नज़रियाः 'बाल ठाकरे होते तो गायकवाड़ को शाबाशी देते'

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एयर इंडिया के कर्मचारी से कथित मारपीट के मामले में दिल्ली पुलिस ने शिवसेना सांसद रवींद्र गायकवाड़ पर मामला दर्ज किया है लेकिन पार्टी ने अभी कोई कार्रवाई नहीं की है.
इस मुद्दे पर मुंबई स्थित वरिष्ठ पत्रकार समर खड़स की रायः
शिवसेना की जो राजनीति रही है उससे गायकवाड़ के प्रति पार्टी का रवैया कुछ अलग नहीं है.
अपने जन्म से लेकर आज तक इस संगठन की यही संस्कृति रही है.
शिवसेना नेताओं की ओर से हिंसा की ये कोई पहली घटना नहीं है. पिछले 50 सालों से उनपर ऐसे आरोप लगते रहे हैं.

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सबसे अहम बात ये है कि बाला साहेब ठाकरे जो राजनीति करते थे, उद्धव ठाकरे के पास शिवसेना की बागडोर आने के बाद इस संगठन की राजनीति थोड़ी बदल गई है.
लेकिन इसके बावजूद जिस तरह का माहौल इस देश में तैयार हो गया है, उससे लगता है कि शिवसेना ही नहीं कोई भी पार्टी ऐसे नेताओं पर कार्रवाई नहीं करेगी.
हिंसा केवल शारीरिक तौर पर ही नहीं होती. हिंसा शब्दों से भी होती है, मानसिक तौर पर भी की जाती है.
जो लोग यहां पर लव जिहाद की बात करते थे या कहते थे कि उन्होंने एक लड़की का धर्म परिवर्तन किया है तो हम सौ लड़कियों का करेंगे, उन्हें सबसे बड़े प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया जाता है.
इसी तरह एक जाने माने वकील पर हमला करने वाले व्यक्ति को कोई दल अपना प्रवक्ता बना देता है.
ऐसा लगता है कि गायकवाड़ से भी गंदे और भद्दे बर्ताव करने पर एक बड़ा दल, जो आज केंद्र और कई राज्यों में सत्ता में है, जब कार्रवाई नहीं करता है तो शिवसेना से अपेक्षा करना ही बेमानी है.

बाल ठाकरे के समय संगठन का स्वरूप सीधे हिंसा वाला होता था, उससे आज की शिवसेना बहुत नरम पड़ गई है.
अगर बाल ठाकरे का समय होता तो सामना में गायकवाड़ को शाबाशी दी जाती और खुले दिल से समर्थन दिया जाता.
लेकिन एक तरफ़ गायकवाड़ की हरकत बहुत ग़लत थी तो दूसरी तरफ़ सभी एयरलाइंस द्वारा उन्हें ले जाने से मना किया जाना भी ग़लत है.
अगर पहले ये घटना होती तो मुंबई में इसकी बहुत हिंसक प्रतिक्रिया हो सकती थी.
जबकि शिवसेना ने ऐसी कोई हिंसक प्रतिक्रिया नहीं दी और कहा कि इसकी जांच करेंगे और फिर निर्णय लेंगे.
ठाकरे के ज़माने में ऐसे कई वाक़ये हुए. जैसे, हमेशा शिवसेना और बाल ठाकरे के ख़िलाफ़ लिखने वाले अख़बार 'महानगर' पर कई हमले हुए.
1992 के दंगों में शिवसेना के मुखपत्र 'सामना' में जिस तरह की चीज़ें आ रही थीं और ठाकरे जिस तरह का आह्वान कर रहे थे, उसके बारे में सभी जानते हैं.

दलित और शिवसेना के बीच संघर्ष भी काफी रहा है. जैसे बाबा साहब अंबेडकर के नाम पर मराठवाड़ा यूनिवर्सिटी के नामकरण को लेकर जो संघर्ष हुए उसमें शिवसेना का रोल जगजाहिर है.
अंबेडकर की किताब, 'द रिडल्स ऑफ़ हिंदुइज़्म' को प्रतिबंधित करने के लिए शिवसेना ने मोर्चे निकाले, जिसके बाद हिंसा हुई.
दक्षिण भारतीयों के ख़िलाफ़ जो आंदोलन चलाए गए वो भी बहुत हिंसक थे. सरकारी हो या निजी, सभी कार्यालयों में घुस-घुस कर दक्षिण भारतीयों को पीटा गया.
उद्धव ठाकरे के हाथ में शिवसेना की बागडोर आने के बाद इस तरह हिंसा नहीं हो रही है.
शिवसेना का स्वरूप बदल गया है लेकिन उसका डीएनए अभी तक नहीं बदला है.
शिवसेना क्यों चाहेगी कि ऐसे समय में जब हिंसक काम करने वाले नेता पुरस्कृत हो रहे हैं, उसका एक सांसद कम हो जाए.
(मुंबई स्थित वरिष्ठ पत्रकार समर खड़स के साथ बीबीसी संवाददाता संदीप सोनी की बातचीत पर आधारित लेख)












