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नज़रिया: 'कश्मीरियों का लोकतंत्र से भरोसा उठ रहा है'
- Author, सीमा मुस्तफ़ा
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
भारत प्रशासित कश्मीर की स्थिति लगातार बिगड़ती दिख रही है, हालांकि कश्मीर से जुड़े सभी पक्षों को इसका अंदाजा है, बावजूद इसके गंभीर हालात पर काबू पाने के उपाय कम ही दिख रहे हैं.
राज्य में हिंसा, तनाव और ऐसा माहौल दिख रहा है, जिसके नतीजे कुछ भी हो सकते हैं. ऐसा इसलिए है क्योंकि कश्मीर के युवाओं का गुस्सा उबाल पर दिख रहा है, ऐसा 1990 के चरमपंथी दौर में भी देखने को नहीं मिला था. उस वक्त घाटी में पाकिस्तान का दख़ल बहुत ज़्यादा था.
सीमापार से आने वाले चरमपंथी पहले तो स्थानीय लोगों की मदद से घुसपैठ करते और बाद में उनकी मदद के बिना आतंकी वारदात को अंजाम देते थे. लेकिन मौजूदा समय में पाकिस्तानी फैक्टर की जगह कश्मीरी युवाओं ने ले ली है, जो ख़ुद ही हिंसक वारदातों में लिप्त हैं, उन्हें सीमा पार से मिलने वाले संकेतों की ज़रूरत नहीं है.
आज से दस साल पहले, कश्मीर के लोग सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मारे गए चरमपंथियों की मौत पर ख़ुद को दूर ही रखते थे. ऐसे चरमपंथियों को बिना किसी शोरशराबे के दफ़ना दिया जाता था. लेकिन आज से दो साल पहले से इसमें बदलाव दिखने लगा. चरमपंथियों के अंतिम संस्कार के वक़्त पहले सैकड़ों की तादाद में लोग आते थे, अब हज़ारों की संख्या में लोग पहुंच रहे हैं.
पहले तो, ये भीड़ शांतिपूर्ण प्रदर्शन करती थी. लेकिन बीते साल ऐसे अंतिम संस्कारों में शामिल लोगों ने हिंसक होना शुरू किया, पुलिस और अर्धसैनिक बलों पर पत्थर फेंकने की शुरुआत हुई.
पिछले कुछ महीनों में, कश्मीरी लोगों की भीड़ अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हो रही है, बल्कि वो मुठभेड़ की जगहों पर पहुंचने लगी है. भीड़ उस जगह पर पहुंचने की कोशिश करती है जहां पुलिस और चरमपंथियों की मुठभेड़ चल रही होती है और ये भीड़ चरमपंथियों को बचाने की कोशिश कर रही है.
ये एक नए तरह का बदलाव है. कई बार इन लोगों के पास बंदूकें नहीं होती हैं, कई बार पत्थर भी नहीं होते हैं, लेकिन उनकी संख्या इतनी ज़्यादा होती है कि सुरक्षा बल के जवानों को इन्हें हटाने के लिए ताक़त का इस्तेमाल करना पड़ जाता है, इससे मरने वाले लोगों की तादाद भी बढ़ती है.
श्रीनगर में हुए उपचुनाव को भी इस प्रकरण में देखा जा सकता है. पहली बार ऐसा हुआ है कि मतदान सात प्रतिशत से बढ़ नहीं पाया. ख़राब से ख़राब दिनों में भी कश्मीर में औसत मतदान 20 फ़ीसदी से ज़्यादा होता था. जिन लोगों का लोकतंत्र में भरोसा है उनके लिए सात फ़ीसदी से कम मतदान ख़तरे की घंटी जैसी है.
क्योंकि इससे काफी हद तक ये ज़ाहिर होता है कि कश्मीरी लोगों का लोकतंत्र में भरोसा कम हो रहा है.
पहले कश्मीरी लोगों का चुनाव पर भरोसा था क्योंकि उनका मानना था कि बड़े मुद्दे को जब तक सुलझाया नहीं जाता तब तब वे सरकार को चुनते रहेंगे क्योंकि सरकारें लोगों के रोजमर्रा की ज़रूरतों को पूरा करने का काम करती है. अब ऐसा लग रहा है कि कश्मीरी लोगों को इसकी भी परवाह नहीं रही.
ऐसे में कश्मीरी जनता पर ध्यान देने की ज़रूरत है. सरकार को ये भी सुनिश्चित करना होगा कि सुरक्षा बल संयम से काम लें और अंतिम विकल्प के तौर पर ही गोलियों का इस्तेमाल हो. ऐसी तस्वीरें भी सामने आई हैं जब पुलिस बल के जवान युवाओं के हिंसक विरोध की स्थिति में संयमित और शांत दिखे हैं. अगर ये संयम टूट गया तो दोनों पक्षों के लिए स्थिति और भी दुखद होगी.
ऐसी तनावपूर्ण स्थिति में राजनीतिक नेतृत्व को सामने आना चाहिए. सेना और आम जनता की बीच तनाव जारी नहीं रहना चाहिए. सुरक्षा बल के जवान भी लगातार ड्यूटी निभा रहे हैं, क्योंकि हर मौत पर घाटी के विभिन्न हिस्सों में विरोध प्रदर्शनों का होना जारी है.
अगर ऐसी स्थिति जारी रही तो हालात और भी ख़राब हो सकते हैं. ऐसी रिपोर्ट्स आने लगी हैं कि कश्मीरी युवा हथियार चाहते हैं. हालांकि अभी तक ऐसा संभव नहीं हुआ है, हालाँकि कई नेता और अलगावादी मानते हैं कि ये बहुत दूर भी नहीं है.
केंद्र सरकार को इसकी जानकारी है, यही वजह है कि कश्मीरी लोगों के विरोध पर संयम से काम लिया जा रहा है, लेकिन उसे बातचीत का रास्ता खोलना होगा. विरोध प्रदर्शन बंद और कर्फ़्यू की स्थिति से बचने के लिए सभी वर्ग के लोगों से बातचीत करनी होगी.
नई दिल्ली और कश्मीर के बीच ऐसी सबसे अच्छी पहल पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में हुई थी, उन्होंने तय समय में समस्याओं को सुलझाने के लिए टास्क फ़ोर्स का गठन किया था. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए सरकार ने इन प्रयासों को बंद कर दिया था, जिससे स्थिति बिगड़नी शुरू हुई और अब ये ख़तरनाक मोड़ पर पहुंच गई है.
(ये लेखिका के निजी विचार हैं.)
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