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'आखिर कश्मीर में कब तक लाशें गिरती रहेंगी?'
- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली
भारत प्रशासित कश्मीर में रविवार को श्रीनगर लोकसभा सीट पर उप चुनाव हुआ. चुनाव के दौरान राज्य में हिंसा और आग़जनी की खबरें तो आई हीं, मतदान सिर्फ 7.1 फ़ीसद रहा.
श्रीनगर में मतदाताओं ने चुनावों में क्यों दिखाई इतनी बेरुख़ी? इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने के लिए बीबीसी हिंदी की टीम ने फ़ेसबुक लाइव के ज़रिए कुछ कश्मीरी युवाओं से बातचीत की.
कश्मीर के बारामुला की रहने वाली कोमल जेबी सिंह जेएनयू से पीएचडी कर रही हैं. उनका कहना है, ''इतना कम मतदान प्रतिशत दिल्ली के लिए वेक अप कॉल है. यह बताता है कि कश्मीर में सबकुछ ठीक नहीं है. हमें सोचना होगा कि आखिर कब तक लाशें गिराई जाती रहेंगी? क्या इसका कोई हल नहीं है?"
दिल्ली विश्वविद्यालय में ग्रेजुएशन की पढ़ाई करने वाली इरशा जेहरा कहती हैं,''यह मतदान बताता है कि लोग घाटी में हुई हालिया हिंसा के ख़िलाफ़ हैं. केंद्र सरकार दिखाना चाहती है कि कश्मीर में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव हो रहे हैं, जबकि ऐसा नहीं है.''
जेहरा ने कहा, ''चुनाव के दिन राज्य में इंटरनेट और मोबाइल पर रोक लगा दी गई और लोगों को बोलने से रोका गया. इसके बाद सरकार निष्पक्ष चुनाव कराने का झूठ फैला रही है. चुनाव से कश्मीर में सबको फ़ायदा होता है, सिवाय कश्मीरियों के. कश्मीरी मर रहे हैं, किसी को उनकी परवाह नहीं है.''
जामिया में पीएचडी की पढ़ाई करने वाले बशारत अली का कहना है कि मतदान फीसद कम होने का मतलब सिर्फ़ यह है कि लोग वोट न देकर अपने अधिकार का प्रयोग कर रहे हैं.
कश्मीरी युवाओं के सपनों के बारे में पूछे जाने पर इन्होंने कहा कि वे राज्य में अमन चैन चाहते हैं. कश्मीर घाटी में होने वाली मौतें रुकें और शांति कायम हो.
बशारत कहते हैं कि कश्मीर में शिक्षा और रोजगार के पर्याप्त मौके नहीं हैं इसलिए हमें देश के दूसरे हिस्सों में जाना पड़ता है. जब हम दिल्ली से वापस जाते हैं तब हमें अहसास होता है कि कश्मीर और बाक़ी भारत में कितना फ़र्क है.
कश्मीरी पंडितों के सवाल पर इरशा का कहना है कि कश्मीरी मुस्लिम चाहते हैं कि कश्मीरी पंडित वापस आएं और सब मिलकर साथ रहें. कश्मीरी सिख परिवार से ताल्लुक रखने वाली कोमल कहती हैं कि कश्मीर में सभी समुदाय के लोगों ने मुसीबतें झेलीं हैं.
इस बातचीत के दौरान ज्यादातर कश्मीरी युवाओँ का कहना था कि राज्य में शांति बहाल करने के लिए कोशिशें की जाएं और वहां की जनता भी यही चाहती है.
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