राजनीति की धुरी रहा है योगी का गोरखनाथ मठ

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- Author, कुमार हर्ष
- पदनाम, गोरखपुर से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
योगी आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाने की घोषणा के बाद गोरखपुर शहर में होली और दीवाली की जुगलबंदी सड़कों पर नज़र आई है.
जमकर पटाखे छूटे हैं और बड़ी तादाद में सड़कों पर उतरी भीड़ में युवाओं की संख्या ज़्यादा है. एक-दूसरे को गुलाल मलकर ख़ुशियां मनाई गई हैं.
मगर गोरखनाथ मंदिर परिसर में, जहाँ के वे महंत हैं, उल्लास के रंग कुछ ज़्यादा ही मुखर नज़र आ रहे हैं.
वैसे तो हर शनिवार को यहाँ कुछ ज़्यादा ही भीड़ होती है मगर 18 मार्च का दिन नाथ पंथ की इस सबसे प्रमुख पीठ के लिए ख़ास बन गया है क्योंकि अब इस परिसर के अभिभावक पूरे सूबे के अभिभावक बन गए हैं.

भारत के धार्मिक इतिहास में गोरखकालीन भारत का समय 600 से 1200 ईस्वी का माना जाता है, लेकिन अलग-अलग स्रोतों से नाथपंथ के योगियों, सिद्धों और आचार्यों की जो सूची मिलती है, उसमें गोरखनाथ से पहले किसी भी नाथ नामधारी योगी के लिए गुरु शब्द का प्रयोग नहीं मिलता है.
गोरक्षपीठ

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गोरखनाथ के लिए ये सम्मान इसलिए जुड़ा हो सकता है क्योंकि नाथ पंथ के सिद्धांतकार और प्रवर्तक के तौर पर उनकी भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण है.
सैयद अहमद अलीशाह की लिखी 'महबूब-उत-तवारीख़' में कहा गया है कि गोरखपुर पहले एक निर्जन वन जैसी जगह थी, जहाँ बड़ी संख्या में साधु-संत रहते थे और गोरखनाथ ने इसीलिए इसे अपनी तपोस्थली बनाया था.

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उस समय का इतिहास बताने वाले एक प्रमुख स्रोत 'मृगावत' में भी इस बात का ज़िक्र मिलता है.
गोरखनाथ मंदिर
अधिकांश लोग नाथपंथ को केवल गोरखपुर स्थित गोरक्षपीठ तक ही सीमित मानते हैं, मगर नाथ योगियों के मठ पूरी दुनिया में हैं. तिब्बत की राजधानी ल्हासा में मत्स्येन्द्रनाथ की मूर्ति है.
चीन के चुवान द्वीपसमूह के पुटू द्वीप में भी एक प्रसिद्ध मंदिर है. बाली, जावा, भूटान, पेशावर के अलावा नेपाल के मृग स्थली में भी गोरक्षपीठ है. काठमांडू के इंद्र चौक मुहाली में भी गोरखनाथ का मंदिर है.
भारत में भी हरिद्वार, सिक्किम और गुजरात में गोरखनाथ के सिद्ध पीठ स्थित हैं.

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मगर उत्तर भारत, खासकर पूर्वी उत्तर प्रदेश में इसका महत्व धार्मिक और सामाजिक तौर पर ही नहीं बल्कि राजनीतिक तौर पर भी कई गुना ज्यादा है.
'खिचड़ी मेला'
हर साल मकर संक्रांति के पर्व पर आयोजित होने वाले 'खिचड़ी मेले' में लाखों लोग एक महीने तक यहाँ आते रहते हैं.
आमतौर पर इस मठ की छवि कट्टर हिंदूवादी की रही है मगर ये मेला इस छवि को तोड़ता भी है. योगी आदित्यनाथ जिस गोरक्षपीठ का नेतृत्व करते हैं उसका राजनीति से बहुत पुराना ताल्लुक रहा है.
साल 1967 में इस पीठ के तत्कालीन प्रमुख महंत दिग्विजयनाथ हिन्दू महासभा के टिकट पर सांसद बने थे.

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उनके उत्तराधिकारी और रामजन्मभूमि आंदोलन के अग्रणी नेता महंत अवैद्यनाथ साल 1962, 1967, 1974 और 1977 में मानीराम विधानसभा सीट से विधायक चुने गए.
पांचवीं बार सांसद
उन्होंने साल 1970, 1989, 1991 और 1996 में लोकसभा में गोरखपुर का प्रतिनिधित्व भी किया.
महंत अवैद्यनाथ के उत्तराधिकारी योगी आदित्यनाथ साल 1998 में गोरखपुर से 12वीं लोकसभा का चुनाव जीतकर 26 साल की उम्र में पहली बार सांसद बने.
साल 1998 से वे लगातार इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. साल 2014 में वे पांचवी बार सांसद बने.

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पिछले 28 सालों से गोरखपुर के सांसद का पता गोरखनाथ मंदिर ही रहा है.
जन समर्थन
योगी के विरोधी अक्सर ये आरोप लगाते रहे हैं कि उनकी जीत में गोरक्षपीठ का उत्तराधिकारी होना ज़्यादा प्रमुख भूमिका निभाता है क्योंकि इस पीठ पर आस्था रखने वाले लाखों लोग उन्हें आराध्य के तौर पर देखते हैं.
योगी की जीत के आंकड़ें भी इस बात की गवाही देते हैं कि उन्हें इस क्षेत्र की जनता का अगाध समर्थन हासिल है.
शायद इसीलिए हर बार वे अपनी जीत का अंतर और ज़्यादा बढ़ा लेते हैं.

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ज़ाहिर है कि गोरक्षपीठ प्रबंधन से जुड़े महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद की ओर से संचालित होने वाली दो दर्जन शिक्षण संस्थाएं और गुरु गोरक्षनाथ चिकित्सालय जैसे प्रकल्प भी इस ताने बाने को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं.
मठ का विरोध
यह भी अपने आप में एक दिलचस्प बात है कि यहाँ के सामजिक-राजनीतिक गलियारों में एक मान्यता है कि जो शख्स इस मठ का विरोध करता है, उसका पतन हो जाता है.
एक समय में तीन बार के विधायक और कभी योगी के गुरु महंत अवैद्यनाथ के 'हनुमान' कहे जाने वाले ओम प्रकाश पासवान, अपने समय के ताकतवर बाहुबली वीरेंद्र प्रताप शाही, निषादों के प्रमुख नेता जमुना निषाद और पूर्व विधानपार्षद देवेंद्र प्रताप सिंह के उदाहरण इस की पुष्टि के लिए इस्तेमाल किये जाते हैं.

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उल्लेखनीय है की देवेन्द्र प्रताप सिंह इस बार पुनः योगी के आशीर्वाद से ही विधान परिषद पहुँच पाए हैं.
नेपाल में माओवादियों की तरफ़ से हिन्दू राष्ट्र की मान्यता समाप्त किए जाने से पूर्व तक नेपाल के महाराजा के मुकुट और मुद्रा में भी गुरु गोरक्षनाथ का चित्र अंकित होता था.
और गोरखपुर ही नहीं नेपाल में भी आपको ये कहने वाले बहुतेरे मिल जाएंगे कि माओवादियों का पतन इसीलिए हो गया क्योंकि उन्होंने इन प्रतीकों को हटा दिया था.
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