रात में क्यों मार्केट लगाती हैं ये महिलाएं?

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- Author, अमर शर्मा
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए
"हम पीढ़ी दर पीढ़ी यही काम करते आ रहे हैं और व्यापार करना आदत बन गई है. अपनी मर्ज़ी के मालिक हैं नौकरी तो दूसरों की गुलामी जैसा है."
यह कहना है बीना का जिनकी उम्र 40 साल है. उनकी 60 वर्षीय सास राजो और 20 साल की बेटी सुमन भी उनके व्यापार में हाथ बंटाती हैं.
इनका परिवार गुजरात के मेहसाना से दिल्ली आया था और रघुबीर नगर में बस गया. पूरा परिवार दिल्ली के सीमापुरी, रोहिणी, कालका जी में फेरी लगाता है और नए बर्तन को देकर पुराने कपड़े और जूते जमा करता है.
हफ़्ते में दो दिन इस सामान को बेचते हैं और दो से तीन हज़ार रूपये कमा लेते हैं.

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बीना जैसी हज़ारों महिलाएं हैं जो पश्चिमी दिल्ली के रघुबीर नगर में पुराने कपड़े बेच कर अपना गुज़र बसर करती हैं. यहां क़रीब पांच एकड़ ज़मीन में फैला पुराने कपड़ों की विक्रेता मार्किट है. यहां के व्यापारी इसे उत्तर भारत का सबसे बड़ा पुराने कपड़ों का बाज़ार बताते हैं.
ये अनोखी मार्केट सुबह चार बजे अंधेरे में शुरू होती है और सुबह 11 बजे के आसपास बंद हो जाती है. गुजरात के वाघरी समाज के क़रीब पांच हज़ार से ज़्यादा विक्रेता इस बाज़ार में रोज़ाना अपना सामान बेचते हैं जिसमें 70 से 80 फ़ीसदी महिलाएं होती हैं.
इस बाज़ार में हर दिन क़रीब साढ़े तीन हज़ार से चार हज़ार महिलाएं दुकान लगाती हैं.
इस मार्केट में 50 से 100 रूपये में जूते, 10 से 30 रूपये में कमीज़, 10 से 50 रूपये में पेंट, 20-30 रूपये में जींस, 10-50 रूपये में लेडीज़ टॉप, 20-40 रूपये में साड़ी ख़रीदी जा सकती है.

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सड़क पर कटती है रात
पुराने कपड़ों की यह मार्केट इलाक़े में घोड़ा मंडी के नाम से मशहूर है क्योंकि ये घोड़े की सवारी करनेवाले श्री बाबा रामदेव जी के मंदिर के ठीक सामने है.
मंडी के बाहर रात 12 बजे से पहले इन विक्रेताओं का तांता लगना शुरू हो जाता है क्योंकि रात के ठीक 12 बजे मार्केट का दरवाज़ा खोला जाता है. मार्केट भले ही सुबह चार बजे खुलता हो लेकिन विक्रेता अपनी दुकान लगाने के लिए साड़ी से जगह रोक लेते हैं.

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इस मंडी में पुराने कपड़ों के गट्ठर के साथ विक्रेता सिर्फ़ दिल्ली ही नहीं बल्कि जयपुर, अलवर, फरीदाबाद, मेरठ, मथुरा, सिरसा, हिसार, चंडीगढ़, लुधियाना, पटियाला यानी राजस्थान, यूपी, हरियाणा, पंजाब और गुजरात के तमाम शहरों और कस्बों से आते हैं.
देवीपूजक वाघरी समाज के सदस्य
दिल्ली में ये विक्रेता रघुवीर नगर, बक्करवाला, पश्चिम विहार, झील, भीम सिंह कॉलोनी जैसे इलाक़ों में रहते हैं. ख़ास बात ये है सभी विक्रेता गुजरात के वाघरी समाज से ताल्लुक रखते हैं, जिन्हें देवीपूजक भी कहा जाता है.
ये विक्रेता ख़ुद को व्यापारी कहलाना पसंद करते हैं. एक अनुमान के मुताबिक़ क़रीब 40 फ़ीसदी व्यापारी दिल्ली के बाहर से आते हैं और 60 फ़ीसदी दिल्ली में ही रहते हैं.

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राजस्थान के सुजानगढ़ से आईं 45 साल की आशा भी मंडी के बाहर रात काट रही हैं. उनके दो बेटे 16 वर्षीय सुशांत और 19 साल का दीपक साथ हैं.
मैंने उनसे पूछा कि सुजानगढ़ से इतनी दूर आकर पुराने कपड़े बेचकर वो आख़िर कितना कमा लेती हैं? उन्होंने बताया, "हम महीने भर गांव-गांव घूमकर पुराने कपड़े जमा करते हैं. दिल्ली की मंडी में एक या दो दिन में कपड़े बेचकर क़रीब पांच हज़ार रूपये मिल जाते हैं. कुछ सामान बच गया तो उसे मंडी में जमा करा देते हैं."
क्या राजस्थान में कोई काम नहीं मिलता? इस सवाल के जवाब में वे कहती हैं, "हमारा समुदाय बहुत ग़रीब है और हमारे पास अपने खेत नहीं हैं. दूसरों के खेत में दिनभर 10 घंटे तक काम करने के बाद भी महज़ 125 रूपये दिहाड़ी मिलती है. और सभी दिन काम भी नहीं मिलता."
चार बजे नगर निगम के कर्मचारी मंडी का गेट खोलते हैं और अंदर जाने के लिए सभी विक्रेताओं को 10 रूपये की पर्ची कटानी पड़ती है.

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टॉर्च से देखते हैं सामान
मार्केट में यूं तो पुराने कपड़े हर जगह बिकते हैं लेकिन सुबह चार बजे से लेकर सात बजे तक पुराने जूते, जूते के पुराने सोल और पुराने मोबाइल फोन भी बिकते हैं.
इस पुराने माल को ख़रीदने वाले ग्राहकों के हाथों में टॉर्च होती है जिसकी रौशनी में वे तय करते हैं कि माल उनके काम का है या नहीं. इस मार्केट में पुराना माल ख़रीदकर इन्हें दोबारा बेचनेवाले वाले व्यापारियों की संख्या भी अच्छी ख़ासी होती है. पंजाब, हरियाणा, यूपी के व्यापारी यहां से पुराने कपड़े ख़रीद कर ले जाते हैं.

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दिल्ली के नजफ़गढ़ के निवासी 22 वर्षीय संदीप बताते हैं कि 100 रूपये में पुराने जूते ख़रीदकर और इनकी थोड़ी मरम्मत कराकर वे इन्हें उत्तराखंड और हिमाचल में ले जाकर बेचते हैं और महीने में 20,000 से 25,000 रूपये कमा लेता हैं.
व्यापारी उमेश चंद 50 साल के हैं और रघुबीर नगर में ही रहते हैं. वे यहां की मंडी से 20 से 30 रूपये में कमीज़ ख़रीदते हैं और उसे गर्वमेंट स्कूल के बाहर 30 से 40 रूपये में बेच देते हैं. वे कहते हैं कि हर दिन करीब 400 से 500 रूपये का काम कर लेते हैं. वे कहते हैं कि बस किसी तरह से गुज़ारा हो जाता है.

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दशरथ देवीपूजक 42 साल के हैं और हरियाणा के महेंद्रगढ़ ज़िले के करीणा कस्बे में रहते हैं. वे अपनी 38 वर्षीय पत्नी रमेला और 11 साल की बेटी के साथ क़रीब 20 दिनों में दिल्ली आते हैं, और महीने में औसतन 5000 से लेकर 10,000 रूपये तक की कमाई कर लेते हैं.
दूसरे लोगों की तरह वे दिल्ली में ही क्यों नहीं बस जाते? इस सवाल पर रमेला कहती हैं कि दिल्ली में मकान का किराया कम से कम 5000 रूपये होगा जबकि महेंद्रगढ़ में उन्हें हज़ार या बारह सौ रूपये में मकान मिल जाता है. साथ ही दिल्ली में एक दिन का ख़र्च भी 250 से 300 रूपये होता है जबकि गांव में उनका कम में भी गुज़ार चल जाता है.

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जी तोड़ मेहनत वाले इस व्यापार में इन्हें मुश्किल भी कम पेश नहीं आती. एनसीआर में आरडब्ल्यूए वाली कॉलोनियों में फेरीवालों के घुसने पर आमतौर पर पाबंदी रहती है.
एक व्यापारी संजय बताते हैं कि छुट्टीवाले दिन रविवार को घुसने की इजाज़त होती है तो फेरी लगानेवाले मर्दों को शक की निगाह से देखा जाता है. अगर उनके साथ महिलाएं होती हैं तो थोड़ी हमदर्दी मिल जाती है और कुछ पुराना सामान मिलने में मदद हो जाती है.

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कॉलोनियों में दिनभर चक्कर लगाते और सामान इकट्ठा कर घर पहुंचने में इन्हें रात के आठ बज जाते हैं और फिर रात में 12 बजे मंडी में जगह घेरने के लिए जाना होता है. आख़िर इतनी मेहनत कैसे कर पाती हैं ये गुजराती महिलाएं.
वाघरी समाज एक उद्यमी समाज है जो मेहनत को अपना ईमान मानता है. पीढ़ी दर पीढ़ी वे इस व्यापार में जुटे हैं इसलिए समुदाय में साक्षरता का अभाव है. वे जी तोड़ मेहनत करते हैं और स्वाभिमान से जीते हैं. दिल्ली जैसे महानगर में वे किसी तरह गुज़र बसर कर रहे हैं और रात के अंधेरे में इस मंडी के लगने की वजह भी यही है.
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