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नज़रिया: 'कश्मीर की इस अंधेरी बंद सुरंग को कौन खोलेगा?'
- Author, उर्मिलेश
- पदनाम, राजनीतिक विश्लेषक
जम्मू-कश्मीर में चेनानी-नाशरी सुरंग के लोकार्पण से सिर्फ़ सरहदी सूबे के ही नहीं, उन सभी लोगों का फ़ायदा हुआ जो जम्मू संभाग से सड़क मार्ग के ज़रिए कश्मीर में दाखिल होते हैं.
रास्ता आसान हो गया और इधर से जाने में खर्च भी कम होगा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मौके पर जाकर इस सुरंग का लोकार्पण किया. यूपीए के ज़माने की इस योजना पर इधर तेजी से काम हुआ.
पर यूपीए के ज़माने में जम्मू-कश्मीर में 'एक और सुरंग' के खोलने की अच्छी शुरुआत हुई थी. पर बीते पौने तीन साल से वह 'सुरंग' बंद-सी पड़ी है. प्रधानमंत्री जी, इस 'अंधेरी बंद सुरंग' को कौन खोलेगा?
ट्रैक-2 डिप्लोमेसी
यह कश्मीर की सियासी सुरंग है जिसके दोनों छोर के दरवाजे बंद से पडे हैं. एनडीए-1 काल में प्रधानमंत्री वाजपेयी ने बरसों की बंद पडीं सुरंग को दोनों स्तरों पर खोलने की कोशिश की.
तमाम मुश्किलों के बावजूद पाकिस्तान से संवाद किया गया. आधिकारिक पहल और ट्रैक-2 डिप्लोमेसी के ज़रिए कश्मीर के अलगाववादी संगठनों और उनके नेताओं से भी बातचीत का दरवाजा खोला गया.
यूपीए-1 और 2 के मनमोहन दौर में द्विपक्षीय संबंधों में कुछ उतार-चढ़ाव ज़रूर आए, लेकिन भारत-पाकिस्तान के बीच पहले से कहीं बेहतर समझदारी नजर आई. इसका असर कश्मीर पर भी पड़ा.
हालात लगातार सुधरते रहे. एक समय तो ऐसा भी लगा मानो दोनों पक्षों के बीच स्थाई समझौता हो जाएगा. लेकिन दोनों तरफ़ की कुछ मुश्किलों और समस्याओं के चलते समझौते की संभावनाएं सिमट-सी गईं.
वाजपेयी-मनमोहन
पर कश्मीर काफ़ी हद तक पटरी पर आ गया. साल 2014 के मध्य में भारी बहुमत से सत्ता में आई नरेंद्र मोदी की एनडीए-2 सरकार ने शुरू में वाजपेयी-मनमोहन सरकारों के कश्मीर विमर्श को आगे बढ़ाने के संकेत दिए थे.
अपने शपथ-ग्रहण समारोह में पड़ोसी मुल्कों के शीर्ष नेताओं के साथ पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ को भी न्योता दिया जिसे स्वीकार कर वे दिल्ली आए. एक बार हमारे प्रधानमंत्री जी भी पाकिस्तान हो आए. वह भी किसी पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के बगैर.
लेकिन उसके बाद क्या? अंधेरा और सिर्फ अंधेरा! इतना अंधेरा कि कश्मीर के हालात जो तेज़ी से सुधर रहे थे, वे खराब होने लगे.
खुफ़िया एजेंसी 'रॉ' के पूर्व प्रमुख और प्रधानमंत्री वाजपेयी के कश्मीर मामलों के विशेषज्ञ रहे एएस दुलत तक को कहना पड़ा, "प्रधानमंत्री मोदी के शासनकाल में कश्मीर की स्थिति जैसी बनी है, उतनी ख़राब कभी नहीं थी."
चरमपंथी हिंसा
नवम्बर, 2016 के आखिर में आयोजित कश्मीर विषयक एक सेमिनार में उन्होंने अगस्त से नवंबर के कालखंड को भयानक दौर कहा.
हालांकि प्रधानमंत्री, तत्कालीन रक्षामंत्री और अन्य सत्ताधारी नेताओं ने इसी दौर में की गई 'सर्जिकल स्ट्राइक' को आतंकवाद के समूल नाश की दिशा में उठाया बड़ा और अभूतपूर्व फ़ैसला बताया.
लेकिन 29 सितंबर को हुई इस 'स्ट्राइक' के बाद भी सरहद पर चरमपंथी हमले, घुसपैठ और कश्मीर में हिंसा-प्रतिहिंसा का दौर जारी रहा. अक्तूबर और नवम्बर 2016 में सुरक्षा बलों के क्रमशः 5 और 11 जवान मारे गए.
वर्ष 2016 में सुरक्षाबलों के कुल 88 जवान मारे गए जबकि मनमोहन सिंह के कार्यकाल के अंतिम बरसों के आंकड़े चरमपंथी हिंसा और सरहदी तनाव में भारी गिरावट का ठोस संकेत देते हैं. साल 2012 में सुरक्षाबलों के 17 जवानों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी.
अपने लगभग पौने तीन सालों के कार्यकाल में प्रधानमंत्री मोदी और उनसे भी ज़्यादा उनके वरिष्ठ मंत्रियों ने कश्मीर के बारे में कई मौकों पर अलग-अलग सुरों में बात की है.
महबूबा सरकार
केंद्र और राज्य में सत्तारूढ़ होने के बावजूद भाजपा नेताओं ने नीतियों के बजाय नारों में ज्यादा बातें की हैं. सद्भावना जताने और नये-पुराने घावों पर मरहम लगाने के बजाय कश्मीरी युवाओं पर पैलेट गनों का इस्तेमाल किया गया.
कैसी विडम्बना है- जिन मुफ्ती मोहम्मद सईद ने 2002 में कश्मीरियों के नए पुराने घावों पर 'मरहम लगाने' और 'मानवीय स्पर्श' जैसे जुमले गढे, उन्हीं के दूसरे कार्यकाल और उनकी पुत्री महबूबा मुफ्ती के कार्यकाल में पैलेट गनों और अन्य तरह के ऑप्रेशन में अनेक युवक मारे गए. बुरी तरह घायल, यहां तक कि विकलांग होने वालों की संख्या सैकड़ों में रही.
घाटी ही नहीं, उसके बाहर भी इस तरह के अतिरेक और हमलावर रुख़ की आलोचना हुई. सरकार बचाव की मुद्रा में भी आई. गृह मंत्री ने पैलेट गनों के विकल्प खोजने की भी बात कही.
लेकिन कश्मीर मसले पर संवाद के बजाय टकराव का दौर जारी रहा और उसमें आज भी कोई बदलाव नजर नहीं आता.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)