नज़रिया: 'लेफ्ट के प्रति युवाओं का आकर्षण बरक़रार'

बीजेपी

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    • Author, वृंदा करात
    • पदनाम, माकपा पोलित ब्यूरो सदस्य

पहले कई राज्यों के स्थानीय और नगर निगम के चुनाव, फिर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में पूर्ण बहुमत की जीत और अब दिल्ली नगर निगम चुनाव में बीजेपी को मिली भारी जीत ने भारत के सामने आज़ादी के बाद के शुरुआती दशकों वाले एक पार्टी शासन जैसी हालत पैदा कर दी है.

फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि आज़ादी के बाद के शुरुआती दशकों में कांग्रेस ने अपने सभी राजनीतिक विरोधियों को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया था, लेकिन आज बीजेपी सत्ता में ज़रुर है लेकिन वो शासन करने वाली अकेली पार्टी नहीं है.

उसके साथ आरएसएस भी है, जिसके प्रचारक प्रधानमंत्री हैं जिन राज्यों में बीजेपी जीती है वहां मुख्यमंत्री भी आरएसएस के मनोनीत लोग हैं. ये आरएसएस और बीजेपी की जोड़ी है, जो मिलकर इस देश का भाग्य तय कर रहे है.

ये केवल चुनावी हार-जीत का मामला नहीं है जहां कोई हारता है, कोई जीतता है.

मसला ये है कि ये जोड़ी हिंदू राष्ट्र स्थापित करने के अपने लक्ष्य के लिए क़ानूनों, नियमों और संविधान में मिले अधिकारों को किस हद तक बदलते हैं और भारत की जनता ये सब उन्हें कब तक करने देगी.

ईवीएम

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चुनाव सुधार ज़रूरी हो गया है

कुछ राजनीतिक पार्टियों ने ईवीएम में गड़बड़ी को भाजपा विरोधियों की हार की वजह बताया है. हालांकि ये सच है कि ईवीएम से छेड़छाड़ मुमकिन है, लेकिन ये तर्क मुश्किल से ही उन लोगों के लिए कोई फ़ायदेमंद साबित होगा जो ऐसा मानते हैं.

सीपीएम ने वीवीपैट मशीनें लाने की मांग की है, जिससे छेड़छाड़ मुश्किल होगी. हमने चुनाव सुधार पर तुरंत ध्यान देने की ज़रूरत पर भी ज़ोर दिया है.

वर्तमान चुनावी व्यवस्था (फ़र्स्ट पास्ट द पोस्ट सिस्टम) का मतलब है कि बीजेपी उत्तर प्रदेश में 40 प्रतिशत वोट के साथ तीन चौथाई सीटें जीत लेती है.

अगर अनुपातिक प्रतिनिधित्व व्यवस्था को आंशिक रूप से भी लागू किया जाता तो वोट प्रतिशत के हिसाब से पार्टियों को सीटें मिलेंगी.

ये वो लड़ाई है जिसे छेड़ने की ज़रूरत है. दूसरा अहम मुद्दा है राजनीतिक दलों को चुनाव प्रचार में ख़ूब सारा पैसा ख़र्च किए जाने की इजाज़त देना.

इससे बीजेपी जैसी सत्तारूढ़ पार्टी चुनाव प्रचार में हज़ारों करोड़ रुपये ख़र्च कर सकती है, जोकि उम्मीदवार के ख़र्च में नहीं जोड़ा जाएगा और चुनाव आयोग ने इसके लिए कोई सीमा निर्धारित नहीं की है.

मोदी

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कांग्रेस ने अपने अच्छे दिनों में इस गड़बड़ क़ानून का ख़ूब फ़ायदा उठाया था और अब बीजेपी कॉर्पोरेट घरानों की मदद से वही काम करते हुए चुनाव प्रचार में ख़र्च करने के पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ रही है.

चुनाव सुधार जैसे मुद्दे हालांकि महत्वपूर्ण हैं, लेकिन ये राजनीतिक विश्लेषण और विपक्षी दलों की भविष्य की रणनीति तय करने का विकल्प नहीं हो सकते.

सलाह देने वाले लोगों की कमी नहीं है. राजनीतिक विश्लेषक, विपक्षी पार्टियों और उनके नेताओं की दिन रात आलोचना करते रहते हैं, विपक्ष की राजनीति और उनके नेताओं को अप्रसांगिक क़रार देते हैं और साथ में ये भी सलाह देते रहते हैं कि विपक्षी नेताओं को कैसे ख़ुद को बदली हुई छवि के साथ पेश करना चाहिए.

सत्ता के क़रीब रहने के आदी कुछ राजनीतिक विश्लेषक सत्ता बदलते ही अपना रंग भी बदल लेते हैं और अपने अवसरवार को छिपाने के लिए नई-नई थ्योरी लोगों के सामने पेश करते हैं.

ऐसा करने के लिए सबसे पहले तो वो हिंदुत्व एजेंडा की 'ख़तरनाक प्रवृति' की लीपापोती करते हैं और अब तो उसे 'हिंदुत्व विकास' बताने लगे हैं.

वामपंथ

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वामपंथ की ज़रूरत से ज़्यादा आलोचना

ऐसे दरबारी जो यूपीए सरकार में भी सत्ता के गलियारों का सुख उठाते रहे हैं, उनकी संख्या बहुत ज़्यादा नहीं है और कोई भी गंभीर राजनीतिक दल अपने आत्ममंथन की प्रक्रिया में ऐसे लोगों की सलाह को कोई ख़ास अहमियत नहीं देगा.

वामदल तो हमेशा से ऐसे लोगों के निशाने पर रहे हैं और इस तरह के लोग वामदलों के ख़ात्मे की घोषणा कई बार कर चुके हैं.

लेकिन अगर मार्क ट्वेन के शब्दों में कहें तो 'वामपंथ की मौत' की ख़बरों को कुछ ज़्यादा ही बढ़ाचढ़ा कर पेश किया जाता है.

देश के लगभग सभी राज्यों में कराए गए मंथन के बाद सीपीएम ने इस मामले में कुछ समझ बनाई है और कुछ फ़ैसले भी किए हैं कि आगे का बेहतर रास्ता क्या होगा.

कम्युनिस्ट

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ये सारी प्रक्रिया सिर्फ़ एक चुनाव से दूसरे चुनाव के लिए बनाई जाने वाली रणनीति तक सीमित नहीं है.

सीपीएम के लिए अंतिम लक्ष्य क्रांतिकारी सामाजिक बदलाव है और हम चुनावों को एक ऐसे प्लेटफ़ार्म के रूप में देखते हैं जिसके मार्फ़त हम अपनी वैकल्पिक राजनीति और नीतियों के संदेश को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचा सकें.

देश की एक बड़ी संख्या के सामने जो सामाजिक और आर्थिक मुद्दे हैं, हमने अपने मंथन में उन मुद्दों पर किए गए जनकार्यों का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया है.

मोदी

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साम्प्रदायिक एजेंडे को हराना ज़रूरी

सबसे प्रमुख कार्य आरएसएस-बीजेपी के साम्प्रदायिक एजेंडा को हराना है. लेकिन इसके लिए ज़रुरी है कि लोकतंत्र और सेक्युलरिज़्म को बचाने की लड़ाई रोज़गार के बुनियादी मुद्दों के लिए किए जा रहे संघर्ष के साथ जोड़ा जाए.

विकास के बड़े बड़े दावों के बावजूद, बीजेपी शासन में उसी नव उदारवादी आर्थिक नीतियों को और आक्रामक तरीक़े से लागू किया जा रहा है, जिनकी वजह से कांग्रेस के ख़िलाफ़ ग़ुस्सा पनपा था और जिसने बीजेपी को सत्ता में पहुंचने का रास्ता दिया था.

फ़र्क़ है तो सिर्फ़ केवल पैकेजिंग का.

मोदी सरकार के पिछले तीन साल के कार्यकाल में ग़ैरबराबरी तेज़ी से बढ़ी है.

वैश्विक ग़ैरबराबरी का विश्लेषण करने वाली एक संस्था क्रेडिट स्विस की ताज़ा रिपोर्ट कहती है कि भारत दुनिया में सबसे अधिक ग़ैरबराबरी वाले देशों में से एक है.

देश के एक प्रतिशत सबसे अमीर लोग देश की 58 प्रतिशत दौलत पर क़ब्ज़ा किए बैठे हैं.

हमारा अनुमान है कि हम अपने मुख्य समर्थकों मज़दूरों और किसानों, बेरोज़गार नौजवानों, महिलाओं, दलितों और आदिवासियों की अनदेखी कर रहे हैं जो सरकार की नीतियों से सबसे ज़्यादा प्रभावित हैं.

छात्र प्रदर्शन

'कोई शॉर्ट कट नहीं'

चीनी कम्युनिस्ट नेता माओ ने जनता और कम्युनिस्ट कैडर के संबंध को पानी और मछली के संबंध जैसा बताया था. मछली पानी बिना ज़िंदा नहीं रह सकती.

लेकिन कॉर्पोरेट के पक्ष में नीतियां लागू करने के मोदी सरकार के आक्रामक रुख़ के आगे हमारा संघर्ष कम पड़ जाता है और हमारी सारी कोशिश रस्मी कार्रवाई तक सीमित हो जाती है, जिसे तोड़ने की सख़्त ज़रूरत है.

इसलिए वर्तमान में सीपीएम का मुख्य काम है जनता के साथ जुड़ाव को मज़बूत करना, ख़ासकर उन राज्यों में जहां हमारा मज़बूत जनाधार है. इन इलाक़ों में हमें आर्थिक और सामाजिक मुद्दों को हाथ में लेने और स्थानीय संघर्षों के ज़रिए पहुंच बढ़ाने की ज़रूरत है.

इसके लिए पार्टी का स्वतंत्र काम ही एक रास्ता है. इसके अलावा कोई शॉर्टकट नहीं है.

दूसरा उतना ही अहम काम है युवाओं और महिलाओं के बीच अपने काम पर अधिक ध्यान केंद्रित करना.

रामजस कॉलेज

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वामपंथ के प्रति युवाओं का आकर्षण बढ़ा

पूरे भारत में कॉलेज और कैंपसों में वामपंथ की अच्छी ख़ासी उपस्थिति है. एसएफ़आई जैसे वामपंथी छात्र संघटन, आरएसएस और इसके छात्र संगठन एबीवीपी के निशाने पर हैं ताकि बहस-मुबाहिसे और असहमति के रिवाज को ख़त्म किया जा सके.

गुरु शिष्य की मॉडल में, जहां गुरू से सवाल करना या अवमानना सज़ा को दावत देता है, विश्वविद्यालयों के प्रशासन में शीर्ष पदों पर वाम को निशाना बनाए जाने की छूट के साथ ऐसे लोग बैठाए जा रहे हैं जिनकी बस इतनी योग्यता है कि वो संघी विचारधारा के प्रति वफ़ादार हैं.

असल में आरएसएस की वैचारिक आक्रामकता के ख़िलाफ़ सेक्युलर मूल्यों की लड़ाई को अकादमिक संस्थानों में उन लोगों की नाफ़रमानी माना जाने लगा है जो ख़ुद को वामपंथी मानते हैं और इसके लिए उन्हें मुश्किल झेलना पड़ रहा है.

युवाओं के बीच वामपंथ का कोई जनाधार नहीं है या ये कि बीजेपी ने युवाओं को पूरी तरह अपनी ओर आकर्षित कर लिया है, ये मानना पूरी तरह ग़लत है.

हालांकि बेशक ये बात सही है कि नए वोटरों में बहुतों ने बीजेपी को वोट दिया है, लेकिन ये भी उतना ही सच है कि आरएसएस-बीजेपी के ख़िलाफ़ संयुक्त लड़ाई में युवाओं की संख्या बढ़ी है.

गुरमेहर

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दलित-आदिवासी समुदायों में काम

हिंदुत्व प्रोजेक्ट के ख़िलाफ़ अपने कड़े रवैये के साथ खड़ा लेफ़्ट युवाओं के आकर्षण का एक केंद्र है, जोकि आने वाले समय में और बढ़ेगा.

तीसरे, दलित और आदिवासियों के बीच ज़्यादा काम करने की ज़रूरत है. वामपंथ के शुभचिंतकों ने वर्गीय एकता के नाम पर दलित और आदिवासी समुदायों के विशेष मुद्दों को नज़रअंदाज़ करने और यांत्रिक रवैया अपनाने के लिए लेफ़्ट की आलोचना की है.

दलित और आदिवासी समूह बुनियादी रूप से शोषित वर्ग हैं और इसलिए वर्गीय एकता की आधार पर उनको जोड़ना हमारे काम का मुख्य हिस्सा है.

हालांकि हमारा मंथन दिखाता है कि छुआछूत के ख़िलाफ़ कम्युनिस्टों की लड़ाई अभी भी कुछ राज्यों तक सीमित है और अधिकांश हिंदी भाषी इलाक़ों में इस तरह की लड़ाईयां नहीं लड़ी गईं हैं, इस ग़लती को जल्द सुधारा जाना चाहिए.

ये सारी कोशिशें कोई अलग नहीं हैं, बल्कि आरएसएस की 'फ़ासीवादी' गतिविधियों के ख़िलाफ़ एक व्यापक गोलबंदी का हिस्सा हैं.

गोरक्षक

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मुद्दा आधारित एकता

उदाहरण के तौर पर कथित गोरक्षक अपराधी गैंग का मुसलमानों पर बर्बर हमला करना जो असल में लाखों पशुपालकों, चमड़े का कारोबार करने वालों और किसानों की आजीविका पर हमला है.

इसी तरह प्रदर्शन करने वाले छात्रों को धमकाना और उन्हें पीटना, बुद्धिजीवियों को धमकाना, ईमानदार कार्यकर्ताओं और ग़ैर सरकारी संगठनों को प्रताड़ित करना, ड्रेस कोड लागू करना, मोरल पुलिसिंग करना, सम्मान के नाम पर अपराध के लिए ज़िम्मेदार खाप पंचायतों का समर्थन करना आदि, ऐसी ही गतिविधियां हैं.

लेकिन ये सच है कि इस लड़ाई में वामपंथ को सहयोगियों की ज़रूरत है.

हमारा मानना है कि सभी वामपंथी दलों, लोकतांत्रिक ताक़तों, सामाजिक आंदोलनों और ऐसे बुद्धिजीवियों के साथ मुद्दा आधारित एकता बनाने की संभावना है, जो साम्प्रदायिकता के ख़िलाफ़ लड़ाई के हिस्से के रूप में आर्थिक और सामाजिक मुद्दों को संबोधित करने के प्रति एकजैसा रुख़ रखते हैं.

वामपंथ के प्रति दुश्मनाना रुख़ न रखने वाले कुछ उदारवादी बुद्धिजीवियों की राय है कि वामपंथ के स्वतंत्र जनाधार विकसित करने की कोशिश करना बेकार है.

संघ

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माकपा को सलाह

ऐसी विचारधारा रखने वाले लोग वाममोर्चे की सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते सीपीएम को सलाह देते हैं कि वो 'रुढ़िवादिता' त्याग दे और 'समान विचार वाली ताक़तों' के साथ एक बड़ा गठबंधन बनाए और उनके हिसाब से इन ताक़तों में कांग्रेस से लेकर कई क्षेत्रीय पार्टियां तक आती हैं.

आरएसएस-बीजेपी शासन के जारी रहने की स्थिति में भारत को अंधेरे भविष्य से बचाने की हड़बड़ी में, उन्हें लगता है कि पूरे विपक्ष की लामबंदी ही बीजेपी को हराने का एकमात्र रास्ता है .

लेकिन इस तरह का नज़रिया वास्तविक सामाजिक, जातीय और वर्गीय मतभेदों को नज़रअंदाज़ करता है जोकि इन अलग-अलग पार्टियों के जनाधार की बुनियाद है और जो इस तरह की एकता को मज़बूत करने की बजाय उसे कमज़ोर करेगा, और इससे केवल साम्प्रदायिक ताक़तों को ही मदद मिलेगी.

अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ सबसे ज़हरीले अभियान पर आधारित एक व्यापक हिंदू एकता बनाने की आरएसएस की कोशिशों को हमने देखा है. हमने विभिन्न सेक्युलर दलों को नरम हिंदुत्व नीति अपनाने के उदाहरण भी देखे हैं.

मायावती

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राजनीतिक फ़्रंट नहीं बन सकता

हमने हालिया चुनावों में कुछ पार्टियों को सीधे मुसलमानों से अपील करते हुए भी देखा है. लेकिन इन पार्टियों की आर्थिक नीतियों और वामपंथियों की आर्थिक नीतियों में बहुत कम ही समानताएं हैं.

इसलिए इन दलों के साथ बहुत सीमित मामलों में ही एकजुटता हो सकती है और वो किसी भी रूप में बीजेपी विरोधी एक व्यापक नीतिक फ्रंट नहीं बन सकता.

हालांकि वाममोर्चे, ख़ासकर सीपीएम का फिर से उभरना, आरएसएस-बीजेपी के ख़िलाफ़ लड़ाई के लिए अहम है, लेकिन आगे का रास्ता 'रीइन्वेंशन' (ख़ुद में नयापन) लाने वाला नहीं हो सकता, जोकि वामपंथ की पहचान को ही समाप्त कर दे.

वामपंथ केवल तभी सहयोगियों को अपने साथ ला सकता है और अपना विस्तार कर सकता है जब वो अपने सिद्धांतों और नीतियों के प्रति सच्चाई के साथ खड़ा हो और लोगों के लिए बहुत मेहनत से काम करे....यानी जन संघर्ष और जन सेवा का मिश्रण.

(ये लेखक के अपने विचार हैं.)

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