भगत सिंह से भाई की वो आख़िरी मुलाक़ात

भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त

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इमेज कैप्शन, जालंधर के देशभगत यादगार हॉल में लगाई गई भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त की एक पुरानी तस्वीर (तस्वीर चमन लाल ने उपलब्ध करवाई है)

भगत सिंह को उनके साथियों राजगुरु और सुखदेव के साथ 23 मार्च 1931 को सॉन्डर्स की हत्या के दोष में फांसी दी गई थी. गुरुवार को उनकी फांसी की 86वीं बरसी थी.

भगत सिंह की भतीजी वीरेंद्र सिंह संधू लंदन के पास केंट में रहती हैं. बीबीसी संवाददाता इशलीन कौर ने उनसे भगत सिंह के जीवन के अनजान पहलुओं पर बात की.

भगत सिंह को फांसी की सज़ा सुनाए जाने के बाद उनके परिवार ने उनसे तीन मार्च 1931 में मुलाक़ात की थी. फांसी दिए जाने से पहले यह परिवार की भगत सिंह से अंतिम मुलाक़ात थी.

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अंतिम मुलाक़ात में भगत सिंह के छोटे भाई और मेरे पिता कुलतार सिंह भी शामिल थे. मुलाक़ात के दौरान वो काफी उदास थे. कुलतार सिंह रो रहे थे.

भगत सिंह के पिता सरदार किशन सिंह (तस्वीर प्रोफ़ेसर चमन लाल के सौजन्य से)

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मुलाकात के बाद कुलतार सिंह ने भगत सिंह से पत्र लिखने की गुज़ारिश की थी. उन्होंन कुछ शेर लिखने को भी कहा था. उन्हें पता था कि भगत सिंह शेरो-शायरी भी करते हैं.

भगत सिंह ने कुलतार को एक पत्र लिखा था. वह कुछ इस तरह से था.

अजीज़ कुलतार

आज तुम्हारी आंखों में आंसू देखकर बहुत दुख हुआ. आज तुम्हारी बातों में बहुत दर्द था. तुम्हारे आंसू मुझसे बर्दाश्त नहीं होते. बरखुदार, हिम्मत से तालीम हासिल करते जाना. सेहत का ख्याल रखना. हौसला रखना. शेर क्या लिखूं. सुनो.

उसे यह फ़िक्र है हरदम, नया तर्जे-जफ़ा क्या है?

हमें यह शौक देखें,सितम की इंतहा क्या है?

दहर से क्यों खफ़ा रहे,चर्ख का क्यों गिला करें.

सारा जहाँ अदू सही, आओ मुकाबला करें.

कोई दम का मेहमान हूँ,ए-अहले-महफ़िल, चरागे सहर हूँ, बुझा चाहता हूँ.

मेरी हवाओं में रहेगी, ख़यालों की बिजली.

यह मुश्त-ए-ख़ाक है फ़ानी, रहे रहे न रहे.

अच्छा रुखसत. खुश रहो अहले वतन. हम तो सफर करते हैं.

नमस्ते

तुम्हारा भाई

भगत सिंह

मां का गर्व

भगत सिंह की मां को उन पर बहुत गर्व था. हालांकि उनके चार और बच्चे आज़ादी की लड़ाई में शामिल थे. लेकिन भगत सिंह जैसा मुकाम कोई हासिल नहीं कर पाया.

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उनके व्यक्तित्व में एक अलग तरह का आकर्षण था.

उनकी मां ने पहले ही कह दिया था कि जब उनकी मौत हो तो उनका अंतिम संस्कार भगत सिंह की समाधी के पास ही किया जाए. उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए बेबे को सतलुज के किनारे स्थित भगत सिंह की समाधी के पास ही दफनाया गया.

राजनीतिक काम

भगत सिंह

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भगत सिंह शहर में पोस्टर लगाने का काम भी करते थे. सॉन्डर्स की हत्या के बाद शायद कुलतार सिंह ने भगत सिंह के साथ पोस्टर भी लगाया था. वो साइकिल पर चढ़कर काफी ऊंचाई पर पोस्टर लगाते थे.

कुलतार ने ऊतनी ऊंचाई पर पोस्टर लगाने की वजह पूछी थी, तो उन्होंने बताया था कि बच्चे इन पोस्टरों को फाड़ न दें, इसलिए वो पोस्टर को ऊंचाई पर लगाते हैं.

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