों के नंबर और उसमें सफ़र कर रहे लोगों के बारे में जानकारी दर्ज करते हैं.
यह सड़क कच्ची है. धुल-ग़ुबार के बीच चिंतागुफा का कैंप है, जहाँ के जवानों को 24 अप्रैल को माओवादी छापामारों के साथ हुई मुठभेड़ में काफ़ी नुकसान का सामना करना पड़ा.
इस कैंप से पांच किलोमीटर की दूरी पर वो जगह है जहाँ सड़क निर्माण में सुरक्षा देने पहुँचे सीआरपीएफ के जवानों पर माओवादियों ने अचानक हमला कर दिया था. घटना के कई दिन बीत चुके हैं मगर आज भी इलाके में बिखरी हुई चीजें और आस-पास के पत्थरों और पेड़ों पर गोलियों के निशान उस दिन की दास्ताँ ख़ुद बयान करते हैं.
पानी की बोतलें, खून के धब्बे, वर्दी के टुकड़े सब गवाह हैं उस खौफ़नाक मंज़र के, जो कई घंटों तक चलता रहा.

कैंप में तैनात सुरक्षा बल के जवानों ने मुझे पहले ही आगाह कर दिया था कि घटनास्थल पर जाना जोख़िम भरा इसलिए भी हो सकता है क्योंकि अभी भी ऐसी संभावनाएं हैं कि मुठभेड़ के दौरान इस्तेमाल किए गए विस्फोटक वहाँ मौजूद हों.
गुरुवार को ही सुरक्षा बलों ने वहां से एक माओवादी छापामार का शव भी बरामद किया है. हालांकि अभी तक शव की शिनाख्त नहीं हो पाई है. घटना के बाद से दोरनापाल से लेकर जगरगुंडा तक के रास्ते में मौजूद सुरक्षा बलों के कैंपों में मायूसी और ग़ुस्सा साफ़ दिखाई देता है.
तलाशी के दौरान सुरक्षा बल के अधिकारी बात करने से भी परहेज़ करते नज़र आए. चिंतागुफा के कैंप में भी यही माहौल है. तैनात जवान फोटो नहीं खींचने देते. वो अपने कैंप के पास से हट जाने का आदेश भी देते हैं.
फिर भी मोर्चे पर तैनात संतरी और बाहर पहरा दे रहे जवानों और अधिकारियों से बात करने का मौक़ा ज़रूर मिला. मीडिया से नाराज़गी साफ़ झलक रही थी.
वो कह रहे थे कि मीडिया वाले जवानों की रणनीति पर सवाल खड़े कर रहे हैं. कुछ समाचारों में कहा गया कि मुठभेड़ के बाद कुछ जवान भाग निकले. इन आरोपों का कैंप में मौजूद जवानों और अधिकारियों ने ग़ुस्से के साथ खंडन किया.
बिहार के रहने वाले एक जवान ने बातचीत के दौरान कहा, "सभी जवान बहादुरी के साथ लड़े. सभी ने अपने तौर पर माओवादियों के हमले को नाकाम करने की पूरी कोशिश भी की. लेकिन ग़लत प्रचार किया जा रहा है."
कैंप के बाहर मौजूद जवानों ने दबी जुबां से सही, सुकमा के इस बीहड़ में तैनाती के अपने अनुभव भी साझा करने शुरू कर दिए.

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कुछ बताने लगे कि पूरा इलाक़ा कितना ख़तरनाक है. कुछ कह रहे थे कि वो पूरी-पूरी रात कैंप में जाग कर गुज़ारते हैं क्योंकि अक्सर माओवादी छापामार रात में ही कैंप पर गोलियां चलाते हैं.
एक जवान ने कहा, "यहाँ पर कुछ भी नहीं है. एक सुनसान सड़क जो यहाँ तक आती है जिसपर कोई नहीं चलता. और चारों तरफ घने जंगल जहां माओवादी छापामार जमे हुए हैं. हम कैंप तक सीमित रहते हैं. हर एक पल यहाँ बहुत भारी गुज़रता है."
बातचीत के दौरान जवान सरकार की नीतियों से भी खुश नज़र नहीं आते दिखे. ये बता रहे थे कि कई बार ऐसा हुआ है कि मुठभेड़ में माओवादी छापामारों को मुंहतोड़ जवाब देने वाले जवानों को भी पुरस्कृत नहीं किया गया. यह भी एक कारण है जवानों के मनोबल को कमज़ोर करने वाला.
कुछ जवान चाहते हैं कि सरकार नक्सली समस्या का राजनीतिक तरीके से हल ढूंढे, ताकि इस पूरी समस्या को पुलिस के जवानों पर ही ना मढ़ दिया जाए. वो मानते हैं कि वर्दीधारियों से कहीं ज़्यादा ज़िम्मेदारी प्रशासन की है कि वो सुकमा के सुदूर इलाकों में सक्रिय आदिवासी नौजवानों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए योजनाएं बनाए.

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हालांकि बस्तर के पुलिस अधीक्षक आरिफ़ शेख ने बीबीसी से कहा कि छापामार युद्ध में कभी-कभी नुकसान भी झेलना पड़ता है. मगर उनका दावा है कि पिछले तीन सालों में सुरक्षा बलों ने माओवादियों के प्रभाव को कम करने में कामयाबी ज़रूर हासिल की थी.
वो कहते हैं, "छापामार युद्ध में कभी हमें फ़ायदा भी होता है और हुआ भी है. हमने कई माओवादी छापामारों को संघर्ष के दौरान मार गिराने में कामयाबी भी हासिल की है. ऐसा नहीं है कि मनोबल गिरा हुआ है. हम और ज़्यादा 'ऐग्रेसिव' तरीके से उनसे लोहा ले रहे हैं."
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